शब्दों का मारा प्रेम

प्रेम को परिभाषित करने जब भी कुछ कहा गया
शब्द प्रेम को ढाँप ना सके
कहन की चादर के कोनों से
प्रेम के पैर हमेशा बाहर निकले रहे
शब्दों के विन्यास और ध्वनि में ढूँढी गयी
होठों की एक अदृश्य काँप भर है प्रेम

शब्द हमारी व्यर्थतम चेष्टा है
जब महसूसने को ही हो सब कुछ
भाषा एक अतिरेक है
जब संकेत गढ़े और समझे जा सकें

अभिव्यक्ति की अनंत में बनती परछाईं में देखना
क़रीब दिखेगा प्रेम
जब दिख जाये
तो बस वहीं ठहर जाना
कुछ कहना मत
बस देखते रहना

सुंदर कल्पनाओं के पहाड़
कहने की हलचल से पिघल जाते हैं
नदियों में बहता रहा आता है
शब्दों का मारा प्रेम।


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अनुराग तिवारी
अनुराग तिवारी

अनुराग तिवारी ने ऐग्रिकल्चरल एंजिनीरिंग की पढ़ाई की, लगभग 11 साल विभिन्न संस्थाओं में काम किया और उसके बाद ख़ुद का व्यवसाय भोपाल में रहकर करते हैं। बीते 10 सालों में नृत्य, नाट्य, संगीत और विभिन्न कलाओं से दर्शक के तौर पर इनका गहरा रिश्ता बना और लेखन में इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति को पाया। अनुराग 'विहान' नाट्य समूह से जुड़े रहे हैं और उनके कई नाटकों के संगीत वृंद का हिस्सा रहे हैं। हाल ही में इनका पहला कविता संग्रह 'अभी जिया नहीं' बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

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