कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘ज़िन्दग़ीनामा’ से कुछ पंक्तियाँ

“बच्चों, जुग चार होते हैं:
सोता हुआ कलजुग
छोड़ता हुआ द्वापर
खड़ा हुआ त्रेता और
चलता हुआ सतजुग।”

 

“मनुक्ख के मन को किसने बाँधा है! जिधर बह गया, बहने लगा।”

 

“चन्न वह जो चान्नना करे।”

 

“रूख वही रहता है, उसके रखवाले बदलते रहते हैं।”

 

“फ़ौजी बन्दे दुनिया-जहान घूमने निकल जाएँ पर दिल अपना पोटली में बाँधकर अपने पिंड के पुराने रूख पर लटका जाते हैं।”

 

“असली मुर्ग़ और असली मुग़ल दूर से पहचाने जाते हैं।”

 

“मुक़द्दमे का मुँह-माथा पीछे, उसकी पीठ की छानबीन पहले।”

 

“आल माल
पहला थाल
माँ मेरी के
लम्बे बाल
कूएँ हेठ पानी
माँ मेरी रानी
काढ़ेगी कसीदड़ा
दूध पाए मथानी।”