किसी आश्वस्त बर्बर की तरह

अपनी अनायास प्रवृत्तियों में
मैं देश का मध्यम हिस्सा हूँ
जो पाश की कविता में बनिया बनकर आता है
जिसे जीना और प्यार करना कभी नहीं आया

मेरे पुरखे धरती पर नहीं बिखर सके किसी बीज की तरह
नहीं उग सके खेतों में साग की तरह
उनके इतिहास से या तो मुझे भक्ति मिली
या मिला दिवालियापन

मैं देश के पूरब में भी उग नहीं पायी
मेरे धर्म में प्रतिरोध का रंग अशुभ माना गया
मैंने आजीवन मन्दिर से सटे पीपल को देखा
नहीं देख सकी निकटवर्ती जंगलों में उगे सरना के पेड़
हम सदियों से घोटते गए एक कटोरी अतिरिक्त दाल
नहीं सुन सके पठारों में भूख के बोझ से दबी
काले प्रेतों की हड्डियों के चिटकने की आवाज़

उनकी जर्जर धोती पर लगे बर्बाद सभ्यता के पैबन्द
फटी साड़ियों पर पितृसत्ता के सूखे कत्थई दाग़
मिट्टी का कटोरा, खप्पड़ की छत,
चूल्हे की अधजली राख, एक असहाय लाठी
और बियाबान आँतों की अनसुनी चीत्कार
लेकिन होठों पर वही कोई आदिम लोकगीत

उन पठारों में आज भी ज़िन्दा अवशेष मिलते हैं
एड़ियों की घिसी बारीक चमड़ियों के
जो धूप में तपकर पहले कंकड़
और अब पत्थर हो चले हैं
इतिहास एक दिन बताएगा कि कैसे
नदी में बह गए
स्लेट से बने हज़ारों चमकीले कफ़न
गुफाओं की अँधेरी दीवारों पर
कोई प्रेत लगातार घिस रहा है सफ़ेद चौक

बिना ख़ुद से पूछे
मैं मशग़ूल हूँ अपनी अनायास प्रवृत्तियों में
जिन प्रवृत्तियों में मैं किसी आश्वस्त बर्बर की तरह
देश का मध्यम हिस्सा हूँ
मतदाता हूँ, अँगूठाछाप तो नहीं?
उपभोक्ता हूँ, शरणार्थी तो नहीं?
मेरा रंग गेहुँआ है, काला तो नहीं?
मेरी खिड़की पर बेला है, पलाश तो नहीं?
मैं एक वर्ग विशेष हूँ
जंगलों को ढकता समुदाय तो नहीं?

कर्फ़्यू

वो बच्चा निसहाय, निर्दोष-सा
चौराहे पर बैठा गीली आँखों से
तपती आग देख रहा था
वो आग जो शायद उसे
एक नये घर की तरफ़ रोशनी दिखला दे
या फिर शायद उसके चर्म पर छोड़ जाए
आजीवन झुलसने का कोई दाग़
वो बच्चा जानता है
उसके हिस्से के संसार में कर्फ़्यू लग गया है
लेकिन अभी-अभी तो उसने
लड़खड़ाते क़दमों से
नये चैराहे, नये चबूतरे, नयी पगडण्डियाँ मापी थीं
एक बीती हुई गली के
पुराने लैम्पपोस्ट की लाल रोशनी में
अभी उसने कविताएँ सीखी ही थीं कि
सहसा नियति का बम फटा
सब छटक गया, वो भटक गया
चौराहे पर कुछ संशय-सा फैल गया
पुराने लैम्पपोस्ट की वह लाल रोशनी
कुछ भकाभका उठी
कविता पढ़ना अब संघर्षरत हो गया
वह उठ खड़ा हुआ कि
कुछ खींच रहा है उसे घर की ओर
वह भागा
लेकिन वह जानता था कि उसके
हिस्से के संसार में कर्फ़्यू लग गया है
वो भागा उस चबूतरे की ओर
जहाँ अब भी कुछ चाय के टूटे कुल्हड़
और सिगरेट की बुझी राख पड़ी थी
किसी साथी ने उसके बिलखते कंधों पर
एक बन्दूक़ रख दी और कहा
रास्ते में कुछ ख़ाकी-सा दिखे तो दाग़ देना
अम्मा दरवाज़ा न खोले तब भी दाग़ देना!

सहचरी

किसान मोर्चे की जितनी भी तस्वीरें देखीं
तस्वीरों में दिखीं
सारी अधेड़ उम्र की औरतें
आटा गूँदतीं, तन्दूर में रोटी लगतीं
गाजर का अचार बनातीं
और दिखे
लगभग हर उम्र के पुरुष
मैंने कोई सहचरी खोजी
तो पाया कि मेरी उम्र की सारी लड़कियाँ
हरियाणा, पंजाब के गाँवों में
लीप रही हैं चूल्हा
उनके पीछे से सम्भाल रही हैं घर को
छोटे बच्चे जो दिल्ली का मौसम सह नहीं सकते
न कुहासा, न धूप, न बारिश
और न ही पुलिस की लाठियाँ
उन सब को पाल रही हैं कुँवारी लड़कियाँ
हर शाम छत पर सूखी चुन्नी उतारते हुए
वो देखती हैं राजधानी तक फैले खेतों को
रोकती हैं छोटे बच्चों को
कि अब खेतों की तरफ़ न जाया करें।

ख़ूबसूरत

हर दूसरी लड़की की तरह
मैं चाहती हूँ ख़ूबसूरत दिखना
पर हर बार काजल, बिंदी लगाते
संशय में रहती हूँ थोड़ा
संकोच के भार से
झुमके थोड़े हल्के पहनती हूँ
कि इनको देखने वाली तिलस्मी आँखें
कहीं इनका मतलब
मेरी पहचान का विराम न समझ लें

संशय में रहती हूँ कि मेरी तस्वीरों से
उनको आती होगी
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे कौमार्य की गन्ध
कि जिसको सूँघता हुआ
किसी चाँद रात में
वो देखे मेरी देह तक पहुँचने का कोई ख़्वाब

मेरी कोमलता का थोथा भान कराने को
बहाने से मुझे असमर्थ बताने को
तुम मुझसे यह न कह दो कि
तुम्हारे पाँव बहुत हसीन हैं
ज़मीन पर न रखना इन्हें
मैले हो जाएँगे!
बेहतर हो किसी गर्मी की दोपहर
भवनों के संरक्षण से दूर
किसी घने पेड़ की छाह में
तुम सुनाओ मुझे निराला की
‘वह तोड़ती पत्थर’

मेरे भीतर कौंधता है एक सवाल
कि तुमसे ही कविता क्यों सीखूँ मैं
मेरे आईने के चौकोर फ़्रेम में
तुम्हारी ही दृष्टि का कोण क्यों देखूँ मैं
तभी अचानक
मेज़ पर रखी इतिहास की किताब
बोल उठती है—
वह तुमसे पहले निकला था शिकार को
उसको मांस तुमसे जल्दी पचता है
भरसक तुमसे ज़्यादा सहा न हो पर
तुमसे ज़्यादा रचा है उसने सभ्यता को
तुम्हारे लिंग का अतीत
आग की जिन विविधताओं में झुलसा
उस विविधता के हर प्रकार से
जड़ा गया एक नया हथियार
जिससे उसने जीते असंख्य संग्राम
और पौरुषता की परिभाषा में
बहाने से जोड़ दिया
तुम्हारे संरक्षण का दायित्व

मैंने लोगों को कहते सुना है
महज़ एक साज़िश है यह माँग
कि बिकने चाहिए बाज़ार में
बिना फ़्रेम के भी आईने
जैसे फ़्रेम का महीन घेरा ही
अन्तिम परिणति है आईने की
मैं चाहती हूँ कि कुछ आईने
गिरकर टूटें भी
ताकि उनके टूटने की घटना
दर्ज हो इतिहास में
पर किसी कविता की कोई पंक्ति में
इस घटना के साथ कभी न जुड़े
‘मर्दानी’ जैसा कोई विशेषण

मैं नहीं चाहती प्रसव पीड़ा के बदले
जगत-जननी की कोई उपाधि
तुम इतनी चेतना बना लो बस
कि मैं नहीं अकेली सर्जक इस सृष्टि की
न तुम हो एकल इसके तारणहार
कि मैं सम्बन्धों की सीमा से परे
हर तत्व की सम्भावना में हो सकती हूँ कहीं

मेरे शब्दकोश में ‘मुक्ति’ का अर्थ
नहीं था कभी तुमसे पलायन
क्योंकि मैं भी कभी उस चाँद रात में
खोजती हूँ कोई मनचाही गन्ध
पर तुम्हारी तरह उसे किसी शीशी में भरकर
नहीं देती ‘इत्र’ जैसी नायाब संज्ञा
उसके नाम लिखती हूँ एक कविता
समाज जिसका शीर्षक ‘बेग़ैरत’ रख देता है

मैं नहीं चाहती इतिहास के हवाले
कोई सहानुभूति बटोरना
मैं चाहती हूँ
तुम इतनी चेतना बना लो बस
कि ज्ञान, बोध और सत्य का
सामर्थ्य, साहस और सफलता का
नहीं होता कोई लिंग विशेष

मैं चाहती हूँ
तुम्हारी बनती चेतना में हो
बस इतनी सच्चाई
कि तुम्हारा ख़ूबसूरत कहना
मुझे कोई अपशब्द-सा लगना बन्द हो जाए।

अभिशाप

एक उदासी छायी रहती है भावजगत में
बहलती नहीं जो बसन्त के मेलों से
कितना रुदन, कितना चीत्कार
कैसा-कैसा अट्टहास
फिर भी सब अव्यक्त
सब कुछ मूक!

