वह मर्द थी

जिन दिनों मैं उसके यहाँ पहुँचा, वह अपने होटल को करीनेदार बनाने में लगा हुआ था। आल्मारियाँ बनायी जा रही थीं। लोहे की पतली जालियाँ उन आल्मारियों के लिए काटी जा रही थीं। कुर्सियों की हिलती हुई टाँगों में जोड़ लगाकर हिलने से रोका जा रहा था और सबसे ज़रूरी बात थी कि पुताई भी हो रही थी। और जिस समय मैं उसके यहाँ पहुँचा, वह बाहर जाड़े की धूप में बैठा नाई से बाल बनवा रहा था, या कहा जाए कि वह बनवा चुका था और इस समय गरम जर्सी के साथ कमीज़ और बनियान ऊँची किये बगलें बनवा रहा था। उसका तोंदल गोरा शरीर धूप में भूराभूरा चमचमा रहा था। नाभी के पास बालों को एक काली नागिन पेट पर चढ़ती हुई उसके सीने पर दोमुखी हो छितरा गयी थी।

शुरू दिन ही मेरा उससे झगड़ा हो गया था… नींबू को लेकर। पाँच आने में वह दाल, एक सब्जी और ‘रोट्टियाँ’ दे सकता है, मगर वह नींबू खाने का कायल नहीं… शिकंजवी की बात और है । फिर कभी कभाक की बात हो तो, रोज नींबू देने बैठे तो एक आने का तो नींबू ही हो गया, उसे क्या बचा? मैंने हुज्जत की, वह कन्नी काट गया। तब संधि इस बात पर हुई कि नींबू मँगवाऊँगा मैं और प्याज, हरी मिर्च देगा वह। इस तरह हम दोनों अपनी विभाजित जीतों को लेकर एक दूसरे के करीब आये।

वह और उसके नौकर कोई भी सलाम करने की ज़रूरत किसी से अनुभव नहीं करते, पर दो चार दिन बाद से मुझे ‘नमस्तेजी’ मिलने लगा और मेरी मध्यमवर्गीय इज्जत तथा अहं को इससे अच्छा ही लगा। मुमकिन था कि इसी तरह बिना बोले-चाले मैं उसके यहाँ खाता चला जाता। ज़्यादा दिनों की बात भी नहीं थी, घर के लोग बाहर गये थे… लेकिन उस दिन एक घटना घटी। घटना थी…

उस दिन मैं रोज के देखते जल्दी आगया था, और अकेला बैठा खाना खा रहा था। मेरी रोटी खत्म हो गयी थी और रोटी की आशा में चुप बैठा था। तभी वह होटलवाला (बारबार होटलवाला कहूँगा तो आप बुरा मान जाएँगे, चलिए मान लीजिए उसका नाम है- शादीलाल) बाहर से गोश्त लेकर लौटा।

“नमस्तेजी।”

“कहो शादीलाल! कैसा चल रहा है?”

“त्वाड़ी मेरबानी है जी।”

उसने अपनी बत्तीसी दिखा दी। वह फिर बोला:

“क्या चाइये बाबूजी… रोट्टी? …ओ ए ऽऽबाबूलाल!”

न तो ‘बाबूलाल’ और न किसी दूसरे नौकर ने ही शादीलाल को जवाब दिया। ग्राहकों को न देखकर और मालिक को बाजार गया समझ शायद वे पीछे पत्ते खेल रहे हों। जो भी हो शादीलाल झुंझलाया बहुत और पार्टीशन में लगी खिड़की के पार झांकते हुए बोला:

“तू ही क्यों नहीं दे देती?……..”

पार्टीशन के पीछे से किसी ने अपनी ठेठ पंजाबी में झल्लाते हुए बता दिया कि क्या उसे रोटियाँ भी बनानी होगी और खिलाना भी?

