92 से पहले

पुराने लखनऊ की टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ और इन गलियों के आस-पास बसे ढेर सारे घर। हर शहर की तरह यहाँ भी इंसान बहुत ज़्यादा और बाक़ी जानवर बहुत कम थे। शहरी जानवर जो अपने जंगल की यादें दिल में बसाए यहाँ आ गए थे, खाने-पीने की तलाश में दर-ब-दर भटका करते। ये सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता चला आ रहा था। कुत्तों ने तो अपनी मासूमियत का सहारा लिया और इंसान का दोस्त बन बैठा लेकिन बाक़ियों के लिए ज़िंदगी उतनी आसान नहीं थी। ख़ासकर ढीठ बंदरों के लिए जिन्हें आत्म-सम्मान भोजन से ज़्यादा प्रिय था। वो आज भी अपनी पसंद की चीज़ें अपनी हिम्मत और फुर्ती के बल पे लेना पसंद करते थे, बजाय पूँछ हिलाने के… और इन्हीं बंदरों में से एक था नन्हा झबरू।

बाक़ी बंदरों की तरह झबरू भी दिन भर इधर-उधर खाने की तलाश में घूमता। कभी ये छत तो कभी वो बालकनी। इतना घूमने-फिरने के बाद मिलता भी क्या था, कभी अचार बनाने के लिए सुखाए जाते खट्टे आम तो कभी होली की तैयारियों में सूख रहे पापड़। हाँ, कभी क़िस्मत अच्छी हो तो कुछ अच्छा भी मिल जाता जैसे छतों पे सूख रहे मीठे अमावट या अकेले बैठ के पराँठे खाता कोई छोटा इंसान। इन छोटे इंसानों को डरा के सामान लेना बहुत आसान होता था और झबरू को इस काम में मज़ा भी बहुत आता। कभी किसी घर का दरवाज़ा ग़लती से खुला मिल जाए फिर तो पूछो मत। खाने से ज़्यादा घर भर के सामान से खेलने में मज़ा आता था झबरू को। ढेर सारा खाना देख के वो बहुत ख़ुश होता और सबकुछ इधर-उधर बिखरा के चला जाता लेकिन कभी ये ख़्याल नहीं आता कि कल के खाने लिए ये सामान कहीं जा के रख लिया जाए। शायद उसे भी बाक़ी बंदरों की तरह अपनी क़ाबिलियत पे भरोसा ज़्यादा था और क़िस्मत का डर कम।

एक दिन हमेशा की तरह झबरू खाने की तलाश में इधर-उधर घूम रहा था लेकिन ना तो किसी छत पे कुछ सूख रहा था ना मोहल्ले के गिने-चुने पेड़ों पे कोई फल था। खाने की तलाश में घूमते-घूमते झबरू एक घर के सामने पहुँचा जो कुछ अजीब सा था। एक तो वो घर बहुत खुली जगह में बना था और उस घर में कोई दरवाज़ा भी नहीं था। जिसकी मर्ज़ी होती वो उस घर जा सकता था। एक और अजीब बात झबरू ने देखी, वो ये कि इस घर में लोग हाथ जोड़ के आ रहे थे। वो अपने साथ ढेर सारी खाने-पीने की चीज़ें लाते और घर के अंदर छोड़ के चले जाते। इंसानों का ये रूप झबरू के लिए बिल्कुल नया था। इस नए रूप की सबसे अजीब बात ये थी वो लोग जाते वक़्त वहाँ खड़े बंदरों को खाने की चीज़ें दे जा रहे थे।

झबरू ने अपने लाल-लाल गाल पे धीरे से थप्पड़ मारा और तभी एक बूढ़े इंसान ने उसे एक गोल-गोल चीज़ दी। भूखे झबरू ने झट से वो छोटा सा गोला अपने मुँह में रख लिया।

ओहो!! ऐसा स्वाद! ऐसी ख़ुशबू!

