‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

(रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर)

खोये हुए बालक-सा
प्रजातन्त्र
जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता
न ही अपना पता
और सत्ता भी
मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता
अपने पति-संभोग के प्रति एकनिष्ठ
यहाँ का हर प्रस्ताव पूँजीवाद का पिट्ठू
कोर्ट-कचहरी-स्कूलों के अलावा
पन्द्रह अगस्त मनता ही कहाँ है?

लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमन्त्री का
राष्ट्र के नाम पैग़ाम
छछोर लौंडों के रेडियो से सुनने में आता है
और छिनाल औरतों की मुँहजोरी में-
झरने वाली गाली-ग़लौज़

मैं अपनी बस्ती में लौटता हूँ दफ्तर से
अनिवार्य झण्डा-वंदन की औपचारिकता के बाद
जबकि मेरी तमाम बस्ती मोर्चा में शामिल होने…

मैं हर एक की राह में
कल्लफ लगे झकाझक वस्त्रों में
मुख्य अतिथि द्वारा फहराए गए
राष्ट्रध्वज की तरह
अपने ही भाई बन्दों से ‘जय भीम’ करते हुए
महसूस करता हूँ
अपनी सिमटी-सिकुड़ी बन्धुता…
और निषेधाज्ञा तोड़कर बन्दी बना मोर्चा
अपने ही भीतर।

■■■

चित्र श्रेय: Yianni Tzan


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

कविताएँ | Poetry

तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

कविताएँ | Poetry

अंकल आई एम तिलोत्तमा!

कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

कविताएँ | Poetry

पोर उँगलियों के बंसी टटोलते रहे रात भर..

असमिया कविता: ‘पर्वत के उस पार’ – समीर ताँती पर्वत के उस पार कहीं लो बुझी दीपशिखा इस पार हुआ धूसर नभ उतरे पंछी कुछ अजनबी नौका डूबी… उस पार मगर वो पेड़ ताकता रहा Read more…

error:
%d bloggers like this: