‘घुमक्कड़’ – खलील जिब्रान

वह मुझे चौराहे पर मिला। एक व्यक्ति जिसके पास केवल एक लबादा और एक छड़ी थी, और जिसके चेहरे पर दर्द का एक आवरण चढ़ा था। हमने एक-दूसरे का अभिवादन किया, और मैंने उससे कहा, “मेरे घर आओ और मेरे मेहमान बनो।”

और वह आ गया।

मेरी पत्नी और मेरे बच्चे हमें दहलीज पर मिले। वह उनकी तरफ देखकर मुस्कराया और उन्हें उसका आना अच्छा लगा।

फिर हम सब खाने पर बैठ गए और हम उस व्यक्ति के साथ खुश थे, क्योंकि उसमें एक खामोशी और रहस्यमयता थी।

खाने के बाद हम आग के पास जमा हुए और मैंने उससे उसकी घुमक्कड़ी के बारे में पूछा।

उसने हमें उस रात और अगले दिन भी कई किस्से सुनाए। लेकिन अब जो मैं बताने जा रहा हूँ, वह उसके दिनों की कटुता से उपजा है, हालाँकि वह स्वयं सहृदय था और ये किस्से उसके रास्ते की धूल और धैर्य के हैं।

और तीन दिन बाद जब उसने हमसे विदा ली तो हमें ऐसा नहीं लगा कि कोई मेहमान विदा हुआ था, बल्कि हमें तो यह लगा कि हममें से कोई अब भी बाहर बाग में था और अभी भीतर नहीं आया था।

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