खून का रिश्ता

“मैंने फैसला कर लिया है। जो भी हो, मैं उसके साथ विवाह करूँगा।”

पिता के सामने न सही, गोपाल ने ऐसा कह तो दिया। वह घर के उत्तरी तरफ वाले आँगन में खड़ा था। उसके पिता शंकरन नायर पूर्वी तरफ की चौपाल
पर खड़े थे। पुत्र दृढ़तापूर्वक कहता है! वह ज़रूर उस लड़की के साथ विवाह करेगा!

“तेरी ऐसी हिम्मत!” गरजते हुए शंकरन नायर उछल कर उसकी ओर दौड़ पड़े। उनके हाथ में लाठी थी। पिता को दौड़ा आते देख गोपाल ऐसे चलने लगा, मानो भागता हो। शंकरन नायर ने लाठी गोपाल के घुटने को लक्ष्य करके फेंकी, सौभाग्य से निशाना चूक गया।

शोरगुल सुन कर पार्वती रसोई घर से बाहर आयी, “क्यों हल्ला मचाते हो?” पति पर रोब-सा जमाते हुए उसने पूछा।

शंकरन नायर ने जवाब दिया, “देखो न इसकी हिम्मत! मेरे सामने कहता है कि उस लड़की से विवाह करेगा। बदतमीज!”

फिर भी पार्वती ने पति को दोषी ठहराया, “खैर, उसने तो उस लड़की के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया। लेकिन मैं पूछती हूँ, तुमने क्यों ऐसा कहने का मौका उसे दिया?”

शंकरन नायर अब पत्नी पर गुस्सा हो उठे, “तुम क्यों नहीं कहोगी! तुम्हारा खानदान ही कुछ ऐसा है! बाप को मारने वाला।”

पार्वती भड़की, “मेरे खानदान के बारे में कुछ न कहना। हमारी परम्परा में बाप को मारने वाला कोई पैदा नहीं हुआ।”

“तो तुम कहती हो कि हमारी परम्परा में पैदा हुआ था!”

“मैंने थोड़े ही ऐसा कहा?”

झगड़ा तूल न पकड़े, इस ख्याल से पार्वती भीतर चली गई। मारे गुस्से के शंकरन नायर कुछ बड़बड़ा रहे थे। रसोईघर में पार्वती भी कुछ झुनझुना रही थी।

घर से निकल जाने पर, गोपाल गया सीधे गौरी के घर। वह मानो एक कलाकार थी। झगड़ा खतम होते-न-होते वह सीधे गौरी के घर जाता है। मानो इस उद्देश्य से कि उसके पिता देख लें। अपने पिता की रत्ती-भर भी उसे परवाह नहीं।

किसी पागल की तरह शंकरन नायर चिल्ला उठे, “अरी पारो देख न, वह कहाँ जाता है!”

पार्वती उत्तरी तरफ वाले आँगन में आयी। उसने देखा कि उसका बेटा गौरी के घर की चौपाल पर बैठ कर बीड़ी पी रहा है। तब गौरी आँगन में आकर खड़ी हुई। दोनों में कुछ बातचीत हो रही है। वह छोकरी पैर के अँगूठे से ज़मीन कुरेद रही है। पार्वती और शंकरन नायर दोनों ने यह सारा दृश्य देखा। अबकी बार कराल काली का आवेश हुआ पार्वती पर।

“देखो न उसे! कैसी ठसक दिखा रही है। बेहया कहीं की। न मालूम कौन सा टोना-टोटका करके उसने मेरे बेटे को बस में कर रखा है?” कहते-कहते पार्वती का कलेजा मुँह को आ गया। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसका बेटा सदा के लिए उसके हाथ से निकल गया हो। वह अपने आप को भूल कर ज़ोर से पुकार उठी, “अरे गोपाल!”

लेकिन मुड़ कर देखा गौरी ने। गोपाल भीतर चला गया।

2

उस गाँव के लिए उस महीने की प्रमुख घटना थी यह। गोपाल गौरी के साथ विवाह करना चाहता है, लेकिन गोपाल के माता-पिता को यह बिल्कुल पसन्द नहीं। यही नहीं, दोनों इस विवाह के विरुद्ध हैं। एक-दो मध्यस्थ आए। उन लोगों ने समझाया कि लड़की नेक है, पड़ोस का सम्बन्ध होने से लाभ होगा।

‘पुप्पुल्ली घर’ अम्मूम्मा आयी, उसने पार्वती को समझाया, “पार्वती, सुनो न मेरी बात। लड़की नेक है। पड़ोस का सम्बन्ध है। समझो कि तुम बीमार पड़ीं, कौन है तुम्हें ‘काँजी’ या कॉफी बनाकर देने वाला है? यह लड़की लगन से तुम्हारी सेवा करेगी। मेरी बात मानो, इस सम्बन्ध में तुम्हारा भला है।”

“धत्!” पार्वती ने ऐसा दुत्कारा कि अम्मूम्मा के कान फट गए। पार्वती को ऐसी गाली नहीं देनी चाहिए थी। अम्मूम्मा को क्रोध और अपमान हुआ। दोनों में मनमुटाव हो गया।

दूसरा मध्यस्थ ‘कंडत्तिल’ रामन नायर था। उसने ज़रा सूझ-बूझ से काम लिया।

रामन नायर ने शंकरन नायर से कहा, “जो भी हो, गोपाल उस लड़की के साथ विवाह करेगा ही। चूँकि उसने फैसला कर लिया है, इसलिए भला यह होगा कि हम सब मिलकर उनका विवाह करें। कम से कम दुनिया वालों को दिखाने ही…”

“चूल्हे में जाएँ तुम्हारे दुनिया वाले! हमारी सहमति से यह विवाह नहीं होगा। आखिर वह लड़की है कौन? जानते नहीं हो कि कोंचुकुंज मेरा दुश्मन है। दुश्मन के भाई की बेटी मेरे घर की बहू बने! वाह रे!”

एक और मध्यस्थता जो आयी, ज़रा गौरवपूर्ण थी। मध्यस्थ केशव पिल्लै थे। माता-पिता का यह दावा करना स्वाभाविक है कि संतान के लिए उन्होंने बहुत कुछ झेला है। शंकरन नायर ने कहा, “इस लड़के के लिए हमने क्या नहीं सहा? लेकिन वही लड़का आज मुझे देखकर निस्संकोच कहता है कि वह उस लड़की के साथ विवाह ज़रूर करेगा। ऐसी हिम्मत!”

बेचारे शंकरन नायर रो पड़े।

केशव पिल्लै ने कहा, “ऐसा कहना नहीं चाहिए था। फिर भी लाचार हो कर उसने ऐसा कहा था।”

बात शंकरन नायर की समझ में नहीं आयी- “भाई, ज़रा बताओ कि वह लाचार क्यों?”

“हाँ भाई, वह लाचार तो है। तुम्हारे प्रति उसमें अटूट श्रद्धा है। समझ लो कि इस श्रद्धा के कारण ही उसने यह विवाह करने का फैसला किया था।”

शंकरन नायर अब भी कुछ समझ नहीं सके- “यह क्या पहेली बुझाते हो जी?”

केशव पिल्लै मुस्कुराते हुए बोलने लगे, “वह चाहता है कि उसके नाम पर कोई बट्टा न लगे। इसलिए ही उसने उस लड़की के साथ विवाह करने का निश्चय किया। लेकिन बात कुछ ऐसी है कि वह तुमसे कह नहीं पा रहा है।”

शंकरन नायर हक्का-बक्का रह गए। आखिर केशव पिल्लै ने वह रहस्य उनके कानों में कहा, “वह लड़की माँ बनने वाली है। कोई और नहीं… तुम्हारा ही बेटा है। ऐसी हालत में उस लड़की को छोड़ना क्या धरम होगा?”

शंकरन नायर के लिए यह बिलकुल ताजा खबर थी। एक निमेष के लिए वह सन्न रह गए। फिर बोले, “मैं तभी से उसको चेताता आ रहा था कि उधर मत जाया करो। उस शकुनी कोंचुकुंज का घर तो है वह। जाओ तो खतरा। अब आया है अक्लमंदी का काम करके। समझता है कि माँ-बाप मानेंगे। यही बात है न?”

