‘नीम का पेड़’ – गीतांजलि

मेरे मिट्टी के घर के पीछे था
वो पेड़ बरसों से
नीम का पेड़
जिस पे खेलते-चढ़ते थे
अक्सर झूलते थे हम
उसी की छांव में गर्मी की अपनी शामें कटती थीं
सर्द दोपहरियों में छन के उससे धूप आती थी
मगर फिर दब गयी सीमेंट में
मिट्टी मेरे घर की
इसी में दफ़्न है अब भी कहीं
उस नीम की लकड़ी…
मुझे इस घर में अक्सर जंगलों के ख़्वाब आते हैं..

■■■

(यह नज़्म/कविता हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)