आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग कर वो सब करने लग जाते हैं, जो करना नहीं चाहते। ऐसे में किसी एक ऐसे इंसान से मिलना जिसके व्यक्तित्व में आधुनिकता के साथ दूर कहीं बसे किसी गाँव के परिवेश के अंश भी महसूस होते हों, एक सुहाना अनुभव है। रमेश पठानिया एक ऐसे ही इंसान हैं जिनसे हाल ही में मुलाक़ात हुई। सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी कुछ कविताएँ पढ़ने का भी मौका मिला, जिन्हें वो यूँ ही कुछ सुहाने लम्हों की तरह साझा कर लिया करते हैं। कुल्लू के रहने वाले रमेश सर की कविताओं में पहाड़, नदियाँ और वादियाँ ऐसे ही चले आते हैं जैसे किसी रास्ते भटकते इंसान की बातों में फ़कीरी, एक ‘कवि’ की बातों में अलंकार या फिर जैसे एक छोटे से बच्चे की बातों में भोलापन। बहुत कुछ न कहते हुए यहाँ उनकी कुछ कविताएँ पेश हैं.. उम्मीद है ये सरल कविताएँ आज के कवित्तमय शोर में आपको लोरियाँ सरीखी सुनायी देंगी..

1)
धुन्दला सा चांद
रात भर जागा चांद
तड़के-तड़के
धीरे-धीरे
पहाड़ी के उस पार
खो गया
अम्मा ने बुक्कल ओढे
आवाज लगायी
उठो ……
सवेरा हो गया ….
मैंने दोनो हथेलियों को
जोड़ कर
अपने चांद को देखा …
सर्दियों में
“अम्मा भी न ”

2)

ramesh pathania 2

Photo by: Ramesh Pathania

उस गली से गुजरा हूँ आज,
इकलौता देवदार का पेड़ खड़ा रहता था जहाँ
वहां अब एक टेलिकॉम टाबर है,
पेड़ की जड़ों पर सीमेंट का चबूतरा है,
मैंने बच्चों को देखा है, सपाट धरातल पर
पड़े हुए,
भांग के नशे में,
देवदार का पेड़ तो
रहा नहीं,
बच्चों की मनोस्थिति भी,
बदल गयी है

3)
आज सुबह से,
देवदार के पेड़,
शांत खड़े हैं,
नदी का पानी,
खामोश है,
इस कसबे में,
अजीब सी बैचैनी है
तुम्हारी आँखों में,
नमी है
सुना है, कल इस कसबे का नाम,
बदल जायेगा
किसी राजनीतिज्ञ के,
नाम के बाद,
इसका नाम आएगा
बदलाव की यह कैसी
ब्यार है दोस्त.

4)
किंकर्तव्यविमूढ़ सा
झरने के पास बैठा रहा ,
जब माँ ने डांटा था ,
घर से भाग के,
शहतूत की छड़ी से
कुछ लकीरें बनी थी जिस्म पर,
झरने के पानी की फुहारों ने उन्हें सहलाया था,
न मैंने झरने से कोई शिकायत की,
न उसने कुछ कहा,
लगा बिन कुछ कहे उसने सब सुन लिया।
उस दोपहर झरने के पाँव पर उकड़ूँ सो गया,
कोई ढूंढने नहीं आया।
शाम ढल गयी,
क़स्बा शांत होने लगा था,
अवरिल बहती विपाशा की आवाज़ साफ़ सुनायी दे रही थी,
दूर घरों में टावां-टावां रौशनी जलने लगी थी,
दाता (पिताश्री) ने मुझे ढूंढ निकाला,
घर ले आये, लेकिन मेरा मन
मेरे दोस्त के पास छूट गया,
वक़्त पकड़े कहाँ थमता है,
नहीं थमा,
अक्सर जब बिन कुछ कहे,
बहुत कुछ कहना होता है,
तब वहीं मिलता हूँ,
या विपाशा के तट पर
या झरने के पॉव में।
समय बदल गया दोस्त वही
दाता को पता है माँ को नहीं..

5)
वह नींद में सपने देखा करता था
हर सपना बीच में टूट जाता था
वह अब सोता ही नहीं
रात भर जाग कर
टूटे सपनों की बस
कड़ियाँ जोड़ता,
फिरता है
बुक्क्ल ओढ़े तड़के- तड़के
देख लोग उसे
“शदायी केह्न्दे ने”

6)
आ कोल बैठ मेरे
रातां किन्नियाँ कल्लियां ने
दिन किन्ने उदास ने
सारा दिन रात बाहर दियां गलां
करदे फिरदे ने
आ कोल बैठ मेरे
कुज़ अंदर दी गल करीये

7)

ramesh pathania

Photo by: Ramesh Pathania

इन सर्दियों में
बर्फ पर लकीरें नहीं खींचूंगा
न ही पढ़ूंगा कविता
उस पत्थर पर बैठ कर
नदी में पाँव डाल कर
न ही याद करूंगा
पार साल की बातें
खामोश पहाड़ी के पीछे
छुप जाने दूंगा सूरज को
देवदार के पेड़ों के बीच
खुद को यूँ ही अकेला छोड़ दूंगा
खुद ही भटकूंगा
अपनी परछाई के पीछे
लम्हा-लम्हा
कतरा-कतरा
रफ़्ता-रफ्ता
तुझे खबर होने से पहले
इन सर्दियों में
खुद बर्फ हो जाऊंगा

8)
कल रात रेडियो यूँ ही चलता रहा,
सर्दी की हल्की सी दस्तक,
मुझे नींद के आगोश में ले गयी,
चाँद अभी तक खिड़की पर नहीं आया था,
न ही नीले आसमान पर तारों का कोई झुरमुट,
शहर की बतियाँ भी जल रही थी,
बड़े पेचीदे खाव्व दिखे,
सपने लग ही नहीं रहे थे,
हकीकत भी नहीं थे शायद,
एक परी ने हलके से कम्बल
मेरे शरीर पर सरका दिया,
रेडियो अब नहीं चल रहा था ,
हां लगा चाँद मेरी खिड़की के करीब आ गया है
हरी घास पे सुबह ओस दिखेगी,
इसी उम्मीद से,
मैंने करवट बदली।

9)
बारिश की बूंदों ने
कई पत्थर तराशे हैं
अपने मखमली स्पर्श से

10)
एक सुबह जब
पत्तों पर पानी की बूंदे ठहरेंगी
हल्की -हल्की धुन्ध
का ताना बाना
और आसमान पर
अल्हड़ बादलों की टोलियां
कोहसारों पर मँडराएंगी
मैं अपनी छत पर
नदी के पास
बलखाती सड़क पर
टकटकी लगाए
तुम्हारी बाट जोहूंगा..

 

चित्र श्रेय: रमेश पठानिया


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

2 Comments

  • Vikash Tiwari · December 5, 2017 at 9:58 am

    कविताओं और पहाड़ों-झारनो का गहरा रिश्ता है और कब कवि पहाड़ों से हों तो क्या कहना!!

      Puneet Kusum · December 5, 2017 at 1:25 pm

      और वो भी ऐसे.. क्योंकि हर कोई वहाँ से होकर भी ऐसे दृश्य नहीं खींच पाएगा!!

  • Leave a Reply

    Related Posts

    कविता | Poetry

    कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

    ‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

    कविता | Poetry

    कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

    उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

    अनुवाद | Translation

    कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

    रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

    %d bloggers like this: