जिस समय मैं दिल्ली से कालका के लिए गाड़ी पर सवार हो रहा था उस समय एक भारी भीड़ ने सद्भाव से ‘महात्मा गांधी की जय!’ के साथ-साथ यह भी नारा लगाया कि ‘हम समझौता नहीं चाहते।’ मेरा साप्ताहिक मौन था, इसलिए मैं केवल मुस्कराकर रह गया।

मेरे पास गाड़ी के पायदान पर खड़े हुए लोगों ने भी मेरी मुस्कराहट के जवाब में मुस्करा दिया और सलाह दी कि मैं वाइसराय महोदय से समझौता न करूँ। मुझे एक कांग्रेस कमेटी ने भी पत्र द्वारा ऐसी ही चेतावनी दी थी। मुझे अपनी सीमित शक्ति का ज्ञान कराने के लिए चेतावनी की जरूरत नहीं थी। दिल्ली के प्रदर्शन और कांग्रेस की चेतावनी के अतिरिक्त यह बता देना मेरा फ़र्ज है कि वाइसराय महोदय से बातचीत में क्या कहा-सुना गया? मैं यह बात भली भांति जानता था कि इस सम्बन्ध में कार्य समिति ने मुझे कोई आदेश नहीं दिया। मैं तार द्वारा भेजे गये निमन्त्रण को स्वीकार करके पहली गाड़ी से रवाना हो गया था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरी अदम्य और पूर्ण अहिंसा मेरे साथ थी। मैं जानता था कि राष्ट्रीय मॉग का प्रतिनिधित्व करने का मुझे अधिकार नहीं, और मैंने ऐसा किया, तो दुर्गति होगी। इतनी बात मैंने वाइसराय महोदय को भी बता दी थी। ऐसी स्थिति में मुझसे समझौता या समझौते की बातचीत का कोई सवाल ही नहीं हो सकता। मुझे यह मालूम नहीं हुआ कि उन्होंने मुझे समझौते की बातचीत के लिये बुलाया है। मैं वाइसराय महोदय के स्थान से खाली हाथ लौटा हूँ। मुझसे स्पष्ट या गुप्त कोई समझौता नहीं हुआ। अगर कोई समझौता होगा, तो वह कांग्रेस और सरकार के बीच होगा।

कांग्रेस-सम्बन्धी अपनी स्थिति को वाइसराय महोदय से स्पष्ट करते हुए मैंने उन्हें बताया कि मानवता के दृष्टिकोण से मेरी सहानुभूति ब्रिटेन और फ्रांस के साथ है। जो लंडन अब तक अभेद्य समझा गया है उसके विध्वंस होने की बात सोचते मेरा दिल दहल जाता है। जब मैंने वेस्ट मिनिस्टर ऐवी तथा उसके सम्भाव्य विध्वंस के बारे में सोचा तो मेरा दिल भर आया। मैं अधीर हो गया हूँ। हृदय के अन्दर मेरी परमात्मा से इस प्रश्न पर हमेशा लड़ाई रहती है कि वह ऐसी बातें क्यों होने देता है? मुझे अपनी अहिंसा बिलकुल नपुंसक मालूम पड़ती है। परन्तु दिनभर के संघर्ष के बाद यह उत्तर मिलता है कि न तो ईश्वर ही और न मेरी अहिंसा ही नपुंसक है। चाहे मुझे अपनी कोशिश में असफलता मिले, परन्तु पूरे विश्वास के साथ मुझे अहिंसा का प्रयोग करते ही रहना चाहिए। मैंने 23 जुलाई को एबटाबाद से, मानो इसी मानसिक व्यथा के पूर्वाभास को पाकर हेर हिटलर के पास यह पत्र भेजा था-

“मेरे मित्र मुझसे कह रहे हैं कि मानव जाति की खातिर मैं आपको पत्र लिखूँ। लेकिन इस खयाल से कि मेरे द्वारा भेजा गया पत्र गुस्ताखी में शुमार होगा, मैंने उनकी बात कुछ दिन तक न मानी। कोई शक्ति मुझसे कहती है कि मुझे विचार करना चाहिए और अपील का नतीजा कुछ भी हो, अपील मुझे करनी ही चाहिए। यह स्पष्ट है कि आप विश्व में एक ऐसे व्यक्ति हैं जो युद्ध को रोक सकते हैं। युद्ध होने पर यह सम्भव है कि मानवता क्षीण होकर बर्बरता में परिवर्तित हो जाये। क्या आप एक वस्तु के लिए, जिसे आप कितनी भी कीमती क्यों न समझते हों, यह मूल्य देंगे ही? क्या आप एक ऐसे आदमी की अपील को सुनेंगे जिसने खुद ही जानबूझकर लड़ाई को छोड़ दिया है, परन्तु उसे काफी सफलता नहीं मिली? पत्र लिखकर आपको मैंने कष्ट दिया हो, तो मैं आशा करता हूँ कि आप मुझे क्षमा करेगे!”

क्या ही अच्छा होता कि हेर हिटलर अब भी विवेक से काम लेते तथा तमाम समझदार आदमियों की अपील, जिनमें जर्मन भी हैं, सुनते। मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार नही हूँ कि विध्वंस के डर से लंडन-जैसे भारी शहरों के खाली होने की बात जर्मन लोग शाँत रहकर सोच सकते होंगे। वे शांति के साथ इस प्रकार के अपने विध्वंस की बात नहीं सोच सकते। इस मौके पर मैं भारत के स्वराज्य की बात नहीं सोच रहा हूँ। भारत में स्वराज्य जब होगा तब होगा। लेकिन जब इंग्लैण्ड और फ्रांस की हार हो गयी तथा जब उन्हें विध्वस्त जर्मनी के ऊपर फतह मिल गयी तो उसका क्या मूल्य होगा? मालुम ऐसा ही पड़ता है कि जैसे हिटलर किसी परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते और केवले पशुबल को ही मानते हैं। मि० चैम्बरलेन के कथनानुसार वह बलप्रयोग के सिवा किसी युक्ति की परवा नहीं करते। ऐसी आफत के समय में कांग्रेसियों तथा भारत के सारे नेताओं को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से भारत का कर्तव्य निश्चित करना है।

5 सितम्बर 1939 को शिमला से दिया हुआ वक्तव्य।