घुमक्कड़

‘घुमक्कड़’ – खलील जिब्रान

वह मुझे चौराहे पर मिला। एक व्यक्ति जिसके पास केवल एक लबादा और एक छड़ी थी, और जिसके चेहरे पर दर्द का एक आवरण चढ़ा था। हमने एक-दूसरे का अभिवादन किया, और मैंने उससे कहा, “मेरे घर आओ और मेरे मेहमान बनो।”

और वह आ गया।

मेरी पत्नी और मेरे बच्चे हमें दहलीज पर मिले। वह उनकी तरफ देखकर मुस्कराया और उन्हें उसका आना अच्छा लगा।

फिर हम सब खाने पर बैठ गए और हम उस व्यक्ति के साथ खुश थे, क्योंकि उसमें एक खामोशी और रहस्यमयता थी।

खाने के बाद हम आग के पास जमा हुए और मैंने उससे उसकी घुमक्कड़ी के बारे में पूछा।

उसने हमें उस रात और अगले दिन भी कई किस्से सुनाए। लेकिन अब जो मैं बताने जा रहा हूँ, वह उसके दिनों की कटुता से उपजा है, हालाँकि वह स्वयं सहृदय था और ये किस्से उसके रास्ते की धूल और धैर्य के हैं।

और तीन दिन बाद जब उसने हमसे विदा ली तो हमें ऐसा नहीं लगा कि कोई मेहमान विदा हुआ था, बल्कि हमें तो यह लगा कि हममें से कोई अब भी बाहर बाग में था और अभी भीतर नहीं आया था।

■■■

Random Posts:

Recent Posts

रुत

रुत

दिल का सामान उठाओ जान को नीलाम करो और चलो दर्द का चाँद सर-ए-शाम निकल आएगा क्या मुदावा है चलो…

Read more
आदत

आदत

कविता संग्रह 'लौटा है विजेता' से मरदों ने घर को लौटने का पर्याय बना लिया और लौटने को मर जाने…

Read more
नतीजा

नतीजा

पुरबी दी के सामने उद्विग्‍न भाव से रूमा ने 'होम' की बच्चियों की छमाही परीक्षा के कार्ड सरका दिए। नतीजे…

Read more

Featured Posts

मैं पाँचवे का दोषी हूँ

मैं पाँचवे का दोषी हूँ

'मैं पाँचवे का दोषी हूँ' - विशेष चन्द्र 'नमन' शाम के लिए पिघली है धूप लौटा है सूरज किसी गह्वर…

Read more
सा रे गा मा ‘पा’किस्तान

सा रे गा मा ‘पा’किस्तान

सा रे गा मा 'पा'किस्तान - शिवा सामवेद से जन्मे सुरों को लौटा दो हिन्दुस्तान को और कह दो पाकिस्तान से…

Read more
प्यार मत करना

प्यार मत करना

'प्यार मत करना' - कुशाग्र अद्वैत जिस शहर में पुश्तैनी मकान हो बाप की दुकान हो गुज़रा हो बचपन हुए…

Read more

Leave a Reply

Close Menu
error: