पिघलती नींदें

तुम बोते हो नींदें
इसलिए
कि सपनों की फ़सल काट सको
लेकिन कभी सोचा है तुमने
उन जलती सुलगती
आँखों के बारे में
जिनके सपने हर रात के बाद
फट पड़ते हैं
ज्वालामुखी की तरह
और लावे की तरह
पिघलती उनकी नींद
जलाने लगती है उन्हें ही
उन चीखों की ख़ामोशी
इतनी भयानक होती है कि
दरक जाता है
आसमान भी
नींदों का पिघलना जारी है
जो नींदें बोयी नहीं जातीं
वही तो आसमान पर भारी हैं…