कविताएँ | Poetry

कविता: ‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण

‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण वे सूर्योदय की प्रतीक्षा में पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे दूसरे दिन जब सूर्योदय हुआ तब भी वे पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे जबकि Read more…

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कविता: ‘शून्य’ – गजानन माधव मुक्तिबोध

‘शून्य’ – गजानन माधव मुक्तिबोध भीतर जो शून्य है उसका एक जबड़ा है जबड़े में मांस काट खाने के दाँत हैं; उनको खा जाएँगे, तुमको खा जाएँगे। भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह हमारा स्वभाव Read more…

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कविता: ‘कहीं कभी’ – भुवनेश्वर

‘कहीं कभी’ – भुवनेश्वर कहीं कभी सितारे अपने आपकी आवाज पा लेते हैं और आसपास उन्हें गुजरते छू लेते हैं… कहीं कभी रात घुल जाती है और मेरे जिगर के लाल-लाल गहरे रंग को छू Read more…

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कविता: ‘कड़वा सत्य’ – विष्णु प्रभाकर

‘कड़वा सत्य’ – विष्णु प्रभाकर एक लंबी मेज दूसरी लंबी मेज तीसरी लंबी मेज दजीवारों से सटी पारदर्शी शीशेवाली अलमारियाँ मेजों के दोनों ओर बैठे हैं व्यक्ति पुरुष-स्त्रियाँ युवक-युवतियाँ बूढ़े-बूढ़ियाँ सब प्रसन्न हैं कम-से-कम अभिनय Read more…

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कविता: ‘रोटी’ – आकांक्षा गौड़

‘रोटी’ – आकांक्षा गौड़ रोज़ सवेरे ऑफिस जाते वक़्त ट्रैफिक की लाल बत्ती पर गाड़ी रुकती थी रोज़ देखती थी मैं उस भीड़ में ज़िन्दगी से ज़द्दोज़हद करते लोगों को कहीं ऑटो के लिए भागते Read more…

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भोपाल में थोड़ा-थोड़ा कितना कुछ है।

भोपाल पर गौरव ‘अदीब’ की एक कविता भोपाल में थोड़ा-थोड़ा कितना कुछ है भोपाल में बहुत सारा लख़नऊ है यहाँ ऐशबाग है, हमीदिया रोड है यहाँ पुलिया है और कैसरबाग सा छत्ता भी नदवा की Read more…

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कविता: ‘फूल और काँटा’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

‘फूल और काँटा’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता। मेह Read more…

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कविता: ‘देखेगा कौन?’ – शंभुनाथ सिंह

‘देखेगा कौन?’ – शंभुनाथ सिंह बगिया में नाचेगा मोर, देखेगा कौन? तुम बिन ओ मेरे चितचोर, देखेगा कौन? नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट, झाऊ की झुरमुट के बीच, यह सूनी बाट, रह-रह कर Read more…

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कविता: ‘ईद मुबारक’ – केदारनाथ अग्रवाल

‘ईद मुबारक’ – केदारनाथ अग्रवाल हमको, तुमको, एक-दूसरे की बाहों में बँध जाने की ईद मुबारक। बँधे-बँधे, रह एक वृंत पर, खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ कमल-कमल-सा खिल जाने की, रूप-रंग से मुसकाने की हमको, तुमको Read more…

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कविता: ‘आँखों की धुंध में’ – भुवनेश्वर

‘आँखों की धुंध में’ – भुवनेश्वर आँखों की धुंध में उड़ती-सी अफवाह का एक अजब मजाक है यह पिघलते हुए दिल और नमाई हुई रोटी का हीरा तो खान में एक प्यारा-सा फसाना है किसी Read more…

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अंकिता वर्मा की कविताएँ

अंकिता वर्मा की कविताएँ अंकिता वर्मा हिमाचल के प्यारे शहर शिमला से हैं। तीन सालों से चंडीगढ़ में रहकर एक टेक्सटाइल फर्म में बतौर मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव काम कर रही थीं, फिलहाल नौकरी छोड़ कर किताबें पढ़ रही हैं, Read more…

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कविता: ‘ठाकुर का कुआँ’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि

‘ठाकुर का कुआँ’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि चूल्‍हा मिट्टी का मिट्टी तालाब की तालाब ठाकुर का भूख रोटी की रोटी बाजरे की बाजरा खेत का खेत ठाकुर का बैल ठाकुर का हल ठाकुर का हल की Read more…

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कविता: ‘बिजली फेल होने पर’ – बेढब बनारसी

‘बिजली फेल होने पर’ – बेढब बनारसी फेल बिजली हो गयी है रात मेरे ही भवन में आज आकर खो गयी है आ रही थीं वह लिए थाली मुझे भोजन खिलाने मैं उसी दम था Read more…

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कविता: ‘ओ अपाहिज आस्थाओं’ – हरीश भादानी

‘ओ अपाहिज आस्थाओं’ – हरीश भादानी ओ अपाहिज आस्थाओ! घुटन-कुण्ठा-अहम् भुभुक्षा की चौकोर शैयां पर लेटी रहो- चीखो नहीं, यह नहीं होगा कि- मैं तुम पर दया करने तुम्हारे पायताने लौट आऊँ, जीव हत्या के Read more…

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कविता: ‘व्याकुल चाह’ – सुभद्राकुमारी चौहान

‘व्याकुल चाह’ – सुभद्राकुमारी चौहान सोया था संयोग उसे किस लिए जगाने आए हो? क्या मेरे अधीर यौवन की प्यास बुझाने आए हो?? रहने दो, रहने दो, फिर से जाग उठेगा वह अनुराग। बूँद-बूँद से Read more…

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कविता: ‘एक बूँद’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

‘एक बूँद’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी? देव Read more…

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ज्योति शोभा की कविताएँ

ज्योति शोभा की कविताएँ सजग पाठिका एवम सदैव साहित्य सृजन में उन्मुख ज्योति शोभा अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हैं। ‘बिखरे किस्से’ संग्रह के अतिरिक्त इनकी कई कविताएं राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।  प्रेम, Read more…

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ख्यालों को बहने दो, बनके नदिया..

मुदित श्रीवास्तव की कविताएँ मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े Read more…

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‘देर से, बहुत देर से बतानी चाहिए जाने की ख़बर!!’ – गौरव अदीब की नयी कविताएँ

गौरव अदीब की कुछ नयी कविताएँ गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ Read more…

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विशेष चंद्र ‘नमन’ की कविताएँ

विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में तृतीय वर्ष, स्नातक (गणित) में अध्ययनरत हैं। गुज़रे तीन वर्षों में कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका Read more…

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बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ

बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ यह केवल पाठकों का ही नहीं, हिन्दी साहित्य का भी दुर्भाग्य है, कि हिन्दी के लेखक और कवियों को भारत का एक बड़ा वर्ग उनके निधन के बाद पढ़ना शुरू Read more…

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जोशना बैनर्जी आडवानी की कविताएँ

आज पोषम पा पर प्रस्तुत हैं जोशना बैनर्जी आडवानी की कुछ कविताएँ। जोशना इन्टर कॉलेज में प्राचार्या हैं और कत्थक व भरतनाट्यम में प्रभाकर कर चुकी हैं। जोशना को कविताएँ लिखना बेहद पसंद है और Read more…

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‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ

‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ ‘माँ’ – मोहनजीत मैं उस मिट्टी में से उगा हूँ जिसमें से माँ लोकगीत चुनती थी हर नज्म लिखने के बाद सोचता हूँ- क्या लिखा है? माँ कहाँ इस तरह Read more…

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कविता: ‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश

‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश सुन्दर और उत्कृष्ट कविताएँ धीरे-धीरे ले जाएँगी सत्ता की ओर सूक्ष्म संवेदनाओं और ख़फ़ीफ़ भाषा का कवि देखा जाएगा अत्याचारियों के भोज में शामिल सबसे ज़्यादा स्वादों का बखान करता हुआ Read more…

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क्यों पीछे रह जाएगा युवा होने का अद्भुत आश्चर्य

कविता: ‘अकेले क्यों?’ – अशोक वाजपेयी हम उस यात्रा में अकेले क्यों रह जाएँगे? साथ क्यों नहीं आएगा हमारा बचपन, उसकी आकाश-चढ़ती पतंगें और लकड़ी के छोटे से टुकड़े को हथियार बना कर दिग्विजय करने Read more…

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कविता: ‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव

‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव तालियों से बजे पत्ते नीम के। अनवरत चलती रही थी, थक गयी, तनिक आवे पर ठहर कर पक गयी, अब चढ़ी है हवा हत्थे नीम के। था बहुत कड़वा Read more…

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वह दीवाल के पीछे खड़ी है

कविता: ‘वह दीवाल के पीछे खड़ी है’ – सुदीप बनर्जी वह दीवाल के पीछे खड़ी है दीवाल का वह तरफ़ उसके कमरे में है जिस पर कुछ लिखा है कोयले से कोयले से की गयी Read more…

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कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन

कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन एक चीख लिखनी थी एक बच्चे की चीख अरबी में, तुर्की में, यिद्दिश में, यैंकीस्तानी में असमिया, हिन्दी, गुरमुखी में चिथड़े उड़े बाप और ऐंठी पड़ी माँ के बीच उठी Read more…

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बलराज साहनी की कविताएँ

बलराज साहनी एक अभिनेता के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं, जबकि उन्होंने एक साहित्यकार के रूप में भी काफी कार्य किया है। उन्होंने कविताओं और कहानियों से लेकर, नाटक और यात्रा-वृत्तान्त तक लिखे हैं। Read more…

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कविता: ‘समाज’ – पुनीत कुसुम

‘समाज’ – पुनीत कुसुम कल एक प्राणी से मुलाक़ात हुई जब मैंने उससे उसका नाम पूछा तो वह बोला- ‘समाज’ प्राणी इसलिए कहा क्योंकि उसकी शक्ल और हरकतें मानवों से तो नहीं मिलती थीं संवेदनाओं Read more…

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झूठ बोलिए, सच बोलिए, खचाखच बोलिए

कविता: ‘खचाखच बोलिए’ – शिवा बोलिए बोलना ज़रूरी है सुनना, पढ़ना, समझना मूर्खों के लिए छोड़ दीजिए सत्ता की शय से बोलिए चढ़ गयी मय से बोलिए ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के लिए बोलिए ‘अधिकतम आउटरीच’ Read more…

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सुन्दरता कितना बड़ा कारण है..

कविता: ‘चाहिए’ – नवीन सागर एक बच्ची अपनी गुदगुदी हथेली देखती है और धरती पर मारती है। लार और हँसी से सना उसका चेहरा अभी इतना मुलायम है कि पूरी धरती अपने थूक के फुग्गे Read more…

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अंकल आई एम तिलोत्तमा!

कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

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के. एल. सहगल की कविता ‘परदेस में रहने वाले आ’

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि के. एल. सहगल एक कवि/शायर भी थे और निजी महफिलों में वे अपनी कविताएँ/छंद सुनाया भी करते थे, हालांकि ‘मैं बैठी थी फुलवारी में’ के अलावा उन Read more…

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कविता: ‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल

‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल पास के पेड़ एकदम ठूँठ हैं वे हमेशा रहते आए हैं बिना पत्तों के हरे पेड़ काफी दूर दिखाई देते हैं जिनकी जड़ें हैं, जिनकी परछाईं हैं उन्हीं में Read more…

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केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ से कविताएँ

केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ में उनकी 1968 से 1982 तक की कविताओं का संकलन है। इस कविता संग्रह को इसके प्रकाशित वर्ष में ही साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। बकौल केदारनाथ अग्रवाल- Read more…

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आसान है एक मर्द पाना जिसे तुम प्यार कर सको

कमला दास की पाँच कविताएँ अंग्रेजी और मलयालम की प्रख्यात लेखिका कमला दास अपनी कविताओं के ज़रिए स्त्री विमर्श को आंदोलित करने के लिए जानी जाती हैं। आज अगर भारतीय महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर Read more…

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एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की

‘इस बार’ – कुमार अम्बुज एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की और एक फ्रॉक बिटिया के लिए छेदों वाली साड़ी माँ की दिनचर्या से अलग हो जाएगी एक बिन्दी का पत्ता चुन कर खरीदने का Read more…

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तुम दिन भर करती क्या हो!

हमारे समाज में सदियों से एक स्त्री को लेकर आम जन की अवधारणाएं और अपेक्षाएं एक कुंठित सोच से घिरी रही हैं। पुरुष वर्ग के द्वारा स्त्री वर्ग की भावनाओं और अधिकारों की अनदेखी हुई Read more…

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मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का प्रत्येक मर्मस्थल..

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रयोगवाद के कवि थे और अपने समकालीन कवियों से काफी अलग। उनकी कविताएँ और यहाँ तक कि कहानियाँ भी मनुष्य के बाहरी संघर्षों से साथ-साथ उसके आंतरिक द्वंद्वों को एक मनोवैज्ञानिक Read more…

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घर, माँ, पिता, पत्नी, पुत्र, बंधु! – कुँअर बेचैन की कविताएँ

कुँअर बेचैन हिन्दी की वाचिक परम्परा के प्रख्यात कवि हैं, जो अपनी ग़ज़लों, गीतों व कविताओं के ज़रिए सालों से हिन्दी श्रोताओं के बीच एक खास स्थान रखते आए हैं। शब्दों की गेयता के साथ Read more…

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‘सदा एकांत में मैं सूंघता हूँ उठाकर चंद ढेले..’ – फणीश्वरनाथ रेणु की दो कविताएँ

‘मैला आँचल’ से आँचलिक उपन्यासों की परम्परा की शुरुआत करने वाले तथा ‘तीसरी कसम’ व ‘पंचलैट’ जैसी यादगार कहानियां लिखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु अपने उपन्यासों और कहानियों के लिए जाने जाते हैं। आज रेणु की Read more…

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धरती ने अपनी त्रिज्या समेटनी शुरू कर दी है..

मेरी तबीयत कुछ नासाज़ है; बस ये देखकर कि ये विकास की कड़ियाँ किस तरह हाथ जोड़े भीख मांग रहीं मानवता के लिए; मैं कहता हूँ कि बस परछाईयाँ बची है, अपना अस्तित्व टटोलते मर Read more…

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गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ हिन्दी में असगर वज़ाहत के चार Read more…

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कुछ हादसे प्रेम के दरमियान भी होते हैं..

पंखुरी सिन्हा की पाँच कविताएँ परिचय: पंखुरी सिन्हा कवि और कहानीकार हैं और इनकी कहानी व कविताओं की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पंखुरी का नवीनतम कविता संग्रह ‘बहस पार Read more…

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हरिवंशराय बच्चन की पहली और अन्तिम कविता

यह जानना एक आम जिज्ञासा है कि एक कविता लिखते समय किसी कवि के मन में क्या चल रहा होता है! इसके बावजूद कि वह कविता हमारे खुद के मन को एक दर्पण दिखाती हो, Read more…

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कविता: ‘झेलम’ – आशीष मनचंदा

प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी पैदा होता है। बिना प्रेम भरोसा नहीं, बिना भरोसे समर्पण नहीं। Read more…

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प्रेम की एक कविता ताल्लुक़ के कई सालों का दस्तावेज़ है

त्याग, समर्पण और यहाँ तक कि अनकंडीशनल लव भी प्रेम में पुरानी बातें हैं। और पुरानी इसलिए क्योंकि जब भी किसी ने इन शब्दों को इनके शाब्दिक अर्थों में ही साधना चाहा, हमेशा प्रेम हारा Read more…

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बनारस का कोई मजाकिया ब्राह्मण लगता हूँ – आदर्श भूषण

आज कुछ सत्य कहता हूँ, ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत, थोड़ी नहीं, बहुत। लोग मित्रों के साथ, झुंडों में या युगल, चित्रों से, मुखपत्र सजा रहें हैं.. ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं। कुछ महिला मित्रों Read more…

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कविता जंगलों में गश्त लगाता हुआ चौकीदार है..

जीवन में कविता का उद्देश्य सदियों से ढूँढा जाता रहा है, और कविता में जीवन का अस्तित्व भी। कभी कोई कविता यह कहकर खारिज कर दी गयी कि उसने मानवीय अनुभूतियों को अपने अंदर नहीं Read more…

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कविता: कैसे रहे सभ्य तुम इतने दिनों.. – पुनीत कुसुम

राहुल द्रविड़। एक ऐसा खिलाड़ी जिसने खेल को एक जंग समझा और फिर भी जंग में सब जायज़ होने को नकार दिया। एक ऐसा साथी जिसने अपने साथियों को खुद से हमेशा आगे रखा। एक Read more…

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कविता: ‘इस बार बसन्त के आते ही’ – पुनीत कुसुम

इस बार बसन्त के आते ही मैं पेड़ बनूँगा एक बूढ़ा और पुरवा के कान में फिर जाकर धीरे से बोलूँगा- “शरद ने देखो इस बारी अच्छे से अपना काम किया जर्जर सूखे जो पत्ते Read more…

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कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

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कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

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“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

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अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

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कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

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कविता: ‘खजूर बेचता हूँ’ – पुनीत कुसुम

न सीने पर हैं तमगे न हाथों में कलम है न कंठ में है वीणा न थिरकते कदम हैं इस शहर को छोड़कर जिसमें घर है मेरा उस ग़ैर मुल्क जाके लोगों के मुँह देखता Read more…

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पुस्तक समीक्षा | Book Reviews

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘पथिक’ – आदर्श भूषण

चलते चलते रुक जाओगे किसी दिन, पथिक हो तुम, थकना तुम्हारे न धर्म में है; ना ही कर्म में, उस दिन तिमिर जो अस्तित्व को, अपनी परिमिति में घेरने लगेगा, छटपटाने लगोगे, खोजना चाहोगे, लेकिन Read more…

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ब्लॉग | Blog

बच्चन की त्रिवेणी – मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश

आलोचना अच्छी है, अगर करनी आती हो। और अगर लेनी आती हो तो और भी। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि न तो कोई जिम्मेदारी से आलोचना कर पाता है और न ही बहुत लोग Read more…

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कविताएँ | Poetry

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रेम कविताएँ

अमूमन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम आते ही जो पंक्तियाँ किसी भी कविता प्रेमी की ज़बान पर आती हैं, वे या तो ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ होती हैं- “वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के Read more…

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कविताएँ | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

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Copyright © 2018 पोषम पा — All rights reserved.




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