मैं सकते में आ गया, वयोंकि कभी न आते, न जाते… कभी तो किसी औरत की शकल इस होटल में मैंने नहीं देखी, फिर आज ये शादीलाल किसे पकड़ लाया? इतनी देर से मैं बैठा हुआ खाना खा रहा हूँ, पार्टीशन के इस दरवाजे में कभी तो इस बनानेवाली की चूड़ियों की आवाज सुनायी देती। रंगीन (मैला ही सही) सालूका पल्लू तक नजर नहीं आया । मगर अभी-अभी रोटियाँ तो वह मरियल सा रसोइया बना रहा था, जो रोज़ बनाता है। जिसे किसी भी चीज की तमीज नहीं। …जिस समय रोटियाँ लेकर वह जवाब देने वाली आयी तो मुझे खासी हैरत हुई। क्योंकि यह तो वही रसोइया था… तो क्या यह औरत है? मर्द नहीं? …तो क्या यह औ…र….त है??

मुझे एकदम घिन आ गयी उन रोटियों पर, और उसपर वितृष्णा… जिसे मैंने औरत नहीं समझा था।

जिसे मैंने औरत नहीं समझा था वह रोज सने आटे की पीतलवाली परात के सामने खड़े होकर आटे के उस गोल पहाड़ में से, जिस पर एक गन्दा सा कपड़ा मक्खियों से बचने के लिए होता, थोड़ा-सा तोड़ लोइयाँ बनाती गोल-गोल। मैं जहाँ बैठता हूँ वहाँ से और पार्टीशन के दरवाजे से बस इतना ही दिखता है—लेकिन सोच सकता हूँ कि सामने की उसी ऊँची टेबल पर लकड़ी का एक पट्टा होगा या गोल चकला, जिस पर नाटी होने के कारण पंजों पर खड़े होकर इन लोइयों की रोटियाँ बनायी जाती होंगी… फिर सीने के बराबर ऊँचे चूल्हे पर रखे बड़े-से तवे पर सेंक कर लहकते अँगारे भरे दूसरे चूल्हे पर उन्हें सेंका जाता होगा और जिन ‘रोट्टियों’ को वो ‘बाबूलाल’ तथा दूसरे लड़के बिना राख झाड़े ही ‘इस साबको’, ‘उन बाबूजी को’ या ‘ओ सेट्ठ जी’ के सामने ढेर में गंजा देते हैं।

जिसे मैंने औरत नहीं समझा था वह… नाटे कद की, बच्चों के बराबर मुँह, गैहुँआ मुरझाया रंग, झुरियों भरा चेहरा, पतले हाथ और हड्डी भरी हथेलियाँ। उन हथेलियों की लकीरों में बर्तन साफ करते वक्त गिचगिची कलासी चीठी राख या रोटियाँ बेलते समय गीली लोई का आटा भर जाता है और जिसे वह पीतल की परात के ऊँचे किनारे से रगड़ कर निकालती है। फुर्सत के समय उन लकीरों में भाग्य या लक्ष्मी ऐसे ही चिपकती है या नहीं… नहीं मालूम। पैरों में लकड़ी की चट्टियाँ। बहुत ही कम घेर की गन्दी सफेद सलवार- जिसपर चीठी राख धूल, हल्दी की पोंछी हुई अँगुलियों के लम्बे निशान, दाल तरकारियों के रंग-बिरंगे धब्बे। नाड़े का झूमरदार फुंदा लटकता हुआ। एक छींट की चुस्त, देह से सटी कुर्ती जो दूर से (दूर से ही क्या, पास से भी) देखने पर मैले कुर्ते सी, जिसपर छींट के नन्हें-नन्हें फूल भी हैं, यह मुझे तभी मालूम हुआ जब मैंने उसे औरत समझा। छातियाँ मर्दों की सी। सिर पर एक बड़ी-सी चादरनुमा कोई चीज फूली-फूली बँधी हुई। गले में आँट देकर जिसके दोनों पल्लू पीठ पर लम्बे गिरे हुए। उसके चलने पर वे पल्लू हिलते। उन्हीं पल्लुओं से वह मुँह की राख झाड़ लेती, पसीना पोंछ लेती, शायद गर्मियों में पंखा भी उसी से कर लिया जाता हो, नाक साफ कर ली जाती, चूल्हा धम (धौंक) लिया जाता… याने वे पल्लू दुनिया के हर मर्ज की दवा थे। हल्की बारीक भीगी मसें। पथराया ठण्डे गोश्त-सा चेहरा। मिट्टी में टोप दी गयीं की तरह वे पीली जर्द आँखें।

