‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे

जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में
खुद को गले लगाना हो

जैसे कोनों में दबा बैठा भय
आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए

जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की कोई कसर ना छोड़ी हो
वह लिख दे तुम्हारी कलाई पर
‘तू कोई और है’

जैसे बीते समय का कोई पड़ाव
आकर खड़ा हो जाए तुम्हारे सम्मुख इस तरह
कि तुम्हारा वर्तमान भी फिर शर्म न करे
उसे बेशर्मी से ताक लेने में

जैसे तुम्हारा नवीन बोध
तुम्हारी अनिश्चितताओं का सिर
रख ले अपने काँधों पर
और दोनों मिलकर देखें
भविष्य में बनती एक सुन्दर तस्वीर

जैसे तुम अपने बाँये हाथ में
अपने सपनों का दाँया हाथ थामे बोल दो
‘वही कहानी फिर एक बार?’

जैसे तमाशबीन हो तुम
गए थे तमाशा ‘देखने’
किन्तु परतें कुछ इस तरह से खुलें
कि ज्ञात हो
कि उस कहानी के मुख्य किरदार…
…तो तुम थे।