अनुराग तिवारी की कविताएँ

‘समझ’

मैंने तुम्हें बड़ी बेतरतीबी से पढ़ा
एकदम हड़बड़ी में
किसी दिलचस्प किताब को
जल्दी पढ़ने के लालच में होने की तरह,
मैं बहुत जल्दी में था ये कहने को
कि किताब मैंने पढ़ ली, किताब मेरी हुई
कभी पीछे का कोई पन्ना
कभी बीच का
जहाँ से पढ़ा वहीं से मन लग गया,
ज़ाहिर है तुम दिलचस्पी की हद से ज़्यादा दिलचस्प थीं
और आख़िर मैं कहने लग गया
कि मैंने तुम्हें पूरा पढ़ डाला

जबकि मुझे तुम्हारी प्रस्तावना को खोदना था
वहाँ तुम्हें ठीक से समझने के इशारे
जीवाश्म की तरह मिलते

किताब के बीच और आख़िरी के पन्ने
उसके ख़ुद के हिमशैल की सिर्फ़ नोक हैं
असल किताब दबी होती है
उसकी शुरुआत के समन्दर में

कभी कभी हम ज़बरदस्ती अर्जुन बन जाते हैं
और देखते रह जाते हैं केवल पक्षी की आँख

नहीं देखते कि पक्षी की आँख क्या देखती है!
और देखते देखते पक्षी कब अपना पेड़ बदल लेता है
हम नहीं देख पाते

हम अपने प्रेम को ख़ुद छलते हैं
युधिष्ठिर की तरह
जिसे सच कहते हैं ,वह आधा होता है
जो आधा झूठ कहते हैं, वह झूठ नहीं निकलता।

‘प्रेमगीत का आलाप’

उपन्यास भविष्य की गोद में लेटा है
कहानी अतीत के साथ चली गई
वर्तमान को अपनी कविता की तलाश है

पीछे छूटा प्रेम चेहरे बदल-बदलकर सामने आता है
उसे मेरी तलाश है
वो मुझे अपने ‘वही’ होने का विश्वास दिलाता रहता है
आँखो से यादों की ख़ुशियाँ रिसती हैं
आँसु आँखों के प्रेमगीत का आलाप हैं

जब भी कोई चेहरा हृदय होने लगता है
अतीत प्रकाशित करता है किसी दिलचस्प कहानी का स्याह पन्ना
ओस की बूँद सूरज से डरकर भाप होती है
कविता किसी पेड़ की छाँह बनती है
छाँह की शीतलता किसी हृदय की प्रार्थनाओं का असर है

अतीत वर्तमान में कहानीनुमा दख़ल देता है
वर्तमान भविष्य से कविता का पता पूछता है
कविता भविष्य से प्रेम करती है
जिसकी गोद में लेटा है कोई उपन्यास

प्रेमगीत का आलाप जारी है।

‘क़सम’

क़समें बैठी रहती हैं
प्रेम के बग़ल में दुबककर

जब क़समें झूठी पड़ने लगती हैं
थक जाती हैं
तो कहाँ जाती होंगी क़समें

क़समें हवा में उड़कर आज़ाद हो जाती हैं
फिर किसी दूसरे प्रेम के बग़ल में दुबकने

क्यूँ खाई जाती हैं वही क़समें प्रेम में बार बार
जाया क्यूँ हो वक़्त क़सम संभालने में
जो किया जाए
वह क्यूँ न किया जाए बग़ैर क़सम
जो न भी किया जाए
तो क्यूँ किसी क़सम का डर हो

प्रेम को लगता है
लगती है नज़र क़समों की
मैं क़सम खाता हूँ
कि बग़ैर किसी क़सम के तुम्हें प्रेम करूँगा।

‘बकैती’

मैंने प्रेम का पीछा छोड़ दिया
क्यूँकि मुझे अनुभूतियों की ज़्यादा परवाह थी

सुख और दुःख से ज़्यादा
मुझे वक़्त की परमसत्ता पर विश्वास रहा
मैं शादियों और मैय्यतों में बराबरी से शामिल हुआ

इंसानों से ज़्यादा नफ़रत मैंने
चींटियों और मच्छरों से की
दोनों ने मुझे इंसानों से ज़्यादा तंगाया

सिगरेट छोड़ने की सबसे ज़्यादा क़समें
सिगरेट की दुकान पर खायीं

मैंने कड़ी गरमी में भी बारिश का कभी स्वागत नहीं किया
मुझे मानसून के ख़ाली जाने का भय था

दुबले दिखने की चाहत में
आधी आधी सांसें लेकर जीता रहा

मेरा अस्त व्यस्त औघड़ इतिहास
काम वाली बाइयों को कभी माफ़ नहीं कर पाया

नहाना जीवन की सबसे जागृत क्रिया रही
उससे टुकड़ों-टुकड़ों में बुद्धत्व मिला

कुछ शहर मुझे सिर्फ़ भीड़ बढ़ाते नज़र आए
उनके अस्तित्व पर मैंने सवाल किए

अपनी कला पर मैंने हमेशा शक किया
ऐसा करना सही न हो उसके लिए कुछ नहीं किया

लाइट का जलते रहना
मुझे अंधेरे से ज़्यादा चुभता रहा

मुझे चुप रहना पसंद था
गफ़लत में जाने क्या बकवास करता रहा

जिन लाइनों को लिखने से पुरस्कार मिलते हों
वैसी लाइनें मुझसे नहीं लिखते बनीं।

‘चुगलखोर शाम’

शाम, हर शाम हर चेहरे पर
दिन को डायरी की तरह लिखती है
जिसमें दर्ज होती हैं दिन भर की सारी
नाकामियाँ, परेशानियाँ, हैरानियाँ, नादानियाँ
और हाशिए पर
धकेली गयीं छोटी ख़ुशियों की अठन्नियाँ चवन्नियाँ

रातें किसी मासूम लड़की के सपने की तरह उजलीं
अधूरी इच्छाओं के ऊन से
दूसरे दिन का स्वेटर बुनती हैं
कल के प्रति आश्वस्ति
महबूब रात की आँख का काजल है

सुबह होते न जाने कौन सी हवा काजल चुराती है
कि पूरा आसमान धुआँ धुआँ
जिसमें अतृप्त आत्माओं सी उभरती शक्लें
हर शक्ल अपने आप में
एक पूरी और एक अधूरी कहानी

हर शक्ल अपनी शक्ल को ढूँढती है
पर इतना धुँधलका कि उसे अपनी शक्ल नहीं दिखती
कोई कुछ समझ पाए
कि हो आती है एक और शाम
जो फिर लिखती है अपनी सारी चुगलियाँ
हर चेहरे पर डायरी की तरह

रात अब फिर एक ख़ूबसूरत इंतज़ार है, हर चेहरे का।