निरीह रस्ते

कभी चलो किसी रस्ते पर
तो बटोरते चलना खुद को
क्यूंकि जिन रस्तों पर
छोड़ आते हैं हम
अपना एक भी कतरा…
मुक्ति मार्ग पर चलने से पहले
उन रास्तों पर लौटना होता है
एक बार फिर से
स्वयं की पूर्णता की खातिर…

रस्ते बड़े निरीह हैं
उन पर भले असंख्य
पद चाप की ध्वनियां गूंजे
वो पुकार ना सकते तुम्हारा नाम
स्वयं चल ना सकते तुम्हारी ओर..
बस बाट जोहते रहते हैं
अपनी जमीं हुई देह और
कातर खुली हुई
पथरीली आंखों से…
उनका,
जिनके छूटे हुए कतरे
उनके कंकड़ पत्थर में
सने पड़े रहते हैं सदियों, युगों
मूक धरोहर बनकर…