प्रख्यात व्यंग्यकार और शायर इब्ने इंशा की कविता ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ एक ऐसा काव्य झरना है जिसमें भीगने के बाद उसकी नमी एक अरसे तक आपको महसूस होती है। उसी नमी का प्रभाव आतिफ़ ख़ान पर भी पड़ा और इसी ज़मीन पर उन्होंने अपने कुछ शब्दों की चिनाई कर दी। आज पढ़िए आतिफ़ की वही कविता ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’। आतिफ़ दिल्ली से हैं, हिन्दी-उर्दू शायरी के क्षेत्र में प्रयासरत हैं और उनकी अन्य रचनाएँ रेख़्ता पर पढ़ी जा सकती हैं।

‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ – आतिफ़ ख़ान

इक रात की सुलगी शबनम हो
इक दरिया सूरज बाहम हो
जो दूर मिले सागर से उफ़क़
हो रंगे हया से लाल शफ़क़
किसी ख़्वाब की लौटा-फेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

तुम सुब्ह परिन्द का गीत कोई
मैं दैरीना सी रीत कोई
में तन्हा हर्फ़ों का जंगल
जो भर दे झरनों की कल-कल
तुम ही वो महफ़िल शेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

जब सूरज मद्धम पड़ जाए
जब चाँद तपिश पर अड़ जाए
हो अम्बर को तारों की कमी
हो शाम-सहर सदियों की थमी
क़ह्त पे उम्मीद की ढेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

क़तरे क़तरे को प्यासा जग
है जैसे गदा का कासा जग
जिस से जीवन की आस मुझे
जिस अमृत की है प्यास मुझे
वो गंगा और कावेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

मैं दरगाहों के पैर पड़ूँ
मैं हर पल तेरी खैर पढूँ
अब काम कोई ना धाम मुझे
अब ज़हर कोई ना जाम मुझे
तुम मेरी दुआ अजमेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

कुछ दीन धर्म की दुहाई का
कुछ ख़ौफ़ है जग रुसवाई का
बस इश्क़ करो अब धीर धरो
अब नाम मेरा शमशीर करो
इतनी तो जी को दिलेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

मेरा जीवन टूटा प्याला
वो भी कच्ची मिट्टी वाला
बाक़ी सब केवल ख़ाक भए
तुम कूज़ागर का चाक भए
मेरी मिट्टी जिस पे बिखेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

जब तेज़ भरी दोपहरी हो
या रात बड़ी ही गहरी हो
हो फ़सले गुल या हो पतझड़
या बारिश तूफ़ाँ की हड़बड़
हो छाँव या धूप घनेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो..

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