25 अप्रैल, 1925

प्रिय जवाहरलाल,

मैं तीथल में हैं। यह जगह कुछ-कुछ जुहु जैसी है। यहाँ मैं बंगाल की अग्नि-परीक्षा के लिए तैयार होने को चार दिन से आराम ले रहा हूँ। मैं यहाँ अपना पत्र-व्यवहार निपटाने की कोशिश कर रहा हूँ। उसमें तुम्हारा वह पत्र भी है, जिसमें ‘ईश्वर और कांग्रेस’ शीर्षक लेख का जिक्र है। तुम्हारी कठिनाइयों में मेरी सहानुभूति तुम्हारे साथ है। चूंकि सच्चा धर्म जीवन में और संसार में सबसे बड़ी चीज है, इसलिए इसी का सबसे अधिक दुरुपयोग किया गया है और जिन लोगों ने इन शोषकों और शोषण को तो देखा और वास्तविकता को नहीं देख पाये, उन्हें स्वभावतः इस वस्तु से ही अरुचि हो गई। परन्तु धर्म तो आखिर प्रत्येक व्यक्ति की वस्तु है और वह भी हृदय की वस्तु है, फिर चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारो । जो चीज मनुष्य को घोर ज्वालाओं के बीच अधिक-से-अधिक सान्त्वना देती है वही ईश्वर है। कुछ भी हो, तुम सही रास्ते पर हो। बद्धि ही एकमात्र कसौटी हो तो भी मुझे पर्वा नहीं। हालांकि उससे प्रायः मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है और ऐसी गलतियाँ कर बैठता है जो लगभग अन्धविश्वास के निकट पहुँच जाती हैं। गोरक्षा मेरे लिए केवल गाय को बचाने से कहीं बड़ी चीज है। गाय तो प्राणि-मात्र का प्रतीक है। गोरक्षा का मतलब है दुर्बलों, असहायों, गैंगों और बहरों की रक्षा। फिर तो मनुष्य सारी सृष्टि का प्रभु और स्वामी न रहकर सेवक बन जाता है। मेरी दृष्टि में गाय दया का जीता-जागता उपदेश है। फिर भी हम तो गोरक्षा के साथ निरा खिलवाड़ करते हैं, किन्तु हमें शीघ्र ही वस्तु-स्थिति के साथ जूझना पड़ेगा।

आशा है, मेरे पिछले पत्र सब तुम्हें मिल गये होंगे। डा० सत्यपाल का एक दुःखभरा पत्र मुझे मिला है। काश तुम, भले कुछ ही दिन के लिए सही, पंजाब जा सको। तुम्हारे जाने से उनका उत्साह बढ़ेगा। मैं चाहता हूँ कि पिताजी दो महीने किसी शान्त और ठण्डे स्थान पर रहें और तुम हफ्ते दस दिन के लिए अल्मोड़ा क्यों नहीं चले जाते, ताकि काम के साथ ठण्डी हवा में भी साँस ले सको?

सस्नेह, तुम्हारा
बापू