केशव पिल्लै ने शंकरन नायर को मनाते हुए कहा, “वैसी बात नहीं भई, तुम यह क्यों नहीं समझते कि वह धरम-न्याय देख रहा है।”

शंकरन नायर ने अपना निर्णय सुनाया, “जो भी हो, हम इस विवाह में सम्मिलित नहीं होंगे। हमारी अनुमति के साथ यह विवाह नहीं होगा।”

वह दैत्य भी पराजित हुआ। अब यह निश्चित रूप से मालूम हो गया कि माता-पिता की सहमति के साथ वह विवाह सम्पन्न होने वाला नहीं है।

3

गौरी मातृविहीन लड़की थी। पिता अनपढ़ थे। पिता के एक छोटा भाई था। बड़ा होशियार। नाम था कोंचुकुंज पिल्लै। उसमें और शंकरन नायर में बड़ी दुश्मनी थी। शंकरन नायर को अपमानित करने का एक अच्छा अवसर कोंचुकुंज पिल्लै को मिला। ऐसा मौका वह क्यों हाथ से निकलने देगा?

गोपाल का विचार था कि किसी प्रकार के आडम्बर के बिना, गाँव के चार बड़े आदमियों के समक्ष विवाह सम्पन्न हो जाए। माता-पिता, चाचा, मामा और अन्य सगे-सम्बन्धी नाराज़ हो चुके। उनकी अनुपस्थिति में भोज आदि रखना अनावश्यक है। पैसे का खर्च अलग। गौरी के पिता ने इस सुझाव को मान लिया। किन्तु कोंचुकुंज पिल्लै इससे सन्तुष्ट नहीं हैं। उसके भाई के घर होने वाला अन्तिम शुभ कार्य है यह। इसलिए ठाट-बाट से ही करना है। गौरी के पिता के पास कुछ रुपए थे। छोटे भाई के दबाव के सामने बड़े भाई को झुकना पड़ा। गौरी की भी यह अभिलाषा थी कि उसका विवाह ठाट-बाट से हो। इसलिए गोपाल ने मान लिया।

सारा गाँव विवाह में निमन्त्रित था। अच्छा-खासा भोज भी था। ‘आलप्पुषै’ से कोंचुकुंज पिल्लै एक ग्रामोफोन लाया, जो उस गाँव के लिए एक नयी चीज़ थी। कोंचुकुंज पिल्लै ने उस ग्रामोफोन का मुख शंकरन नायर के घर की तरफ रखा। विवाह के पहले दिन, रात-भर गाना ही गाना था। एक प्रकार के आत्मतोष के साथ कोंचुकुंज पिल्लै बोला, “वह बेईमान शंकरन आज सो न पाये।”

न सिर्फ ग्रामोफोन वाला गाना-बजाना था, बल्कि नागस्वर भी था। उस दिन एक बड़ा भोज भी था। उस दिन तड़के ही शंकरन नायर उठकर कहीं चले गए थे। लेकिन पार्वती थोड़े ही कहीं जा सकती थी। निशि-दिन उसकी आँखें बरसती रहीं। जिस पुत्र को अपनी कोख में दस महीने ढोकर जन्म दिया, उस पुत्र ने न केवल उसकी अवहेलना की बल्कि अपनी माता को कहीं मुँह दिखाने योग्य न रखा। वह यह भली-भाँति जानती थी कि यह सारा ठाट-बाट उसे और उसके पति को अपमानित करने के लिए ही है। इस काम में उसका बेटा उन लोगों का साथ देता है। वह सब कुछ भूला हुआ है।

पार्वती ने अपने सिर पर दोनों हाथ रख कर शाप दिया, “जिसने मेरे बेटे को टोने-टोटके से इस तरह कर दिया, उसका सिर फूट जाए।”

गोपाल की पुरानी अनुसरणशीलता का स्मरण करती तो यह विश्वास पक्का हो जाता है कि बेटे पर टोना-टोटका कर दिया है। गोपाल पहले ऐसा नहीं था। माँ-बाप की बात मानने वाला था।

विवाह हो गया। पार्वती और शंकरन नायर गोपाल को दूर से देख लेते थे।

वह विवाह सारे गाँव की चर्चा का विषय बन गया। दोनों के सम्बन्ध में कहने-सुनने को बहुत कुछ था। गौरी के पिता को इस बात का भरोसा था कि उसे एक दामाद मिल गया, भले ही सारे रुपये खर्च हुए हों। कोंचुकुंज पिल्लै को ऐसी तृप्ति हुई जैसी खीर पीने पर होती है।