झबरू ने अपने दूसरे गाल पे ज़ोर से थप्पड़ मारा लेकिन ये कोई सपना नहीं था। झबरू की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। वो इधर-उधर उछलने-कूदने लगा। दिन भर झबरू को जो कुछ मिलता वो खाता रहा। खा-खा के जब पेट फटने की नौबत आ गयी तो वो उसी घर के पास सो गया।

2

धीरे-धीरे नन्हा झबरू खा-खा के मोटा होने लगा और पहले से बड़ा दिखने लगा। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी बढ़ती क़द-काठी एक नई मुसीबत ले के आएगी लेकिन धीरे-धीरे वो समझ गया कि इस घर में भी लोग नन्हें-मुन्ने बंदरों को ज़्यादा प्यार करते हैं। मोटे-तगड़े बंदरों को अपने लिए खाना जुटाने के लिए छीना-झपटी ही करनी पड़ती है। अब उसके लिए खाना जुटाना इतना आसान नहीं रह गया था।

एक शाम झबरू इधर-उधर घूम रहा था। वो बहुत दिन बाद पुराने घरों की तरफ़ आया था। लोग छतों पे बैठ के चाय पीते हुए बातें कर रहे थे। अचानक उसे लगा कि कोई उसकी बात कर रहा है और वो ध्यान से सुनने लगा।

“अरे भैया! अयोध्या के बंदरों का तो पूछो मत… ये मोटे-मोटे तंदुरुस्त बंदर और लोग भी बड़े प्यार से उन्हें प्रसाद खिलाते हैं। हम लोग के यहाँ ऐसे बंदर आ जाएँ तो लोग डर के मारे घर से ना निकलें… हेंहेंहें… और एक बात है… बकर…बकर…”

झबरू ने आगे नहीं सुना लेकिन अब उसे मालूम था कि ये कोई बहुत अच्छी जगह है और अब वो वहीं जाएगा लेकिन जाए कैसे। तभी उसे एक रास्ता सूझा। झबरू बस अड्डे पहुँच गया। उस ने बंदरों से सुना था कि इंसानों को कहीं जाना हो तो वो यहाँ आते हैं और उस जगह का नाम ले के चिल्लाते हैं लेकिन कई दिन तक भटकने के बाद भी झबरू को कोई नहीं मिला जो ‘अयोध्या-अयोध्या’ चिल्ला रहा हो।

झबरू कई दिन तक बस अड्डे पे भटकता रहा। धीरे-धीरे झबरू को लगने लगा कि अब शायद वो कभी अयोध्या नहीं जा पाएगा। वो वापस जाने की सोचने लगा था। उसे बस अड्डे पे रहना अच्छा भी नहीं लगता था। एक तो वहाँ कुछ खाने को बड़ी मुश्किल से मिलता और ऐसा लगता था कि पूरे शहर के सबसे गंदे इंसान इसी जगह आ गये थे। हर वक़्त अपने सामान को कलेजे से लगाए रहते और हर किसी को ऐसे देखते जैसे बस वो सामान ले के कहीं चला जाएगा, चाहे इंसान हो, कुत्ते हों या बंदर। शुरू-शुरू में झबरू को लगता था कि इन सामानों में बहुत अच्छी खाने की चीज़ें होती होंगी लेकिन एक दिन एक इंसान की अटैची खुल गयी और ढेर सारा सामान बिखर गया। आधे से ज़्यादा तो बस कपड़े थे और कुछ पन्ने। झबरू का मन हुआ कि वहाँ आने वाले हर इंसान से कह दे कि ‘बेफ़िक्र हो के बैठो हमें तुम्हारी अटैची-बक्सा नहीं चाहिए… कम से कम कुत्तों और बंदरों को तो नहीं…’ फिर वो ये सोचने लगा कि आख़िर इंसान भी क्या ही करते होंगे कपड़े और पन्ने छीन के किसी के लेकिन थोड़ी देर में ही उसे लगा कि ये इंसान नाम का जानवर उसकी समझ से बाहर है तो बेहतर है कि इसके बारे में ज़्यादा ना सोचा जाए और यहाँ से वापस चला जाए।

झबरू वहाँ से जाने की सोच ही रहा था तभी उसने देखा कि कुछ लोग एक आदमी से कुछ पूछ रहे थे और बार-बार ‘अयोध्या’ बोल रहे थे। झबरू बिना कुछ ज़्यादा सोचे बस के ऊपर बैठ गया। बड़ी देर तक वो वहीं बैठ रहा लेकिन बस नहीं चली। उदास झबरू बस के ऊपर लेटे-लेटे ही सो गया। एक अजीब शोर से झबरू की नींद खुली तो उसने देखा वो किसी अनजान जगह था और एक आदमी उसकी ओर देख के चिल्ला रहा था “अरे! बाबा तो हमारे साथ ही अयोध्या आए हैं…!!”

“क्या!!!” झबरू को अपने कानों पे यक़ीन नहीं हो रहा था। आख़िरकार उसका सपना सच हो गया। वो अयोध्या पहुँच गया था।

3

झबरू बस से भाग के एक पेड़ पे चढ़ा और इधर-उधर देखने लगा। ये जगह कुछ अलग ही थी। यहाँ पे खुले दरवाज़े वाले बहुत सारे घर थे। झबरू की आँखें चमक गयीं। उसने सोचा कि चले कुछ खा-पी आए। झबरू बड़ी देर तक इधर-उधर घूमता रहा लेकिन वो जहाँ भी जाता वहाँ पहले से बहुत सारे बंदर रहते थे। उसने बहुत कोशिश की लेकिन कहीं भी कुछ नहीं मिला तो उसने सोचा कि वो इन बंदरों के बीच से ही कुछ ले के आएगा। झबरू को अंदाज़ा नहीं था कि ये काम कितना मुश्किल होगा। उसने जैसे ही एक संतरा उठाने की कोशिश की, आस-पास के बंदर उस से लड़ने लगे और वो अकेला पड़ गया। उदास झबरू बाहर आ के बैठ गया और आसमान की ओर देखने लगा। तभी किसी ने उसकी तरफ़ एक संतरा बढ़ाया। झबरू ने झट से संतरा छीला और खा लिया फिर उसने पूछा- “तुम कौन हो?”

“मेरा नाम चमकीली है।”

इसके बाद दोनों बैठे रहे। कभी आते-जाते लोगों को देखते तो, कभी आसमान की ओर। थोड़ी देर में एक बूढ़ी इंसान ने कुछ केले उन दोनों को देने की कोशिश की लेकिन तब तक बाक़ी बंदर आए और वो केले भी छीन ले गए। चमकीली ने ये कह के उन्हें रोकने की कोशिश की कि ये केले उन दोनों के हैं तो बाक़ी बंदर ये कह के चले गए कि “ये मोटा बंदर यहाँ रहा तो सबका खाना खा जाएगा। इसे यहाँ से भाग दो।”

चमकीली को इन बंदरों का रवैय्या बहुत ख़राब लगा और उसने झबरू से कहा कि वो लोग यहाँ से चलते हैं। झबरू को समझ नहीं आया कि वो कहाँ जाएँगे और चमकीली यहाँ से क्यूँ जाना चाहती है। वो तो यहाँ पहले से रह रही है और बाक़ी बंदर उसे परेशान भी नहीं कर रहे हैं लेकिन वो कुछ पूछ नहीं पाया।

4

कुछ दिन तक दोनों इधर-उधर भटकते रहे लेकिन हर जगह वही हाल था। पुराने बंदर, नए बंदरों को कुछ खाने नहीं देते थे। कई दिन बाद आख़िरकार उन्हें एक ऐसी जगह मिली जहाँ बंदर बहुत कम थे, लगभग ना के बराबर। ये घर भी देखने में उन्हीं घरों जैसा था। इस के भी दरवाज़े सब के लिए खुले थे बस बनावट थोड़ी अलग थी। उन दोनों ने सोचा कि ये जगह उन दोनों के लिए सही है लेकिन काफ़ी देर तक इधर-उधर भटकने के बाद उन्हें कुछ खाने को नहीं मिला। वो दोनों हैरान थे कि यहाँ लोग खाने की चीज़ें नहीं लाते थे, बस बड़े-बड़े कपड़े लाते हैं और अंदर फैला के चले जाते थे। एक और अजीब बात थी जो झबरू ने देखी कि यहाँ लोग बंदरों के आगे हाथ भी नहीं जोड़ते थे हालाँकि उसे बस खाने से ही मतलब था।

