“प्रेम और चुनाव में सब जायज है।”

 

“पुरुष स्त्री को चाहने लगे, यह भी स्त्री के लिए कितनी बड़ी विपदा है।”

 

“कुत्ता उसका जिसके हाथ से टुकड़ा पाये!”

 

“जिस बात के लिए आलोचना की आशंका हो, वही पाप है।”

 

“मनुष्यों के देश धर्मों के देश बन गए।”

 

“साधारण स्वतंत्रता के अभाव में चतुरता की मजबूरी ही नारी का ‘चलित्तर’ कहलाती है।”

 

“बदलने का, चुनने का अर्थ उस बात को महत्त्व देना है। महत्त्व नहीं है तो उपेक्षा ही उचित है।”

 

“पुरुष अपनी उच्छृंखलता के प्रचार से उतनी लज्जा अनुभव नहीं करता जितनी अपनी माँ, बहिन अथवा पत्नी की उच्छृंखलता के प्रचार से।”

 

“विद्या चाहे जितनी उत्तम वस्तु हो और पैसा केवल हाथ का मैल, परन्तु विद्या पैसे के बिना अप्राप्य रहती है।”

 

“सच को कल्पना से रंग कर उसी जन समुदाय को सौंप रहा हूँ जो सदा झूठ से ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा और उसकी ओर बढ़ने का सहस नहीं छोड़ता।”

 

“पुरुष की तुलना में स्त्री की हीनता स्वाभाविक तो नहीं, परन्तु आवश्यक बना दी गयी है।”

 

“सफेदपोश निम्न-मध्यवर्ग के लिए अपनी गरीबी से अधिक संकोच और रहस्य की दूसरी बात क्या हो सकती है।”

 

“बिना सहारे के खड़े होना कितना कठिन है, सचमुच नास्तिक हो सकने के लिए कितना आत्मबल चाहिए।”

 

“अपमान की आशंका से स्त्री कितनी असहाय हो जाती है। पुरुष दूसरे पुरुषों से सेवा चाहते हैं, उनके श्रम से लाभ उठाना चाहते हैं, उनका धन छीनना चाहते हैं, रिश्वत चाहते हैं परन्तु स्त्री का केवल निरादर करना चाहते हैं।”

 

“प्रेम जीवन का यथार्थ व्यवहार है। वह केवल कल्पना और स्मृति में ही सफल नहीं हो सकता।”

 

“इन्हें ही राज कर लेने दो। ये पाँच बरस से खा रहे हैं, इनका पेट कुछ भरा होगा; इनका पेट थोड़े में पूरा हो जाएगा। दूसरा कोई आएगा तो जितना ये खा चुके हैं, उतना खाकर फिर और खाएगा।”

 

“लड़े हमारी जूती! हमें कोई मारेगा तो क्या हम नहीं लड़ेंगे, लहू पी लेंगे..।”
“मासी, तुम लहू पियोगी! तुम तो उनके घर का पानी भी नहीं पी सकोगी।”

 

“व्यक्ति समाज के चक्कर में कैसे विवश रहता है? …समाज कभी डुबा देता है, कभी बचा लेता है परन्तु सदा निर्मम रहता है।”

 

“प्रेम भी तो चाह और भूख ही है या चाह और भूख के उपाय की चिंता है।”

 

“रक्त-मांस का उन्मेष ही सही पर हृदय और क्या है, मस्तिष्क और क्या है? शरीर को काट हृदय की परीक्षा करने से तो हृदय में प्यार या मस्तिष्क में विचार रखे हुए नहीं मिलते। प्यार और विचार शरीर के व्यवहार मात्र हैं।”

 

“स्त्री अपनी शोभा अपने से बढ़कर पुरुष को पाने में ही समझ लेती है, स्त्री स्वयं अपने योग्य पुरुष से हीन क्यों रहना चाहती है? स्त्री जिसे अपने से बढ़कर नहीं समझ सकती उसे अपने योग्य कैसे समझे, उसके प्रति श्रद्धा और प्यार क्या…?”

 

“शोकातुरों को शोक के वशीभूत न होने देकर शोक को अनिवार्य सम्पादन और कर्त्तव्य बना देना, शोक को वश करने का और उसे बहा देने का मनोवैज्ञानिक उपाय भी था।”

 

“वर्षा फसल के लिए अच्छी है तो भगवान से कहिये खेतों में बरसाये। यहाँ शहर में बेघरबार, बेसाया लोगों को भिगो कर बीमार करने के लिए, कीचड़ करने के लिए अपना पानी क्यों बरबाद कर रहा है? उसे नहीं दीखता कि कणक का खेत हमारे सिर पर नहीं है। ‘मॉडल टाउन’ में माली बगीचे में पानी देता था तो क्या हमें भी भिगो देता था? भगवान से तो माली ही समझदार था।”

 

“स्त्रियों के जीवन में लज्जा का उतार-चढ़ाव दिन के पहरों में ताप की भाँति होता है। बचपन में लाज की अनुभूति नहीं रहती। जीवन के दूसरे पहर में जब वे अपने शरीर में नारीत्व को पहचानने लगती हैं और जान जाती हैं कि उनके जीवन की परिणति उनकी आकर्षण-शक्ति में है तो वे आकर्षण के प्रबल माध्यम लाज को बढ़ाने लगती हैं। यौवन में विवाह से पूर्ण लाज और संकोच की यह अनुभूति और उसका प्रदर्शन भी नवयुवती में अत्यंत उत्कट होता है। विवाह के रूप में आकर्षण-शक्ति के चरितार्थ हो जाने पर और विवाह की परिणति संतान के रूप में हो जाने पर अपने शरीर के सम्बन्ध में स्त्रियों की लाज घटने लगती है। जर्जर बुढ़ापे की संध्या आ जाने पर, आकर्षण का अवसर नहीं रहता तो स्त्रियों में शरीर के प्रति शैशव का सा निस्संकोच फिर लौट आता है।”