गंगा पार की मोनालिसा

जब घर बनाऊँगा
सबसे बाहर के कमरे में
फर्श तक फैली खिड़कियाँ होंगी
वहीं बैठकर रास्तों को घूरता रहूँगा
कविताएँ लिखूँगा छोटी-छोटी
कहानियाँ भी
राहगीर होंगे मेरी कहानियों के पात्र
शाम को छत पर बैठूँगा
सूखी पत्तियों का अलाव जलाकर
कच्ची उम्र के तजुर्बे लिखूँगा

कल्पनाओं से सौंदर्य रचूँगा
यूँ भी सुन्दरता
आविष्कार की वस्तु नहीं
कवि ही रचता है
खुद को खुरचकर
अक्षर-अक्षर खूबसूरती

हथेलियाँ रगड़कर
डायरी के पन्नों पर रख दूँगा
लाल नीले और धानी रंग से
तस्वीर बनाऊँगा
तुम्हारी
और नाम लिखूँगा
‘गंगा पार की मोनालिसा’!