और खाना मुझसे खाया नहीं गया।

छिः छिः, कितनी गन्दी औरत है यह जो रोटियाँ बेल रही है। अगर औरत है तो। और मुझे शादीलाल आदमी अच्छा नहीं लगा। अपने होटल में एक तो औरत रखता है और फिर इतनी गन्दी… अरे, ये होते ही ऐसे हैं। शायद ये औरत भी इस होटल की एक तरकारी हो।

दूसरे होटल का मन में निश्चय करके मैं उस दिन एक रोटी कम खाकर उठ गया। इतना गन्दा खाकर तो उल्टा बीमार पड़ जाऊँगा। यह कम्बख्त शादीलाल… दूसरों से ज्यादा नहीं, तो बुरा भी नहीं कमाता। पर क्या मजाल कि इस बात की कोशिश भी करे कि गाहक नये आएँ। गरजमन्द की बात न्यारी है। आएगा नहीं तो जाएगा कहाँ? पर कुछ अपना भी किया धरा होना चाहिए। बिस्कुट और बन, डबल रोटी तथा मक्खन के लिए एक दो जालीवाली आल्मारियाँ बनवा लेने से होटल करीने के हो गये होते तो फिर सब न कर लें? अण्डेवाले, दूधवाले, छड़े दुकानदार या ऐरे-गैरे नत्थू खैरे आ गये तो बस हो गया काम… मक्खियाँ चीजों पर उड़ती रहेंगी। टेबलें साफ की जाएँगी तो लोगों के कपड़ों पर जूठन गिरेगी ही गिरेगी ज़रूरी बात है। चाहे आप सूट पहने हों, यो तहमद लपेटे हों, शादीलाल के यहाँ का तो यही दस्तुर है।

रोटियाँ एक साथ प्लेटों में गँजा दी जाएँगी। गन्दे गिचगिचे गिलासों में तिलकटा पानी टेबल पर जोर से पटक कर दिया जाएगा। किसी दूसरे को प्याज खाते देख आपके माँगने पर दो बार अनसुना कर दिया जाएगा, और अगर लाया गया तो प्याज के साथ कंकड़ भी चबाइए। भला कोई पूछे तो इस शादीलाल से, कि अगर इस सब पर आने वाले को शऊर भी न मिला तो कोई क्यों आएगा? आवाजें दीजिए… लौंडे हैं कि कानों में तेल डाले बैठे हैं।

अब यह बात दूसरी है, कि बेचारा पाँच आने में खाना भी अच्छा दे और ऊपरी टीमटाम भी हो। खाना सस्ता भी है। तरकारियाँ बुरी नहीं देगा… खूब उबली होंगी, मसालों में पकाएगा भी… फिर शादीलाल कहता भी तो है:

“बाबूजी! आलू भी गोश्त के माफक ही दूंगा।”

और उसकी आँखों में चमक आ जाती है ।

नान तो पहले बनाता था वह, मगर आज भी बड़ी बड़ी जगहों के मुकाबले कबाब अच्छे ही देगा। फिर सौ बात की एक बात भई, शादीलाल नेकदिल है, लापरवाह ज़रूर है मगर मनमौजी और जीवट का है। वरना दिल्ली की रहास यों ही आफत और फिर क्या था इस बेचारे के पास? जान हो, पहचान हो, कभी भी ‘हसाब’ पूछेगा नहीं, पैसे गिनेगा नहीं।

हाथ धोकर मैं रूमाल से हाथ पोंछ रहा था कि वह बोली… वैसे वो किसी से कभी भी नहीं बोलती… बस बात की बात कर ली, बहुत हुआ तो:

“क्यों बाबू जी! आज एक रोटो कम खायी?”