जैसे-तैसे दोनों ने बग़ल के जामुन के पेड़ से कुछ जामुन खा के दिन काटा लेकिन पेड़ पे ज़्यादा जामुन थे नहीं। सारे जामुन दो दिन में ख़त्म हो गए। तीसरे दिन जब बहुत देर तक खाने को कुछ नहीं मिला तो चमकीली ने झबरू से कहा कि वो कहीं जा रही है, थोड़ी देर में आएगी। झबरू को अच्छा नहीं लग रहा था कि वो उसे अकेला छोड़ के जा रही है लेकिन वो कुछ बोला नहीं।

दिन ढलने के साथ-साथ झबरू सोचने लगा कि बुरे दिन का इकलौता साथी भी उसे छोड़ के चला गया तभी थोड़ी दूर से चमकीली आती दिखी। झबरू, जो अब तक उदास पड़ा था, एकदम से उठ के बैठ गया। चमकीली कुछ सेब और पेड़े ले के आयी थी। उस ने बताया कि वो अपने पुराने घर से लायी है ये सब। झबरू समझ गया कि चमकीली अकेले क्यूँ गयी थी।

5

उस शाम उन दोनों ने ख़ूब बातें की। उस दिन झबरू को पता चला कि चमकीली पहले किसी और शहर में रहती थी। उस शहर में भी ऐसे खुले दरवाज़े वाले ढेर सारे घर थे लेकिन खाने की इतनी अच्छी चीज़ें नहीं मिलती थीं। ज़्यादातर जगह लोग ठंढ़ई पीते और खुले घरों में धतूरे और हरे पत्ते छोड़ के जाते। एक बार चमकीली को ठंढ़ई का एक बड़ा बर्तन खुला मिल गया और वो ढेर सारी ठंढ़ई साफ़ कर गयी। उस के बाद तो क्या हुआ उसे याद नहीं था। अगले दिन आस-पास के बंदरों ने चमकीली को बताया कि उस दिन चमकीली ने पूरे शहर में घूम-घूम के सबको थप्पड़ मारे और आस-पास की सारी दुकानों से ढूँढ-ढूँढ के लाल पेड़े खाए। उस के बाद शहर भर में उस के नाम का आतंक हो गया था। अब वो जहाँ से भी जाती लोग डर जाते और उसे कुछ खाने को दे देते। चमकीली को लगा कि ये सब उस जादुई ठंढ़ई का कमाल है। वो फिर से उस ठंढ़ई की तलाश में घूमने लगी। एक दिन उसे दोबारा वो ठंढ़ई मिली तो उसने ढेर सारी ठंढ़ई पी ली और इधर-उधर घूमने लगी। उस शाम भी उसने बहुत लोगों को थप्पड़ मारे और फिर जा के एक गाड़ी के ऊपर सो गयी। सुबह उसकी नींद खुली तो वो यहाँ पहुँच गयी थी।

“तुम्हें लाल पेड़े बहुत पसंद है क्या?” झबरू ने पूछा।

चमकीली ने जवाब में सर हिलाया। हालाँकि वो तो सोच रही थी कि झबरू ये सारी बातें सुन के बहुत हँसेगा। इसी डर से आज तक चमकीली ने किसी और को ये सारा क़िस्सा बताया भी नहीं था। फिर उस ने झबरू को बताया कि शुरू में उसे भी यहाँ के बंदर परेशान करते थे लेकिन एक दिन उसने एक बदमाश बंदर की जम के पिटाई की तब से यहाँ किसी बंदर की हिम्मत नहीं हुई कि चमकीली से उलझे।

“फिर तुम मेरे साथ क्यूँ चली आयी?” झबरू को अब भी ये बात समझ नहीं आयी थी।

“ऐसे ही…”

6

दिन बीतते रहे लेकिन उन दोनों के हाल वैसे ही रहे। नए घर में तो खाने-पीने की चीज़ें मिलती नहीं थीं बस बड़े-बड़े सुन्दर कपड़े फैले रहते थे।

“चलो इसे उठा लाते हैं और तुम्हारे लिए सुन्दर सा लहंगा बनवाते हैं… खींखीं”, एक दिन झबरू ने कहा।

“खींखीं… ये फ़र्ज़ी इंसानियत हम लोगों से ना होगी”, चमकीली ने जवाब दिया तो दोनों फिर हँस पड़े।

“हमारे लखनऊ में इंसानियत को वो लोग कुछ और कहते हैं”

“क्या…बेवक़ूफ़ी?”

“नहीं… कुछ और…खींखीं”

हँसता-मुस्कुराता झबरू मन-ही-मन दुःखी रहता। वैसे तो खाने की ज़्यादा दिक़्क़त नहीं थी। चमकीली दिन में जा के कुछ खाने का सामान ले आती लेकिन झबरू को लगता था कि उसकी वजह से चमकीली परेशान होती है। वो उस पे बोझ बन के नहीं रहना चाहता था। इसी उदासी और ग़ुस्से में एक रात उसने सोचा था कि वो बाहर जा के कुछ खाने का ले के आएगा वरना वापस नहीं आएगा। वो चुपचाप बाहर निकल गया, चमकीली को बिना बताए। उसे मालूम था कि कुछ बताने पे चमकीली उसे रोक लेगी।

7

रात भर झबरू अयोध्या भर में भटकता रहा। उसने पहली बार ध्यान दिया कि रात को इन घरों के दरवाज़े भी बंद हो जाते हैं। बड़ी मुश्किल से उसे एक खुले दरवाज़े वाला घर दिखा जिसके अंदर से हल्का सा उजाला आ रहा था। वो अंदर चला गया। वो खाने-पीने की चीज़ें तलाश कर ही रहा था कि अचानक उसका पैर फिसला और वो एक बड़ी सी थाली पे मुँह के बल गिर गया जिस में कुछ चिपचिपा सा रखा था। उसने उठ के अपना हाथ और मुँह साफ़ करने की कोशिश की लेकिन वो चीज़ साफ़ ही नहीं हो रही थी।

काफ़ी देर तक उसने वो चिपचिपी चीज़ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन थक गया और उसे भूख भी लग रही थी। वो फिर से इधर-उधर खाने की चीज़ें ढूँढने लगा। अचानक उसके हाथ एक बड़ा सा मिठाई का डिब्बा लगा। झबरू बहुत भूखा था सोचा कि थोड़े लड्डू खा के बाक़ी चमकीली के लिए ले चले। वो जल्दी-जल्दी खाने लगा। इसी बीच उसे किसी के आने की आहट सुनाई दी। झबरू जल्दी से बाहर की ओर भागा। तभी उसके सामने एक बूढ़ा इंसान आ गया। अचानक से झबरू के सामने आने से वो बूढ़ा इंसान घबरा गया और गिरने लगा। झबरू को जाने क्या सूझा, उसने भागने के बजाय उस बूढ़े इंसान को पकड़ लिया। वो बूढ़ा इंसान गिरने से बच गया और हाथ जोड़ के खड़ा हो गया। झबरू को वहाँ रुकना ठीक नहीं लगा और वो भाग खड़ा हुआ।

“बाबा! बाबा!” वो बूढ़ा इंसान पीछे से चिल्ला रहा था।

8

बहुत दूर निकलने के बाद झबरू एक सुनसान से तालाब के पास पानी पीने के लिए रुका तो उसको याद आया कि भाग-दौड़ के चक्कर में लड्डू का डिब्बा तो वहीं गिर गया। वो उदास हो गया और अब वो वापस घर नहीं जाना चाहता था। अचानक उसका ध्यान गया कि उसके पूरे शरीर पे उस चिपचिपी चीज़ का रंग अब भी लगा हुआ है। झबरू फिर से उसे छुड़ाने लगा लेकिन रंग छूटने के बजाय इधर-उधर लग के और फैल रहा था। थोड़ी देर में झबरू थक गया और वहीं लेट गया। रात भर जागने और सुबह-सुबह ढेर सारे लड्डू खाने से उसे नींद आ रही थी और फिर सुबह की ठंडी हवा में सोने का मज़ा ही अलग है।

झबरू सुबह की मीठी नींद के मज़े ले रहा था कि उसे सपना आया वो और चमकीली अपने बड़े से घर में अकेले रहते हैं और ढेर सारे इंसान उन्हें फल और मिठाइयाँ दे रहे हैं। चमकीली लाल पेड़े खा रही है। अचानक उसे लगा कि मिठाई की ख़ुशबू बहुत तेज़ हो गयी और आस-पास शोर भी बहुत बढ़ गया था। उसकी नींद खुली तो उसके सामने ढेर सारे फल-मिठाइयाँ रखे थे और ढेर सारे इंसान हाथ जोड़े खड़े थे।

उसके आँख खोलते ही शोर मच गया “बाबा उठ गए!! बाबा उठ गए!!”

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। वो घबरा के इधर-उधर देखने लगा लेकिन उसके आस-पास खड़े लोगों ने हाथ जोड़ रखे थे तो थोड़ी देर में वो बेफ़िक्र हो गया और वहीं बैठा रहा। थोड़ी देर तक इंसान आ के उसका पैर छूते रहे और आपस में बात करते रहे। उन लोगों की बातचीत से उसे पता चला कि उस बूढ़े इंसान ने ही सबको बताया था कि सुबह-सुबह बाबा पूरे शरीर में सिंदूर लगाए उसके पास आए थे और वो गिरने लगा तो उसे अपनी गोद में उठा लिए। धीरे-धीरे बात पूरे अयोध्या में फैल गयी और लोग सुबह से उसे ढूँढ रहे थे।

झबरू को समझ नहीं आ रहा था कि इतनी ज़रा सी बात पे इंसान इतने खुश क्यूँ हैं, हालाँकि इंसानों को समझने की कोशिश उसने बहुत पहले ही छोड़ दी थी। वो चुपचाप बैठा अपने आस-पास हो रहे तमाशे के मज़े ले रहा था। तभी झबरू ने सोचा कि ‘काश चमकीली भी यहाँ होती, उसके साथ…’

9

इधर चमकीली भोर से ही परेशान थी कि झबरू बिना बताए कहाँ चला गया। वो उसे ढूँढने के लिए निकल गयी लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था इतने बड़े शहर में झबरू को कहाँ ढूँढे। वो बस इधर-उधर चलती चली जा रही थी। पूरे अयोध्या में झबरू को ढूँढ-ढूँढ के वो थक गयी थी लेकिन झबरू का कहीं पता नहीं चल रहा था। दिन चढ़ आया था और वो भूख-प्यास से बेहाल हो गयी थी लेकिन बिना झबरू उसका कुछ खाने का मन नहीं हो रहा था।

चलते-चलते वो शहर के बाहर की तरफ आ गयी और उसे एक तालाब नज़र आया तो उसने सोचा थोड़ा पानी पी के आगे बढ़े। पानी पीने के बाद उसने देखा कि तालाब के दूसरी तरफ बहुत भीड़ लगी है। वो देखने चली गयी कि वहाँ क्या चल रहा है।

वहाँ पहुँच के उसने जो देखा वो उसके लिए किसी सपने जैसा था। झबरू संतरा बन के बीच में बैठा था और ढेर सारे इंसान उसका पैर छू रहे थे। उसे झबरू की शक्ल देख के हँसी आ रही थी कि अचानक झबरू की नज़र उस पे पड़ी। चमकीली को देखते ही झबरू ने उसकी तरफ जाने की कोशिश लेकिन दो-तीन इंसानों ने उसका पैर पकड़ रखा था। चमकीली सब के बीच से कूदती हुई उसके सामने आ गयी और दाँत निकाल के हंसने लगी। अभी तक इस आदर-सत्कार के मज़े ले रहा झबरू, चमकीली के आ जाने से शर्मा गया। उसे मालूम था कि चमकीली उसे बाद में बहुत चिढ़ायेगी लेकिन वो चमकीली को देख के बहुत-बहुत खुश था। उसने अपने पास मे रखे लाल पेड़े झट से चमकीली को दिए। चमकीली पेड़े ले के उसके पास ही बैठ गयी।

