कुछ लघु काव्य – इन्द्रा वासवाणी

रूपान्तर: नामदेव

एकलव्य की
गुरु-दक्षिणा:
लटका दो – सर
द्रोणाचार्य का
युगों तक!

दर्द ने
मेरा सीना चीर कर
मौत को टाल दिया!

सिन्धु!
तेरे सीने पर
छोड़े हैं पद-चिह्न
अपनी तहजीब के!

सूर्य को जब
हथेली से न ढाँक सकी
तब
आँखों को ढाँक कर कहा-
सूर्य उदय नहीं हुआ!

हर दुर्घटना ने
मुझे एक
नयी राह दी है
आगे बढ़ने की!

दुःख कैसे बेशुक्रे हैं
जब अकेला पाते हैं
घेर लेते हैं!

राहों को
रोशन करने के लिए
जलाना पड़ता है
अन्तर तम को!

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चित्र श्रेय: Max Nguyen