गौरी चुघ स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में एक दशक से ज़्यादा समय से सक्रिय हैं। उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े विभिन्न सरकारी, ग़ैर-सरकारी और निजी संस्थानों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम किया है। 2008 में वो NCERT में सलाहकार के तौर पर एक प्रोजेक्ट के लिए नियुक्त हुई थीं और पिछले कुछ सालों से स्कूल पब्लिशिंग में सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों का संपादन कर रही हैं। फ़िलहाल वो एक हेरिटेज वाक ग्रुप के साथ बच्चों के लिए वॉक्स की रूपरेखा तैयार करने और वॉक्स करवाने में सहयोग करती हैं। गौरी कुछ सालों से लेखन और ब्लॉग्गिंग में भी सक्रिय हैं। उर्दू भाषा और शाइरी में उनकी ख़ास दिलचस्पी है, और उनसे यहाँ जुड़ा जा सकता है! आज पोषम पा पर प्रस्तुत हैं गौरी चुघ की कुछ नज़्में! पढ़िए 🙂

दरवाज़े

दरवाज़े गर ज़बान की चिटखनी खोल पाते तो बताते
कि हर दस्तक पर कितने ज़ख़्म खाए हैं और चौखटें नाकों से कैसे घिसवाई हैं,
अज़ीज़ों का इस्तक़बाल करने पर उनकी लकड़ी ख़ुशी से कैसे फूली है
और रूठे रिश्तों के मुँह पर ज़ोर से बजने के बाद कितना रोये हैं
किसी अदालत में जिनके ख़िलाफ़ गवाही नहीं दे पाएँगे उन गुनाहों के चश्मदीद रहे हैं
और किसी की ग़ुरबत पर पर्दा डालकर ख़ुद को मसीहा-सा महसूस किया है

दरवाज़े गर कुण्डियों से क़िस्सागोई करवा पाते तो सुनाते पर्दों से तनातनी की दास्ताँ,
जो उनके खुलने में हमेशा आड़े आए हैं
सर पर लटके नज़रबट्टूओं से कितनी घिन्न है उन्हें क्यूँकि वो टाट का पैंबंद बने बैठे हैं,

बेअदब ख़तों से बेहद शिकायत है जो बिना पूछे नीचे से खिसक आते हैं,
मिट्टी से सने अल्हड़ पायदानों के साथ खड़े होने में किस क़दर शर्मिंदगी महसूस करते हैं
और हसीन खिड़कियों से अपनी मोहब्बत का इज़हार अब तक क्यों नहीं कर पाए हैं

दरवाज़े गर घंटियों से राज़-ए-दिल बयां करवा पाते तो बताते
कि कलश और रंगोलियों से उनके शबाब को कैसा निखार मिलता है,
नन्हे हाथों से अपने ऊपर बनी आड़ी-तिरछी लक़ीरों से ख़ुद को मुस्सविर समझने लगते हैं,
सीना चौढ़ा हो जाता है जब कोई भारी-भरकम अल्मारी बिना टेढ़ी किए अंदर नहीं आने देते,
एक ख़बरी का ओहदा हासिल कर लेते हैं जब उन पर कोई कान लगा के दूसरों की बातें सुनता है
और जब किसी से मन उचाट हो जाता है तो ज़िद में आकर जाम हो जाते हैं,
फिर कभी न खुलने के लिए.

सीढ़ियों का हैंडओवर

मैं तुम्हारे हवाले कुछ क़दमों की आहट छोड़े जा रही हूँ, ख़याल रख लेना.

उस छड़ी को सर आँखों पर रख लेना, जिसने हर बार ऊपर चढ़ते हुए अपने गठिये के दर्द की जगह मुझे कोसा है.
अब वो तुम्हारी ख़िदमत के लिए तुम्हें दुआएँ देगी. उस बुज़ुर्ग लकड़ी की खट-खट पर खीझना मत.
जल्द ही सुपुर्द-ए- ख़ाक हो जाएगी.

उन नन्हे जूतों का ख़याल रख लेना जो मुझ पर कभी ऊँच-नीच का पापड़ा खेला करते थे.
अब वो तुम्हारे सारे बटन दबाएँगे और हर मंज़िल पर तुम्हें अटकाएँगे. उनके क़हक़हों पर उन्हें मत घूरना.
एक दिन संजीदा हो जाएँगे.

उन इश्क़ में डूबे बेताब पैरों को थोड़ी आज़ादी दे देना जो मेरी रेलिंग पर टिक कर ज़माने का लिहाज़ किया करते थे.
अब तुम्हारे बंद दरवाज़ों के पीछे उनकी मोहब्बत परवान चढ़ेगी. उन नज़दीकियों पर शर्मिंदा मत होना.
एक दिन दूरियों में तब्दील हो जाएँगीं.

उन लड़खड़ाते क़दमों को संभाल लेना जो मदहोशी की हालत में मुझ पर अक्सर फिसले हैं. अब तुम्हीं उनके दिल के ग़ुबार सुनना और हम प्याला बन जाना. उन्हें उलाहने मत देना.
एक दिन तबाही सारा नशा उतार देगी.

