‘चौराहे पर घर’ – नन्द जवेरी

अनुवाद: श्याम जयसिंघाणी

कल तक मेरा घर
एक चौराहे पर था
पर आज सवेरे
घर के बाहर
लठधर चौकीदार की जगह
बन्दूकधारी जवान तैनात था
और चौराहा गुम था।

रात भर में ही
ग़ैर-कानूनी सब्जीमण्डी को
हटाया गया था वहाँ से
इसलिए घोड़ागाड़ी स्टैंड की
ज़रुरत ही न रही।

कल तक
चौराहे के शोरगुल से
जीना दुश्वार था
अब सन्नाटा है
आज रात एक कविता लिखी जाएगी

कल की रात में
सब रास्ते मिटाकर
बगीचे बनाये गए हैं
आज भूगोल पर
केवल फूल ही फूल हैं
खुशबू हैं, कोयल है, गीत हैं
मोर है, मोरनी है
और नाच भी है।

आज मैं अपने घर को
निवास के बजाय महल कह सकता हूँ
मैं खुश हूँ कि मेरा निवास
आज महल बना है
मेरी घरवाली भी खुश है
इसलिए कि वह अब रानी कहलाएगी
सबसे अधिक
मेरी नन्ही बिटिया खुश है
क्योंकि अब हमारे घर में
स्कूल जाने का रास्ता
हम सब खो बैठे हैं।

■■■

चित्र श्रेय: arihant daga


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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