कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी

पुस्तक अंश: ‘कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’

महात्मा गाँधी हमेशा अपने महान कार्यों, सिद्धांतों और बलिदानों के लिए याद किए जाते हैं, लेकिन एक पारिवारिक इंसान या पिता और पति के रूप में भी उन्हें जानने की उत्सुकता असाधारण नहीं मानी जा सकती है। नीलिमा डालमिया आधार की यह किताब कस्तूरबा गाँधी की कल्पित डायरी के ज़रिए कस्तूरबा गाँधी के जीवन पर प्रकाश डालने के साथ-साथ महात्मा गाँधी के जीवन के भी कुछ अज्ञात/अनछुए पहलुओं को पाठकों के सामने लाती है। पढ़िए इस किताब के सात महत्वपूर्ण अंश!

‘नयी दुल्हन’

हमारा शारीरिक मिलन, शिव और उनकी दिव्य पत्नी का सांसारिक प्रतीक, यिन और यैंग का पूर्ण संयोग, वास्तव में एक ब्रह्मांडीय प्रस्फुटन था। जल्दी ही मैं सामान्य दिखने की आदि हो गयी, दम्पतियों की ओढ़ी हुई विस्मृति जो बंद दरवाजों के पीछे एक-दूसरे की बाहों में नग्न, नियमित रूप से वासनामय यौन गतिविधियों में रत होते हैं और उस सर्वोत्कृष्ट को सराहते हैं मगर दोषपूर्ण मानवजाति के दोहरेपन को स्वीकार करते हैं। जहाँ तक मोहनदास की बात थी, तो उन्हें एक खिलौना मिल गया था; एक जीता-जागता जिस्म जो बात कर सकता था, हंस सकता था, खेल सकता था, सम्भोग कर सकता था और फिर वापिस उनका बंधुआ गुलाम बन सकता था। उनके लिए मैं महज़ एक खिलौना थी जिसे न सोचने की इजाज़त थी, न विरोध करने की।

‘सामंती पति’

एक सुबह मैं पुतली बा के साथ उनके नियमित मंदिर दर्शन के लिए चली गयी। मेरे अंदर अवज्ञा की भावना कुलांचे मार रही थी; मैंने जाने के लिए मोहनदास की इजाज़त नहीं ली। कुछ समय से मैंने ऐसा करना बंद कर दिया था। उनके अक्खड़पन का अब मेरे ऊपर ज़ोर नहीं था। उम्मीद के मुताबिक़ वे फट पड़े। उन्होंने मुझ पर और भी बड़े प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की, जिनका मैंने फिर से उल्लंघन किया। आख़िरकार जब उन्होंने अहसास हुआ कि कस्तूर उनके दमन के आगे नहीं झुकेगी तो उन्होंने हार मान ली। जल्दी ही उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए और हमारे बीच सामान्य स्थिति बहाल हो गयी। हमारे रिश्ते में अपनी पहली हार को उन्होंने किसी हद तक शांति से लिया था, मगर मोहनदास हमेशा ही विचलित और बेचैन से रहते थे, उनके मन में शायद ही कभी शांति होती थी।

‘परपीड़क आनंद’

ट्रेन नई ब्रॉड गेज की पटरियों पर गाँवों से होती दौड़ी जा रही थी। हरिलाल को अपनी गोद में लिए मैं खिड़की के पास बैठी पीछे छूटते जा रहे नज़ारों में खोई हुई थी। मेरे ख़्याल वापस मोहनदास की ओर चले गए। उनका डर और मेरी चरित्रहीनता के आरोपों ने मेरे सब्र के बाँध तोड़ दिए थे। एक जुनूनी आदमी के साथ अपमानजनक रिश्ते में रहने के लिए मैं तैयार नहीं थी। मोहनदास को अपनी नकारात्मकता से अकेले जूझने देना ही बेहतर था। यह अलगाव ज़रूर उन्हें अपने दिमाग में तरतीबी लाने के लिए मजबूर करेगा। मैंने शान्ति से सांस ली। नियंत्रण हाथ में होने का परपीड़क आनंद एक नया अहसास था।

‘सत्याग्रह की ओर’