उन मेहनतकश चप्पलों को थोड़ा सुकून दे देना जो हर घर के बर्तन-कपड़े धो कर तुम्हारे पास आएँगीं. तुम्हारे ज़रिये वो भी देख लेंगी कि मशक्क़त से कैसे बचा जाता है. उन्हें छोटा होने का एहसास मत दिलाना.
एक दिन मुफ़लिसी से ख़ुद ही घिस जाएँगीं.

उन चोर पंजों से बच कर रहना जो घरों को लूटने के लिए दबे पाँव आएँगे. मुझसे तो वो हमेशा ही दूर रहे क्यूँकि पाइपों से उनका ज़्यादा याराना था. अब वो तुम्हारा इस्तिमाल करेंगे. उन्हें बददुआएँ मत देना.
एक दिन उनके गुनाह ही उन्हें निगल जाएँगे.

और अगर कभी मायूस घिसटती हुई एड़ियाँ अपनी तरफ़ आती देखो, तो रोक लेना उन्हें, ऊपर मत जाने देना. क्यूँकि वो तुम्हारे सहारे ऊपर तो चढ़ जाएँगी पर नीचे उतरने के लिए वो किसी की मोहताज नहीं रहने वालीं. गिर जाएँगी, बिखर जाएँगी, ज़र्रा-ज़र्रा हो जाएँगी. उन्हें बुज़दिल मत समझना. एक दिन उनकी मौत कई लोगों के जीने के जज़्बे को ज़िंदा कर देगी.

मैं तुम्हारे हवाले कुछ क़दमों की आहट छोड़े जा रही हूँ, ख़याल रख लेना.

फ़ुटपाथ

मैं साल में एक बार रंगा जाता हूँ
किसी बड़ी हस्ती के लिए निखर जाता हूँ
बदलेंगे हालात, ख़ुद को बहला लेता हूँ
इसी उम्मीद से ख़ुद को नया बना लेता हूँ

सड़क मेरी ख़ाला की बहू है. तारकोल के जोड़े में दुल्हन बन कर आई थी, पर उम्र ढलने पर पगडण्डी-सी लगती है. हमारी मीठी नोक-झोंक चलती रहती है. उसे ग़ुरूर है कि वो बड़े-बड़े पहियों से रौंदी जाती है और मुझ पर सिर्फ़ क़दम ही मेहरबान होते हैं. वो मंज़िल तक पहुँचाती है और मेरी ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं है.
पर किसी हादसे के बाद जब कोई ज़ख़्मी मुझ पर फ़ौरन लेटाया जाता है ना, तो उस लम्हे में मैं भी अपना मक़सद पा लेता हूँ.
उसी मक़सद से ख़ुद को नया बना लेता हूँ.

नाली नाराज़ पड़ोसन है जिसे अक्सर शिकायत रहती है कि मैं अपनी सारी गंदगी उस के बरामदे में फेंक देता हूँ. पन्नियों के गुब्बारे और सिगरेट की लाशें उसका मुँह यूँ जाम कर देते हैं जैसे किसी सियासत-दान की बोलती ज़मानत ज़ब्त होने पर हो जाती है. मुझ पर गिरे केले के छिलकों की नीयत भी ठीक नहीं. अक्सर उस पर फिसल जाते हैं.
पर बारिश में जब नाली उफ़ान पर होती है ना तो उसकी गर्द में मैं भी चुप-चाप नहा लेता हूँ.
उसी गर्द से ख़ुद को नया बना लेता हूँ.

बस स्टॉप थोड़ी अकड़ में ज़रूर रहता है पर मेरे सामने कुछ बोलने की हिम्मत उसमें नहीं है. एक तो वो मेरा किराएदार है, दूसरा मुझे ये राज़ मालूम है कि सड़क के बीच वाली रेलिंग के साथ जनाब का इश्क़ ज़ोरों पर है. पर बस स्टॉप की वाल्दा को ये रिश्ता क़तई मंज़ूर नहीं है. कहती हैं, “ये रेलिंग बहुत तेज़ तर्रार होती हैं. देखा नहीं, जब इन्हें टाप के कोई सड़क पार करता है तो कैसे उनके कपड़े फाड़ देती हैं या उन्हें ज़ख़्मी कर देती हैं.”
मुकम्मल ना सही पर उनकी मोहब्बत में मैं भी दिल बहला लेता हूँ.
उसी मोहब्बत से ख़ुद को नया बना लेता हूँ.

भुट्टे की ख़ुश्बू, सुपारी की पुड़िया, आम पापड़ की थैलियाँ, सस्ते रूमाल, नन्ही कंघियाँ, मुझ पर बेझिझक हो कर बिकते हैं. फ़क़ीरों के कटोरों का भी मेरे यहाँ वजूद है. यही मेरी मईशत है. इसका जीडीपी ऊपर नीचे नहीं होता. सिर्फ़ इस पर आराम फ़रमाने वाले पेट या तो भरे हुए ख़्वाब देखते हैं या ख़ाली ही सो जाते हैं.
कभी-कभी उनकी सिकुड़ी आंतों के साथ मैं भी दो अश्क बहा लेता हूँ.
उन्हीं अश्कों से ख़ुद को नया बना लेता हूँ.

जब मैं साल में एक बार रंगा जाता हूँ, ख़ुद को तर-ओ-ताज़ा सा पता हूँ. कोई क़ाफ़िला मेरे आगे से फिर गुज़रता है, फिर मुझ पर खड़ी आवाम नारे लगा कर किसी को सर आँखों पर रख लेती है. सच बोल कर उनकी उम्मीद तोड़ना नहीं चाहता. पत्थर का ज़रूर हूँ, दिल तो मुलायम मिट्टी का है. इसलिए फिर कुछ राज़ दिल में दबा लेता हूँ.
एक झूठ से ख़ुद को नया बना लेता हूँ.
बदलेंगे हालात, ख़ुद को बहला लेता हूँ
इसी उम्मीद से ख़ुद को नया बना लेता हूँ

इम्तिहान

एक और इम्तिहान सर पर आया है
मैंने जो भी पढ़ा था, सब कुछ ज़ाया है
कितनी नफ़रत है मुझे इम्तिहानों से, कैसे बताऊँ
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ

किसी ने मेज़ पर चॉक से मेरा रोल नंबर लिखा है-1572
1572 नग़्मे जो मैंने ज़बानी याद किए थे
1572 रुपये जो किराने वाले को सुबह दिए थे
1572 मकान नंबर जिसकी घंटी बजा हम भाग आते थे
1572 सलवटें जो तुम मेरे बिस्तर पर छोड़ जाते थे
1572 बहाने जो तुमने मुझे तबाह करने के बनाए थे
1572 अश्क जो मैंने ग़म-ए-फ़ुरक़त में बहाए थे
इस 1572 को अगर आधार से जोड़ दूँ तो क्या मेरी तक़लीफ़ें दूर हो जाएँगी?
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ

हर शख़्स यहाँ अलग-अलग सीरत का है
एक मुँह फेर बच रहा है कि किसी की ज़ेहनी ग़ुरबत उधार माँग लेगी
कोई यूँ पर्चा छिपा रही है कि आम बजट बना कर ही कुर्सी से उठेगी
किसी को सिर्फ़ पन्ने भरने हैं जैसे ख़ाली काग़ज़ कम-अक़्ल की निशानी हों
और कोई उनपे नज़्में लिख रहा है जैसे इम्तिहान नहीं फ़िल्मी कहानी हो
कोई पकड़े जाने का ख़तरा उठा के भी दूसरों का मसीहा बना जा रहा है
ये शख़्स ज़िन्दगी में बहुत आगे नहीं जा पाएगा, मुझे यक़ीन आ रहा है
एक डूबती क़श्ती के मुसाफ़िर कैसी फ़ितरत दिखाते हैं?
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ

बड़े बेसिरपैर के सवाल मेरा मुँह ताक रहे हैं
कुछ बौखलाए से सवाल हैं, जिनका हिसाब करना मुश्किल है
उनके चार जवाबों में से एक का इंतख़ाब करना मुश्किल है
कुछ ऐसे हैं जिनमें ५०० लफ़्ज़ों से कम बात नहीं बनेगी
जहाँ एक शेर ही काफ़ी था, वहाँ मस्नवी लिखनी पड़ेगी
कुछ सवालों को अपने ईमान पर ही शक है, उन्हें बहलाना है
वो सही हैं या ग़लत मुझे उनपे निशान लगाना है
कुछ की ज़िन्दगी में इतना सूनापन है, ये करने को कहा है
मुझे उनकी लकीर-सी ख़ाली जगह भरने को कहा है
मेरा दिमाग़ सिर्फ़ इतना जानता है कि ज़िन्दगी की पेचीदगियाँ कैसे बढ़ाई जाती हैं
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ

मैंने नक़्ल के लिए छोटी-छोटी पर्चियाँ कपड़ों में छिपा ली हैं
अब गिरेबां को रुत्बे की परवा नहीं है
उसके पीछे छिपी पर्ची कोई गुनाह नहीं है
आस्तीन ने भी इस बार पूरा साथ दिया है
कुछ जवाबों को अपनी कोख में छिपा लिया है
मोज़ों को तो मानो तरक़्क़ी मिल गई है
अब वो सिर्फ़ जूतों के ग़ुलाम नहीं हैं
पर belt को साँस रोक के कहना पड़ेगा
बस पर्चा ख़त्म होने तक सहना पड़ेगा
नक़्ल को बुरा मानने वाली ये दुनिया ख़ुद नक़्ल पर क्यों जीती है?
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ

कितनी नफ़रत है मुझे इम्तिहानों से, कैसे बताऊँ
कोई ये सवाल पूछ ले तो शायद मैं अव्वल आ जाऊँ..

■■■

चित्र श्रेय: Arno Smit


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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