गुफ़्तगू नज़्म नहीं होती है

गुफ़्तगू के हाथ नहीं होते
मगर टटोलती रहती है दर ओ दीवार
फाड़ देती है छत
शक़ कर देती है सूरज का सीना
उंडेल देती है हिद्दत-अंगेज़ लावा
ख़ाकिसतर हो जाता है हवा का जिस्म
गुफ़्तगू पहलू बदलती है
और ज़मीन, आसमान की जगह ले लेती है
राज-हंस दास्तानों में सर छिपा लेते हैं
ऊंटनियां दूध देना बंद कर देती हैं
और थूथनियां आसमान की तरफ़ उठाए सहरा को बद-दुआएं देने लगती हैं
हैजानी नींद पलकें उखेड़ने लगती है
और कच्ची नज़्में सर उठाने लगती हैं
गुफ़्तगू के पावं नहीं होते
लुढ़कती फिरती है
मारी जाती है साँसों की भगदड़ में
कफ़नादी जाती है
लोगों के लिबास खींच कर
काफ़ूर की तेज़ बू
लिपट जाती हैं सीने के पिंजर से
और नज़्म अधूरी रह जाती है..


Special Facts:

Related Info:

यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 

‘रौशनियाँ’ से अन्य नज्में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें!


Link to buy the book:

© 2018 पोषम पा ALL RIGHTS RESERVED | ABOUT | CONTACT | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | DONATE

Don`t copy text!