इस निर्णय ने पूरे दक्षिण अफ्रीका के भारतीय समुदाय को झकझोर डाला और बहुत ज़्यादा उत्तेजित मोहनदास ने घोषणा की कि वे इस कठोर कानून के ख़िलाफ़ विद्रोह करेंगे। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अपने और अपने बच्चों के इस अपमान का बदला लेने के लिए स्त्रियां भी इस विद्रोह में शामिल हों और अगर ज़रूरत पड़े तो गिरफ़्तारी भी दें। उनके इस आदेश के विरोध में मेरे सारे तर्क उन्होंने अनसुने कर दिए। जो आख़िरी बात मोहनदास ने मुझसे कही, वह यह थी, “अगर जेल प्रशासन तुम्हारे साथ बुरा बर्ताव करे तो तुम आमरण अनशन कर सकती हो, कस्तूर। और अगर जेल में तुम्हारी मृत्यु हो गई तो मैं देवी के रूप में तुम्हारी पूजा करूँगा।” और बात यहीं ख़त्म हो गई।

‘हरिलाल की हठ’

हम राजकोट और पोरबंदर की अपनी यात्रा पर निकले, और हरिलाल अपना सामान बांधकर अहमदाबाद लौट गया। वह पूरी तरह से असहाय और निराश था; ऐसा इंसान जिसके सामने कोई दिशा नहीं थी। बेचारे लड़के को वाक़ई यह विश्वास था कि उसके पिता उसकी दयनीय माली हालत और उसके बढ़ते परिवार की ज़रूरतों को समझेंगे और उसके दुःख के दिन ख़त्म हो जाएँगे।

अफ़सोस! मोहनदास ने ऐसी सभी उम्मीदों को नष्ट कर दिया था। यहाँ तक कि पैतृक संपत्ति जिसमें हिस्से पर उसका जायज़ हक़ था, बेरहमी से उससे छीन ली गई थी। उसके पूर्वजों की संपत्ति से केवल उसके चचेरे भाइयों और बापू के दूसरे निकम्मे टुकड़ख़ोरों को फायदा होना था। वह अपनी किस्मत की कड़वी विडंबना पर अफ़सोस किए बिना नहीं रह पा रहा था। एक बार फिर अपने चचेरे भाई चगनलाल के लिए उसके मन में नफ़रत भर गई जिसे वह इंग्लिश बैरिस्टर की डिग्री की राह में अड़चन बनने का दोष देता था। एक बार फिर उसके मन में अपने पिता के प्रति गहरा विद्वेष भरता महसूस हुआ जिन्होंने उसके लिए सभी दरवाजे बंद कर दिए थे। उस यक़ीन था कि यह आख़िरी आघात उसके बापू और उसके बीच मतभेदों की अटकलों को और हवा देगा और किसी के दिमाग़ में कोई शक नहीं रहेगा कि हरिलाल वास्तव में कुल के नाम पर कलंक है, गांधी नाम के लायक नहीं है।

‘बागी’

“मैं अब्दुल्लाह हूँ, हरिलाल नहीं”, वह गरजा। “यह पत्र मेरे लिए है ही नहीं। यह तो हरिलाल के नाम सम्बोधित है, इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं करता। मेरी माँ अशिक्षित है। मुझे विश्वास नहीं है कि वे इस तरह का पत्र लिख सकती हैं। मैं जानता हूँ मुझ पर हमला करने के लिए कोई और उनका इस्तेमाल कर रहा है। अपने धर्मांतरण से पहले मैं अनुपयुक्त लोगों के साथ रहता था, मगर अब मुझे कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं है। मेरी केवल एक इच्छा है कि मैं इस्लाम के सेवक की तरह प्राण त्यागूँ। मेरी माँ कस्तूर बाई ने मुझसे शराब छोड़ने की प्रार्थना की है। इस पर मेरा उत्तर है कि मैं उस दिन शराब पीना छोड़ दूँगा जिस दिन मेरे पिता और माँ इस्लाम को अपनाएँगे!”

‘अंतिम क्षण’

मेरी आँखें आँसुओं से भर जाती हैं। अपने मृत पति के सिद्धांतों को दोहराते हुए, मैं हत्यारे से ऊंची आवाज़ में कहती हूँ, “मुझे न तो तुमसे घृणा है, न तुम्हारे द्वारा किए गए पाप से, नाथूराम गोडसे। तुम तो बस एक दैवीय कार्मिक योजना के वाहक मात्र हो। मैं तुम्हें माफ़ करती हूँ, गोडसे! मैं तुम्हें माफ़ करती हूँ, क्योंकि अब जबकि उनकी प्रिय मातृभूमि के लिए उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी थी, तुमने उन्हें इस संसार से जाने दिया है।”

मैं कूच कर रही आत्मा को गले से लगाती हूँ जो मेरे लगातार विस्तार लेते सीने में विलीन हो जाती है।

“मेरे पास अपने घर वापस आ जाओ, मोहनदास! मेरे पास लौट आओ, मेरे स्वामी। स्वतंत्र भारत में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है!” कहते हुए मैं उन्हें अपनी बाँहों में ले लेती हूँ।

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