तक़सीम

'तक़सीम' - गुलजार (अनुवाद: शम्भू यादव)  जिन्दगी कभी-कभी जख्मी चीते की तरह छलाँग लगाती दौड़ती है, और जगह-जगह अपने पंजों के निशान…

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धुआँ

'धुआँ' - गुलज़ार बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया।…

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पाजी नज़्में

गुलज़ार साहब की नज़्मों की नयी किताब 'पाजी नज़्में' लगभग एक महीना पहले आयी है, उसी किताब से पाँच खूबसूरत…

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