“नहीं तो, रोज के जितना ही तो खाया है…!”

और नोट मैंने ‘बाबूलाल’ को दिया।

“रोज तो तुसी पाँच खाते हो जी, अजि चारै…”

लोई उसकी हथेलियों में सोचते हुए गोल हो रही थी।

“त्वाड़ी रोट्टी बाबू कल से ठीक बनाएँगे।”

और मेरी ‘रोट्टियाँ’ ठीक तो क्या बनीं; पर उस औरत के ‘नमस्ते जी’ में आत्मीयता आ गयी। शादीलाल कई दिनों से मेरे पीछे पड़ा हुआ था, बात थी उसके कबाबों की। मैं गोश्त नहीं खाता, क्योंकि एक तो शौक नहीं और दूसरे ‘सूट’ भी नहीं करता। मगर शादीलाल भला एक बँधे ग्राहक को अपने मशहूर कबाब एक बार भी न खिलाये, यह जरा नामुमकिन सी बात थी। मुझे क्या पता कि सीक कबाब में ज्यादा परेशानी होती है या शामी कबाब में। पूछने पर कह दिया था:

“अच्छा शादीलाल! तो फिर सीक कबाब।”

“तो पादशाओं… सैटरडे नाइट रही पक्की, भुल नहीं जाना तुसी। अरे बाबू जी, तुसी भी याद करोगे लौरवाले शादीलाल नू।”

और वह टीन की कुर्सी पर बैठा-बैठा अपनी पतली पूँछे उमेटता रहा।

शनिवार की रात को जब मैं शादीलाल की होटल पहुंचा तो आज उसने बड़े जोर से ‘नमस्ते जी’ झाड़ा। मंड़ी के कोने में यह होटल ही लाइटों से भरा था, बाकी दुकानों में, कुछ में अँधेरा और कुछ में कम पावर के बल्ब पीली रोशनी दे रहे थे। लोगबाग बाहर दीवालों पर टँगी खाटें दुकानों में बिछा कर सुस्ता रहे थे।

मेरे बहुत कहने पर भी शादीलाल साथ खाने नहीं बैठा। आज वह दिन भर कबाबों के पीछे ही पड़ा रहा। जब गोश्त को सीकों पर चढ़ाने की बात आयी थी, तब से शादीलाल ने किसी दूसरे को उन्हें छूने नहीं दिया। आज की रोटियों के लिए आटा भी उसने अलग सनवाया था। उसने मनाही कर दी थी कि बाबू को आज कबाब के अलावा और कुछ न दिया जाए: कबाब और रोटियाँ!!

फूली फूली सफेद लाल बुंदकियों भरी रोटियां आती रहीं और मैं मिर्च वाले सौंफ की खुशबू के कड़क सुर्ख कबाब खाता रहा। शादीलाल अपनी उसी चाय की भट्टी के पास बैठा हुआ सन्तोष के साथ बीड़ी पी रहा था। खाते वक्त वह मुझसे आँखें मिलाने को भी तैयार नहीं था। मेरे बार-बार बुलाने पर यही कहता रहा:

“पैले तुसी खा लो जी बादशाओ… गल्लाँ फेर कर लांगे…”

रोटियाँ बनाते हुए उस औरत की आँखों में कितनी आत्मीयता थी? वे हड्डियाँ भरी हथेलियाँ, मुलायम लोई पर बहुत हौले घूमतीं… कैसे उम्दा सफेद गरम फूलों सी रोटियों को उस औरत के हाथ जनम दे रहे थे। बाबूलाल से मैंने कहा कि महराजिन से कहो कि एक आखिरी रोटी जरा खूब सिकी सी बना दे।

