‘ओ अपाहिज आस्थाओं’ – हरीश भादानी

ओ अपाहिज आस्थाओ!
घुटन-कुण्ठा-अहम्
भुभुक्षा की चौकोर शैयां पर लेटी रहो-
चीखो नहीं,
यह नहीं होगा कि-
मैं तुम पर दया करने
तुम्हारे पायताने लौट आऊँ,
जीव हत्या के बहाने से डरा हुआ
मैं रामायण सुनाऊँ,
तुमको तुलसी-गगांजल पिलाऊँ,
ओ अपाहिज आस्थाओ!
तुम जो अब बुढ़िया गई हो,
तैरता है-
मौत का दर्पण तुम्हारे सामने,
हद है कि-
तुम हर सांस को जीवन कहे जाती,
जिये जाती,
ओ अनर्थक खोखलाई आस्थाओं!
मृत्यु-शैया पर पड़ी-पड़ी देखो-
मैं ताज़ा खाद खाई माटियों में
बीज डाले जा रहा हूँ
गर्म सांसों से पिघलते मोतियों से
सींचता ही जा रहा हूँ-
मैं सहेजे जा रहा हूँ
कांपली-आयाम को कि-
बदबू के कीटाणुओं की
छांह भी छूने न पाये
ओ दी घड़ी की उम्रवाली आस्थाओं!
तुम्हारे लिये
इतना करूँगा कि-
जब दम टूट जायेगा तुम्हारा
देह पथरा जायेगी जब
मैं नगारों मर अवामी घोषणा में पीट दूँगा-
लो, अपाहिज आस्थायें मर गई हैं!
मैं अकेला ही उठाकर ले चलूँगा
आग दे दूँगा खुले शमशान में,
करो विश्वास!
लौटता बेला-मैं भूलूंगा नहीं
तुम्हारी ढेरी पर
तख्ती लगाना-
यहाँ दे दी गई आगुन अपाहिज आस्थाओं को!

■■■

चित्र श्रेय: bradshawfoundation.com


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो

‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ शाबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह सखी पिया को जो Read more…

कविताएँ | Poetry

कविता: ‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण

‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण वे सूर्योदय की प्रतीक्षा में पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे दूसरे दिन जब सूर्योदय हुआ तब भी वे पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे जबकि Read more…

कविताएँ | Poetry

कविता: ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ Read more…

error:
%d bloggers like this: