30 सितम्बर, 1925

प्रिय जवाहर,

हम विचित्र समय में रह रहे हैं। शीतला सहाय अपना बचाव कर सकते हैं। आगे की घटनाओं से मुझे परिचित रखना। वह क्या है? वकील हैं? उनका कभी क्रान्तिकारी प्रवृत्तियों से कोई सम्बन्ध रहा है?

कांग्रेस की बात यह है कि उसे जितना सादा बना दिया जाए उतना अच्छा है ताकि जो कार्यकर्ता रह गए हैं, वे उसे सँभाल सकें। मैं जानता हूँ, तुम्हारा बोझ अब बढ़ेगा। परन्तु तुम्हें अपने स्वास्थ्य को किसी भी तरह खतरे में नहीं डालना चाहिए। मुझे तुम्हारी तन्दुरुस्ती की चिन्ता है। तुम्हें बार-बार बुखार आना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं है। काश तुम स्वयं और कमला थोड़ी छुट्टी ले लो।

पिताजी का पत्र मेरे पास आया है। बेशक जहाँ तक उनकी मान्यता है, उतनी दूर जाना मैं हर्गिज नहीं चाहता था। मैं पिताजी को आर्थिक सहायता देने के लिए किसी से कहने की बात सोचता तक नहीं। किन्तु किसी मित्र या मित्रों से, जो तुम्हारी सार्वजनिक सेवाओं के बदले में तुम्हारी सहायता करना अपना सौभाग्य समझें, कहने में मुझे कोई संकोच न होगा। मैं तो आग्रह करूंगा कि तुम्हारी जो स्थिति है और रहेगी, उसके कारण, यदि तुम्हारी आवश्यकताएँ असाधारण न हों तो तुम्हें सार्वजनिक कोष से लेना चाहिए। मेरा अपना तो दृढ़ मत है कि कोई व्यवसाय करके या अपनी सेवा सुरक्षित रखने के लिए किसी मित्र को अपने लिए रुपया जुटा देने देकर तुम सामान्य कोष की वृद्धि करोगे। तुरन्त कोई जल्दी नहीं है, किन्तु इधर-उधर परेशान न होकर किसी अन्तिम निश्चय पर पहुँच जाओ। तुम कोई व्यवसाय करने का फैसला करो तो भी मुझे आपत्ति नहीं होगी। मुझे तो तुम्हारी मानसिक शान्ति चाहिए। मैं चाहता हूँ कि किसी व्यवसाय के प्रबन्धक की हैसियत से भी तुम देश की सेवा ही करोगे। मुझे विश्वास है, जब तक तुम्हारे किसी भी निश्चय से तुम्हें पूर्ण शान्ति मिलती होगी, तब तक पिताजी को कोई आपत्ति नहीं होगी।

सस्नेह, तुम्हारा
बापू