दो महीने बीत चले। एक दिन गोपाल अपने घर गया। शंकरन नायर और पार्वती आँगन में नारियल के पत्ते सँवार रहे थे। गोपाल विवाह के पहले अपना घर छोड़ गया था, तब से पहली बार घर में कदम रखा है। मुखमुद्रा देखने पर ऐसा मालूम होता है कि वह किसी निर्णय पर आ पहुँचा है।

आहट सुनकर शंकरन नायर ने सर उठा कर देखा। गोपाल थर-थर काँप उठा। शंकरन नायर मारे क्रोध के उछल पड़े, “क्यों रे, तू इधर क्यों आया?”

गोपाल ने जो वाक्य कंठस्थ कर रखा था, जैसे-तैसे कह दिया, “मुझे अपना हिस्सा चाहिए।”

“तुझे हिस्सा चाहिए?”, हाथ उठाते हुए शंकरन नायर आगे कूद पड़े। गोपाल चंपत हो गया।

इस बीच में गौरी के पिता का देहान्त हो गया। गौरी का गर्भ बढ़ रहा था। घर का खर्च मुश्किल से चलता था। तब उसका एकमात्र संरक्षक कोंचुकुंज पिल्लै ही था। उसने गोपाल को उपदेश दिया, “तुम बगिया से नारियल तोड़ लाओ, तुम्हारा भी तो हक है।”

दिन में बगिया में घुस कर नारियल तोड़ने की हिम्मत गोपाल में न थी। इसलिए कार्रवाई रात में होने लगी। जिद्दी शंकरन ने थाने में शिकायत की। पुलिस के सिपाही गोपाल को कैद कर ले गए। शाम को कोंचुकुंज पिल्लै उसे छुड़ा लाया।

खैर, कहीं चैन नहीं। गाँव वालों में कुछेक मध्यस्थता करने आए। अन्त में, दक्षिणी तरफ पाव एकड़ जमीन गोपाल के हिस्से में देने के लिए शंकरन नायर राजी हुए।

गौरी ने एक बच्चे को जन्म दिया। प्रसव कुछ कष्टपूर्ण था। अस्पताल ले जाना पड़ा। इतना ही नहीं। दो-चार दिन उधर उसे ठहराना भी पड़ा। इधर-उधर
से कर्ज लेने पर ही गोपाल यह सारा खर्चा सँभाल सका। बँटवारे में जो पाव एकड़ बगिया मिली, उसमें दस-बीस नारियल के पेड़ थे। इससे क्या दिन कटते। कोंचुकुंज पिल्लै की मदद से गोपाल ने बगिया एक ईसाई को छह सौ रुपये में बेच दी।

गोपाल को छह सौ रुपये मिले थे। उसमें दो सौ रुपये कर्ज चुकाने में लग गए। पचास रुपये में उसने गौरी के लिए एक साड़ी और चोली खरीदी। पहली बार उसने अपनी पत्नी को साड़ी खरीद कर दी। गोपाल ने एक नए आनन्द का अनुभव किया।

उस दिन रात को पति-पत्नी ने भविष्य के बारे में देर तक सोच-विचार किया। तीन सौ रुपये बचे हुए हैं। गौरी को एक युक्ति सूझी, “क्यों न हम एक व्यापार शुरू करें?”

गोपाल को यह सुझाव पसन्द आया।

4

एक दिन की बात है। पार्वती अपनी एक दूसरी बगिया में घास निरा रही थी। सिर उठा कर देखा, तो एक लड़की गोद में एक बच्चे को लिए खड़ी थी। पार्वती को यह समझने में देर न लगी कि वह बच्चा किसका है। पार्वती ने उस लड़की को अपने पास बुलाया- “बिटिया मुन्ने को इधर लाओ न।”

वह लड़की पार्वती के पास आयी। हाथ बढ़ाने के पहले ही मुन्ना पार्वती की तरफ उछल पड़ा। अगर पार्वती नहीं पकड़ती तो, मुन्ना नीचे गिरा होता। ऊधम मचाता, चीखता-चिल्लाता अपनी दादी से हिल-मिल गया।

उस दिन रात को भोजन के बाद जब शंकरन नायर पान खा रहे थे, उसे एक उपयुक्त अवसर जान कर ज़रा संकोच के साथ पार्वती बोली, “सुनिए तो, आज एक खास बात हुई है!”

