यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि के. एल. सहगल एक कवि/शायर भी थे और निजी महफिलों में वे अपनी कविताएँ/छंद सुनाया भी करते थे, हालांकि ‘मैं बैठी थी फुलवारी में’ के अलावा उन कविताओं के पाठ की कोई रिकॉर्डिंग आज मौजूद नहीं है। कृष्ण-भक्त सहगल ने अपने जीवन में कई भजन व गीत लिखे और गाये, जिसमें वो भगवान को ढूंढते एक भक्त हैं और अंत में बोध प्राप्त करते हैं कि कृष्ण तो खुद उनके भीतर उपस्थित हैं। इसके अलावा शृंगार और विरह के भी कई गीत उन्होंने लिखे। उन्हीं गीतों में से आज उनकी सालगिरह पर प्रस्तुत है उनकी एक कविता ‘परदेस में रहने वाले आ’। पढ़िए और एक महान गायक और संगीतकार के भीतर के इस गीतकार से भी परिचित हो जाईये!

परदेस में रहने वाले आ

अब दिल को नहीं है चैन ज़रा
परदेस में रहने वाले आ
है ज़ब्त की हद से दर्द सवा
तारिक पड़ी दिल की दुनिया-
फिर अपनी मोहनी शक्ल दिखा
फिर प्यार की बातें आके सुना!
परदेस में रहने वाले आ!

जब सुबह के रंगीन जलवों में
मस्ताना हवा लहराती है
फूलों को अपने दर्द भरे
जब बुलबुल गीत सुनाती है-
एक सांप सा दिल पर लोटता है
जब याद किसी की आती है-
परदेस में रहने वाले आ!

परदेस में जा कर तू गोया
उल्फत की घटाएँ भूल गया
आँखों से ओझल होते ही
वो प्यार की बातें भूल गया
ख़ल्वत के जलवों की दुनिया
ख़ल्वत की रातें भूल गया
परदेस में रहने वाले आ!

रातों को किसी की फुरकत में
उठ उठ के आँसू रोती हूँ
बरसात की काली रातों में
बिस्तर पे अकेले सोती हूँ
और दिल को दबाकर हाथों में
नाकाम तमन्ना होती हूँ
परदेस में रहने वाले आ!

मधहोश मसर्रत हो हो कर
हर शाख शजर पर झूमती है
किस ज़ौक़ से बुलबुल आ आ कर
फूलों की महक को चूमती है
इन मेरी दोनों आँखों में
अंधेर सी दुनिया घूमती है
परदेस में रहने वाले आ!

अम्बवा की ऊंची डालियों पर
कोयलिया शोर मचाती है
पी पी जो पपीहा करता है
तबाही दिल पर हो जाती है
बुलबुल के तरानों से दिल पर
इक हैरत सी छा जाती है
परदेस में रहने वाले आ!

इन हिज्र के लम्बे वक़्फ़ों का
तुझ को कोई एहसास नहीं
बरसात का मौसम बीत चला
मिलने की अभी तक आस नहीं
क्या लुत्फ़ है ऐसे जीने में
प्रियतम जब अपने पास नहीं
परदेस में रहने वाले आ!

तू आए तो तेरे चरणों में
मैं अपना सीस नवा दूँगी
इस दुखिया दिल की बिपदा का
कुछ तुझ को हाल सुना दूँगी
जो दाग़े अलम है सीने में
एक एक तुझे दिखला दूँगी
परदेस में रहने वाले आ!

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