औरतें

कुछ औरतों के नसीब में होते हैं महल
सजे-सजाए
ऊँची-ऊँची दीवारों वाले
जिनसे जूझती उनकी चीखें
दम तोड़ देती हैं उन दीवारों के भीतर ही कहीं
क्योंकि
बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ पाती

कुछ को मिलती है छत
जर्जर दीवारों से घिरी
भेदकर जिनको
बाहर तैर आती हैं उनकी चीखें
फैल जातीं हैं समाज में
अमरबेल की तरह
पर नहीं पँहुचते वो हाथ
जो निकाल लें उन्हें इस दलदल से

समाचार पत्रों में खबर बनने से पहले
मर जातीं हैं कुछ चीखें
और कुछ समाचार पत्रों में छपने के बाद भी
रद्दी की तरह मोड़कर
फेंक दी जाती हैं…

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अमनदीप / विम्मी
०४/०७/२०१९