शंकरन नायर ने पूछा, “हूँ, कौन-सी बात?”

पार्वती ने कहा, “खून का रिश्ता बड़ी चीज़ होती है।”

“हुआ क्या?”

“आज शाम को मैं घास निरा रही थी। वह मुन्ना ‘दद्दी’ कहता हुआ मेरी तरफ कूद पड़ा। अगर मैं हाथ न बढ़ा लेती, तो बच्चा नीचे गिरा होता। मुझे छोड़ जाता ही नहीं।”

शंकरन नायर ने कहा, “परसों मैंने भी उसे देखा। वह मेरी तरफ भी कूद पड़ा। मुन्ना तो बिलकुल तुम्हारी तरह है।”

पार्वती ने विरोध किया, “ना, मैं कहती हूँ कि वह बिलकुल अपने दादा की तरह है।”

5

गोपाल के व्यापार में वृद्धि नहीं हुई। बात यह थी, उसे व्यापार सम्बन्धी बातों का परिचय न के बराबर था। घर के खर्च के लिए व्यापार से पैसा लेना पड़ता था।

शाम का समय था, पार्वती और शंकरन नायर अपनी एक दूसरी बगिया में तरकारी के पौधे लगा रहे थे। उस दिन भी वह लड़की मुन्ने को लेकर आयी। उस दिन वह अपने दादा के हाथों में कूद पड़ा। शंकरन नायर ने मुन्ने का मुखड़ा दादी के मुख से मिलाते हुए कहा, “लो, कोई फरक नहीं।”

मुन्ने को ले जाते समय, गौरी से कहने के लिए पार्वती ने एक बात कही, “कह दो उससे कि रोज़ मुन्ने की नज़र उतारे।”

एक संध्या को गौरी के घर से मुन्ने के लगातार बिलख-बिलखकर रोने की आवाज़ सुनायी पड़ी। शंकरन नायर और पार्वती घर के पिछवाड़े में खड़े थे। पार्वती ने बेचैनी से पति से पूछा, “मुन्ना क्यों ऐसा बिलख रहा है? कहीं उसका दम न घुट जाए! वह लड़की ही तो उसे उठाये हुए है। मुन्ने की माँ कहाँ गई?”

“शायद वह घर में नहीं है। बच्चा क्यों ऐसा रोता है? उसकी सेहत ठीक नहीं है क्या?”

“गोपाल भी उधर नहीं है।”

“वह हाट गया है।”

दूसरे दिन मालूम हुआ कि गौरी बेहोश पड़ी है। उसे जोर का बुखार है। तीन या चार बार डॉक्टर बुला लाए गए। लेकिन बुखार ज़रा भी कम नहीं हुआ। शंकरन नायर और पार्वती ने मुन्ने को घर बुलवा लिया। उस लड़की ने ही मुन्ने को ला कर दिया। पाँचवे दिन गौरी ने आँखें खोलीं। गोपाल की छाती ठंडी हुई।

गौरी ने पूछा, “मेरा मुन्ना कहाँ है?”

“वह अपने दादा और दादी के साथ है।”

गौरी का मुख चमक उठा। उसकी आँखें बन्द हुईं। वे आँखें फिर कभी नहीं खुलीं।

शंकरन नायर और पार्वती आँगन में बैठे थे। मुन्ना अपने दादा को चार पैरों पर खड़ा होने पर मजबूर कर रहा था। उसके बाद वह ‘हाथी’ पर चढ़ेगा। शंकरन नायर चार पैरों पर खड़े हुए। मुन्ना दादा की पीठ पर चढ़ बैठा।

उस समय गोपाल उधर आ पहुँचा। उसने बेटे को डाँटा, “अरे, यह तू क्या कर रहा है?”

पार्वती बोली, “करने दो बेटा, तुम्हारे पिता तीस साल बाद हाथी बन रहे हैं। तुम्हारे लिए हाथी बनने के बाद आज ही बने हैं।”

(अनुवाद: के. नारायण)