इंसानों ने पहले तो चमकीली को भगाने की कोशिश की थी जब वो झबरू के सामने खड़ी हंस रही थी लेकिन जब वो उसके पास बैठ गयी तो वो लोग उसके भी पैर छूने लगे। चमकीली को पेड़े मिलते देख उन लोगों ने भी झबरू के आगे हाथ फैला दिए।

ज़रा से वक़्त में इंसानों की ये तमाम हरकतें देख के झबरू का दिल किया कि वो अपना सर पीट ले। अरे जब सब कुछ वापस ही चाहिए तो दे क्यूँ रहे हैं ये लोग? कब किसका पैर छूने लगें, कब किसे भगाने लगें, कोई भरोसा नहीं इन लोगों का। हालाँकि वो चमकीली के आ जाने से बहुत खुश और पहले से ज़्यादा निश्चिंत हो गया था तो उसने थोड़ी बहुत मिठाइयाँ और फल उन इंसानों के हाथ पे रख दिए।

10

दिन भर ये सब चलता रहा। शाम के अंधेरे के साथ लोगों की भीड़ कम होने लगी। जब सब चले गये तो चमकीली ने झबरू से पूछा कि ये सब कैसे हुआ। झबरू ने उसे सारा क़िस्सा बताया। चमकीली को ये जान के दुःख हुआ कि वो उसे छोड़ के यहाँ आया था लेकिन वो झबरू की परेशानी भी समझती थी इसलिए उसने कुछ कहा नहीं।

“घर वापस चलें?”, चमकीली ने झबरू से पूछा!

“वहाँ जाने का मन है क्या?” झबरू ने कहा!

बहुत दिन तक उस घर मे रहने के बाद उन दोनों को उस जगह से थोड़ा लगाव हो गया था लेकिन वहाँ खाने-पीने की बड़ी दिक़्क़त होती थी। बड़ी देर तक दोनों ये सब बातें करते रहे कि यहाँ से जाना सही होगा या नहीं और फिर इस फ़ैसले पे पहुँचे कि जब तक यहाँ खाने-पीने को मिल रहा है यहीं रहते हैं।

11

अगली सुबह उजाला होते ही कुछ इंसान आए और उन लोगों के आस-पास साफ-सफाई करने लगे। उनके साथ वो बूढ़ा इंसान भी आया था। वो कल से वही दो-चार बातें सब को बताए जा रहा था और लोग ऐसे सुन रहे थे जैसे कोई नई बात हो। उन लोगों ने झबरू और चमकीली को भी नहलाने की कोशिश की लेकिन उन दोनों को इतनी सुबह पानी में जाने का मन नहीं था तो उन लोगों ने गीले कपड़े से दोनों को पोंछ दिया और झबरू के शरीर पे वो चिपचिपा सा रंग लगा दिया। थोड़ी देर में और लोग आने लगे और वही सब कुछ शुरू हो गया। इंसान आते और झबरू-चमकीली के पैर छूते, मिठाइयाँ और फल वहाँ रखते और हाथ जोड़ के खड़े हो जाते। थोड़ी देर बाद झबरू उस में से कुछ सामान उन लोगों के हाथ पे रखता और वो लोग चले जाते।

धीरे-धीरे ये रोज़ का काम हो गया। वो बूढ़ा इंसान अक्सर वहां आता-जाता रहता था।

12

एक दिन कुछ बंदर वहाँ आए और आस-पास घूमने लगे। थोड़ी देर में एक बंदर ने झबरू के पास आ के कुछ सामान उठाने की कोशिश की तो इंसान उसे भगाने लगे। झबरू की आँखों के आगे अयोध्या के अपने शुरुआती दिनों की तमाम यादें एक पल में घूम गयीं और उसने अपना एक हाथ खड़ा कर के इंसानों को रुकने का इशारा किया।

आस पास शोर होने लगा “बाबा जी की जय! बाबा जी की जय!”