मस्तिष्क कोशिकाओं में बहता
किसी निशाचर असुर का रक्त
सदियों से सोया
नींद का भूखा
सपनों में सपने की दुनिया
घड़ी के डायल चुराए अतीत को लिपटी स्मृतियाँ
मरघट के द्वार खड़ा भविष्य एक
शजर से बिछुड़ते ही मुरझाने को आतुर कनेर
सब कुछ अव्यक्त
सब कुछ मूक!

हवा गर्म हाथों से सहलाती
छिपाती है रेतीले तूफ़ानों का आगमन

सदी का यही एक अभिशाप
सारा समय बीत जाने के बाद
सारा समय बचा है अभी!

बच्चियों के लिए

दुनिया औरतों की एक लम्बी सूची तैयार कर रही है
जनगणना से बेदख़ल करूँगी तुम्हें
मेरी बच्चियो!
मैं तुम्हें भगा ले जाऊँगी
तुम्हारे घर के पास की नदी
माँ गंगा, देवी गंगा के तीर से
बिना पतवार के बहती किसी नाव में ले जाकर छोड़ दूँगी
बंजर रण के बीचोंबीच
बिलखना तुम कि तुमसे शाम ढलने के पहले
नदी में पाँव डुबोने तक की आज़ादी मैंने छीन ली
तब तक न लौटना रण से जब तक न समझ जाओ कि
तुम्हारी अम्मा के पैर की उँगलियाँ नहीं कटीं किसी बिछिया से
जब तक न देख लो
अपने द्वार रखी तुम्हारे बाबा की थाली में ख़ून का कोई सूखता दाग़

ऐसी थालियों के जूठन साबुन से धुलने के पहले ही
मेरी बच्चियो!
मैं तुम्हें भगा ले जाऊँगी!

चमड़ी दो तरह पिघलती है

लड़कियाँ मसानों में नहीं जाया करतीं
इसी हवाले से हमने किसी को आग में जलते नहीं देखा
बिना देखे लेकिन इतना बता सकती हूँ
चेहरे की चमड़ी हमेशा गालों से नीचे की तरफ़ पिघलती है

जैसे आँखों के कोर बहा करते थे सारी उम्र
वो सारा अतिरिक्त जो उसने पूरे जीवन
किसी के आवश्यक से सोखा होगा
अनायास ही बह जाता है पुनः धरती की ओर
जैसे नहीं टिकती चेहरे पर बारिश की अतिरिक्त बूँदें
प्रकृति को भेद करना नहीं आता!

अतिरिक्त अभिमान भी तो गलता होगा?
जो स्नेह से उसके गुलगुल गाल खींचे थे
किसी छोटे बच्चे से गीली पुच्ची ली थी
बाबूजी जी के तमाचे की झन्नाहट
प्रेमिका के हाथों की नरम तपिश
सर्दी में अंगीठी से लगती आँच
गर्मी में चिपचिपाता पसीना
हताशा में सब कुछ छेंक लेने को तत्पर अपनी ही हथेली
हँसते वक़्त आँखों के पास सिकुड़ती झुर्रियाँ
सारा अतिरिक्त बह जाता होगा

फिर भी कुछ बच जाता है
आप क्या समझते हैं—हाड़?
नहीं!

बची रह जाती है परिजनों के गालों पर इस प्रक्रिया की जैविक पुनरुक्ति!

काग़ज़ पर रंगों से भंगिमाएँ बनाते हुए
जो मैंने पहली बात सीखी थी
वो यह कि—
सारी पीड़ा किसी अर्धवृत्ताकार ढलान की तरह
गालों से नीचे की तरफ़ बढ़ती है
और बियाबान होंठों तक जाकर सूख जाती है
जैसे रेज़ा होकर बहता है
आग में पिघलता किसी परिजन का चेहरा

विषाद में सब कुछ चेहरे से नीचे की तरफ़ गिरता है
रोती आँखों की भवें कभी तनी हुई नहीं हो सकतीं

ड्राइंग ग़लत हो जाएगी!

'कितना जानती होगी वह अपने बारे में?'

किताब सुझाव:

संध्या चौरसिया
परास्नातक (हिन्दी विभाग), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। सम्पर्क: sandhyachourasia1997@gmail.com