“ओ ऐ माराजिन नहीं बाबूजी! मेरी माँ है।”

कबाब के बदले दाँतों ने मेरी जीभ काट ली। गरम-गरम कबाब मेरे तालू में जलने लगा। मैं अचकचा कर उस ‘बाबूलाल’ को देख रहा था… छिले आलू में जैसे किसी ने दाँत और आँखों के गड्ढे बनाकर कह दिया हो कि ये ‘बाबूलाल’ है, और सबने उसे मान लिया कि हाँ वह सचमुच का ‘बाबूलाल’ है।

खाँसते हुए शादीलाल ने वहीं से पूछा,

“ए की होया जी पादशाओ ! बाबूलाल…”

बाबूलाल ने पंजाबी में शादीलाल को बताया कि बाबू जी ने माँ को महाराजिन समझा।

सच ही मुझे इस बात पर स्वयं पर बहुत क्रोध भी आया कि मैंने ऐसा क्यों समझा? पर और समझता भी क्या।

शादीलाल अब उठकर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया था। उसके कानों की सोने की दोनों छोटी-छोटी मुकियाँ बल्ब में चमक रही थीं।

“बाबूजी ! त्वानू पत्ता नेई, ए बाबूलाल मेरा लड़का है और ओ मेरी बीबी…”

“मुझे माफ करना शादीलाल!”

और मैं बिना कुछ कहे-सुने होटल से भागा।

छोटी-छोटी लेनों में से पैर बढ़ाये घर की ओर बढ़ा जा रहा था। किसी के रेडियो से ‘नेशनल प्रोग्राम’ हो रहा था। छोटे-छोटे बंगलों के अहातेवाले फाटक, दरबाजे, खिड़कियाँ सब बन्द थे। उजालदानों से बँधी-बँधी रोशनियाँ आ रही थीं। तेज ठण्डी हुवा सपाटे मारती हुई चल रही थी। दूर पर गोल चौराहों की लाल बत्तियाँ जल रही थीं।

मैं अपने से भाग जाना चाहता था। दिमाग में उठते हुए प्रश्नों से मुंह छिपा लेना चाहता था। ठण्डे कपड़ों में मेरा गरम शरीर भुरभुरा रहा था। रोओं की जड़ें तक फूल रही थीं।

जिसे मैंने औरत नहीं समझा था वह…

औरत भी है, पत्नी भी है औ माँ भी है।

शादीलाल उसका पति है…

और बाबूलाल उसका लड़का है…

वो औरत उसकी माँ हैं।

मगर ये कैसी औरत है?… उसके लम्बे बाल कहाँ हैं?… पीठ पर के पल्लुओं में हों… मगर छुपाने की क्या जरूरत है? जवान शादीलाल की जवान बीबी क्यों नहीं? कब्र की तरह बुझी, ठण्डी… सलवटों भरे गाल… सर्द कौड़ियों की तरह… नहीं राख भरे बुझे कोयलों सी आँखें… शादीलाल की बीबी ऐसी क्यों हैं?… क्या बात है? जिसके ऐसी बीबी हो वह भी इतना खुश रह सकता है?… सुर्ख कबाब… सर्द सुफेद लाल बुंदकियों भरी रोटियाँ, गरम सोंधी गंध के
रोटियों के फूल… छिले आलू सा बाबूलालू… और मैं उस रात करवटें बदलता रहा।

दुनिया में सब बात के नियम हैं। मोटी सी बात है कि दूध पीने से स्वास्थ्य बढ़ता है, या खुशामद करने से नौकरी मिलती है या बरकरार रहती है। शादीलाल का भी नियम है, और जिसे वह बड़ी ही बेफिक्री से सुनाता है…