उस दिन के बाद जिस भी बंदर का मन होता वो चुपचाप चमकीली और झबरू के आगे रखे सामान में से कुछ उठा लेता। इंसान उसे डाँटते नहीं थे, ये बात और थी कि बंदरों की हिम्मत नहीं होती थी कि वो झबरू और चमकीली को परेशान करें।

13

कुछ दिनों तक झबरू और चमकीली को ये सब अच्छा लगता रहा। लोग उन की छोटी-छोटी बातें भी एक-दूसरे को ऐसे बताते जैसे कोई अजूबा हो। बहुत सी बातें तो ऐसा होती थीं कि झबरू और चमकीली को भी नहीं समझ आता था कि उन्होंने कब ऐसा किया।

“कल हमने बाबा से पूछा था कि हम पास हो जाएँगे और बाबा सर हिला के ‘हाँ’ बोले थे। देखो फर्स्ट डिवीज़न आए हैं। सब बाबा की कृपा है!”

“माता जी सपने में आयीं थी, मने बिटिया होगी।”

“माता जी को लाल पेड़ा अच्छा लगता है, बाबा को सब्जी-पूरी।”

“अरे नहीं, बाबा हलवा-पूरी भी खाते हैं बड़े मन से…”

“सपने में बाबा हम से कहे कि इतवार को यात्रा ना करो तो हम नहीं गये। देखो वो ट्रेन पलट गयी। बाबा को सब पता है..”

ऐसी तमाम बातें वहाँ आने वाले इंसान करते रहते। धीरे-धीरे झबरू और चमकीली हर वक़्त की इस भीड़ से परेशान हो गये। उन्हें अपने पुराने घर के वो दिन याद आने लगे जब वो दिन भर एक-दूसरे के साथ बातें करते थे, खेलते थे।

“अब तो ऐसा लगता है ज़िंदगी बस खाने-पीने में बेकार हुई जा रही है”, एक दिन चमकीली ने कहा।

“अयोध्या में रहना है तो इस से अच्छी कोई और जगह नहीं है”, झबरू बोला।

“तो यहाँ रहना ही क्यूँ है… काश, हम किसी जंगल में चल के रहते जहाँ ना इंसानों के तमाशे होते ना बंदरों की छीना-झपटी।”

यूँ ही बातों-बातों में, उस रात झबरू और चमकीली ने तय किया कि वो किसी नई जगह की तलाश करेंगे और वो दोनों रातों-रात वहाँ से निकल गये।

14

जो बंदर शहरों में रह लिया हो उसके लिए जंगल में रहना कहाँ मुश्किल था। झबरू और चमकीली एक से दूसरी जगह घूमते, घने जंगलों में जाते, नए दोस्त बनाते, नए फल खाते, नदियों में नहाते और रात को सितारे देखते हुए ढेर सारी गप्प मारते।

“वापस अयोध्या जाने का मन होता है तुम्हारा?” एक शाम चमकीली ने झबरू से पूछा।

“ना बाबा ना! वो रोज़-रोज़ रंग लगा के बैठना मेरे बस का नहीं। अच्छे-ख़ासे बंदर का इंसान बना के रख दिया था सबने”, झबरू ने घबरा के कहा तो चमकीली हंसने लगी। वो भी अब वापस नहीं जाना चाहती थी।

15

झबरू और चमकीली के पास सामान ले के आने वाले लोग कुछ दिन तक उनके ग़ायब होने से परेशान रहे लेकिन हर मुसीबत की तरह इंसानों ने इस परेशानी का हल भी ढूँढ निकाला। उस तालाब के पास एक बड़ी इमारत बनायी गयी और उस में पत्थर के झबरू और चमकीली रख दिए गये। उस इमारत के बाहर कुछ इंसान लाल पेड़े और पूरी-सब्जी बेचने लगे। झबरू अब भी लोगों के सपने में आ के उनकी मुश्किलों के हल बताता था और पत्थर की चमकीली के सामने रखे लाल पेड़े अब भी रात में गायब हो जाते थे।

एक बात थी जो झबरू ने कभी किसी को सपने में नहीं बताई कि पत्थर के झबरू और चमकीली को जो कुर्ते और लहंगे उन लोगों ने पहनाए थे, वो अगर सचमुच की चमकीली देखती तो बहुत हँसती…