प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी पैदा होता है। बिना प्रेम भरोसा नहीं, बिना भरोसे समर्पण नहीं। पर बीच में ऐसे भी कुछ विरले मिल जाते हैं जो किसी खींच, किसी तनाव की फ़िक्र नहीं करते और बस गाते जाते हैं.. ‘इक आग का दरिया है, और डूब के जाना है’.. आशीष मनचंदा की यह कविता इशारा करती है फिर इसी बेफिक्री की तरफ.. लेकिन पार्श्व से झाँकती एक उम्मीद के साथ। – पोषम पा

‘झेलम’

याद है

ओ स्याह रात जद मैं तेरे तो स्वयं दी तारीफ़ां सुनन आई सां
ओहि पुराना बूढ़ा जिहा लतीफ़ा सुनन आई सां
छड्ड के मैं घर अपना, कर के ख़रचे आई सां
ते तू मैनू पुछेया सी, के मैं केह्ड़े हक़ दे दरजे आई हाँ

तेरे अक्खराँ दा ताप तेरी अक्खियाँ विच नई दिसदा सी
मेरे तो वध के हक़ तेरे ते दस होर किसदा सी
इक साडे रिश्ते ने किन्ने मद्धे सुपने वेखे सी
मैं नी सी जाणदी ऐ रात वी साड्डे लेखे सी

क़ाज़ी वी सी, प्यो सी मेरा, सारेयां नाल लड़ के आई सां
हक़ दे सबूत सारे पिच्छे छड्ड के आई सां
तू अाखेया सी अमृत वेले, कपूरथला नस्स जायेंगे
जे होवे महर गुरां दी, चढ़दी कला वस जायेंगे

माँ दे सिरहाने चिट्ठी रख के आई सां
कलसी विच आँगन दी मिट्टी भर के लाई सां
इक-अध वार ही पैर धरती ते पड़ेया, ऐंवें नस्स के आई सां
पाजेबां वी नी पायी मैं, सोच समझ के आई सां

पिछली रात मेरे वेहड़े दी दीवार टप्प के गया सी
हथ ते हथ रख के लकीरां नप्प के गया सी
ते अगली रात हक़ दे सवाल करदा है
प्यार वी करदा है, जग तों डरदा है, कमाल करदा है

ते मैं तैनूं केहा सी, तू वेख लै चँदरया
बहंदी झेलम हाँ, पुट्ठे पग्ग ना चल पावांगी
तेरे प्यार दे अकाल विच सुक जावांगी, जल जावांगी
ते इस झेलम दे पिंडे दी राख मैं ख़ुद गंगा विच सुट्ट आवांगी
तू मनया नी सी फेर वी, सोचया सी मुड़ जावांगी

याद ते होना ही है तैनूं चँदरया
जे मेरी बरसी ते हर साल आके
झेलम दे किनारे बैह जाँदा है ते
ते शाम हुन्दे अपने ही हंजुआँ च बह जांदा है..


(आशीष मनचंदा आजकल TVF के साथ काम कर रहे हैं और हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में कविताएँ करते हैं। सभी भाषाओं पर आशीष की अच्छी पकड़ है और उनका पसंदीदा काव्य रूप त्रिवेणी है। आशीष से यहाँ जुड़ा जा सकता है।)