“अपना तो बाबूजी ए असूल है कि कुछ मत्त मानों फेर वो दीन हो या दुनिया”… लेकिन शादीलाल के कहने भर से क्या होता है। वह ऐसा ज़रूर कहता है, पर झूठ कहता है। क्योंकि अपने होटल के लिए उसका यह नियम है जैसे…

पार्टीशनवाले दालान से लगे उन दोनों कमरों में, जहाँ कि लोग खाना खाते हैं, हर इतवार को गेंदे की नयी मालाएँ लगायी जाएँगी और पुरानी उतारी जाएँगी। छत के बीच से दीवारों तक मालाओं का मण्डप सा उस दिन तन जाता है… लाल पीले गेंदे के फूलों का मण्डप। पता नहीं क्यों शादीलाल को गेंदा ही पसन्द है। एक दीवालघड़ी है उसके पास, जिसके पेंडुलम वाले शीशे में सुरैया की तस्वीर चिपकी हुई है। तस्वीर की आँखें काटकर पेंडुलम में लगा दी गयी है और पेडुलम के हिलने से सुरैया दिन भर आँखें मटकाती रहती है। दीवारों पर सोप कम्पनियों, बीड़ीवालों, घड़ीसाजों के कैलेन्डरवाले राधाकृष्ण, बालगोपाल, लक्ष्मी, सरस्वती आदि हैं, तो गुरुमुखी में छपे हुए कैलेन्डरों में गुरुसाहब का वंश, अमृतसर का स्वर्णमन्दिर, लाहौर के किले की दीवार में गुरुसाहब के दो बेटों को चुनवानेवाला चित्र, बेला बजाते अशोक कुमार वाला पोस्टर, जिसके सिनेमा के नाम वाला हिस्सा हवा में बरसों से उड़ते रहने के कारण फट गया है। सभी तो हैं। इतवार को शादीलाल खुद या तो अपने हाथों से या खड़े रह कर इन्हें झड़वाना, पुंछवाना करवाता है। पानी से एक-एक चीज धोयी जाती है। छत में टँगा लोहे की तीलियों वाला अंडों का छीका भी इस ‘वीकली बाथ’ से नहीं बच पाता।

रात को मैं देर से ही जाता हूँ उसके यहाँ। शनिवार की उस दिन वाली मेरी भूल के बाद शादीलाल और मैं बहुत निकट आ गये थे। अब वह कभी-कभी अपने प्लान सुनाया करता है कि वह भी ‘कनाटप्लेस’ में ‘काके दा होटल’ से भी अच्छा होटल खोलना चाहता है मगर… और इस ‘मगर’ के पेट में पता नहीं शादीलाल की कौन सी इच्छाएँ, उम्मीदें खोयी हुई हैं, और क्यों? लेकिन वह ‘मगर’ शादीलाल का पीछा नहीं छोड़ता है। बातें शुरू तो करता है जवानों की तरह, लेकिन उस ‘मगर’ के बाद वह एक दम पीला जर्द हो जाता है… कहीं खो जाता है, उसकी वे आँखें महज दो चमकते हुए गड्ढे भर रह जाती हैं जिनमें न आब, न रोशनी।

आज भी मैं देर से पहुँचा तो देखा कि शादीलाल बाँस में पलीता लगाये तस्वीरों के पीछे के दो-तीन मधुमक्खी के छत्तों को जलाने में लगा हुआ है।

“क्या कर रहे हो शादीलाल?”

“कुछ नहीं जी, ए भँमरमाल…”

और मधुमक्खियाँ छोटी खिड़की से बाहर उड़ी जा रही थीं।

शादीलाल बातूनी भी कम नहीं। दिल्ली की खुश्क सर्दियों में खाने के बाद लाल आँच में गरमाते हुए शादीलाल के साथ रावी और “लौर” की सैर भी कम दिलचस्प नहीं होती। घूम-फिर कर बातें पार्टीशन के झगड़ों तक ही रोज होती थीं, उससे आगे नहीं। आँच पर अँगुलियाँ उलटते-पलटते हुए बोला:

“बाबूजी! क्या नहीं हुआ उसके बाद? मारकाट, जोर-जुलुम, छीना-झपटी! सब, ये सब हुआ बाबूजी! औरतों की अस्मत और आबरू कोई चीज़ रह गयी थी? कुछ नहीं जी, ककड़ी के टूटने में तो थोड़ी आवाज भी होती है, मगर उतनी भी आवाज नहीं हुई। मकान में जब आग लग जाती है न जी, तब कैसी दीवारें काली-काली और बदशकल हो जाती हैं। बस वैसे ही समझ लो जी… हमारे सबके जिस्म हो गये जी… वैसे ही तो हैं.. हम सब बाबू जी…”

चप्पलों में ठिठुररते हुए अपने पैरों को आँच पर सेकते हुए मैंने कहाः

“हाँ भाई ! मगर तुम तो सही सलामत आ गये न…”

और वह हँसा… जैसे पेट में या पसलियों के पास कहीं बड़े जोर का जानलेवा दर्द उठा हो…

“अभी आपने जिन्दगी देखी नहीं जी… याद है, मैंने आप के लिए कितनी मोहब्बत से कबाब बनाये थे? और आपने मेरी बीबी को, बाबूलाल की माँ को, उस दिन माराजिन कहा था… बाबू जी! सच्ची केता हूँ, बौत गुस्सा आया था आप पर… बौत ही ज्यादा… नेजा मार देता जी…”

और मैं काँप गया। मेरी पिंडलियाँ फड़क रही थीं। वह हल्के हँसते हुए बोला:

“डरिए नहीं बाबू जी! किस्मत ही फूटी हो तो फिर क्या… जाने दीजिए जी!”

और उसने मेरे कंधे थपथपा दिये। अँगीठी की लाल आँच में उसका मुँह तपाये ताँबे सा लग रहा था।

“शादीलाल, मुझे मालूम नहीं था, बहुत शर्मिन्दा हूँ, माफ करना।”

उसकी बल्लेदार मजबूत बाँहोंवाली खुरदरी हथेलियों ने मेरी कलाइयाँ कसकर थाम लीं।

“बाबू जी, माफी की क्या बात है, पर एक बात हमेशा जी, पसलियों में फंसी रहती है…”

और इतना कहकर वह चुप हो गया। शायद उसका दर्द और गुस्सा उन खुरदरी हथेलियों में लोहे की तरह धात बन गया था… मेरी कलाइयाँ दर्द कर रही थीं।

“इसमें छुपानी क्या बाबू जी… ईमान की बात है… मेरी बीबी बेइज्जत की गयी, सरे आम और उसकी दोनों छातियाँ काट डालीं…”

कलाइयों पर लोहे के पंजे गड़ रहे थे। और पार्टीशन के उधर से शादीलाल की बीबी परात पर जोर से चिमटा बजाते हुए चीखी,

“ओ ए, चुप कर, तैनू हो कुछ नई आन्दा?”

कान पर रखी आधी जली बीड़ी पर शादीलाल का हाथ गया।

मैं उठ पड़ा। शादोलाल की आँखें… दो लाल उबलते तेल के… तले के कुछ नहीं, बस वे आँखें फुँफकार रही थीं।

दस बजे रात का कुहरा घना होता जा रहा था। सर्द हवा पेड़ों पर से कूद-कूद सड़कों पर बेतहाशा दौड़ लगा रही थी। मेरे मुह, हाथ, पैर सब थीजे (जमे) जा रहे थे।

मैंने जिसे औरत नहीं समझा था…

छातियाँ कट जाने के बाद… शायद फिर माँ न बन सकी… दूध जो न उतरता होगा… उससे उसकी इज्जत और छातियाँ लेकर लोगों ने उसे मर्द बना दिया… बिना दूध की छातियों वाली शादीलाल की बीबी… बाबुलाल की माँ… मर्द है… नहीं, कल से वहाँ नहीं जाऊँगा…।