नज़्म: ‘बे परों की तितली’ – सर्वत ज़हरा

ये झाड़न की मिट्टी से
मैं गिर रही हूँ
ये पंखे की घूं-घूं में
मैं घूमती हूँ
ये सालन की ख़ुशबू पे
मैं झूमती हूँ
मैं बेलन से चकले पे
बेली गई हूँ
तवे पर पड़ी हूँ
अभी पक रही हूँ
ये कुकर की सीटी में
मैं चीख़ती हूँ
किसी देगची में पड़ी गल रही हूँ
मगर जी रही हूँ..

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)

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