‘Tanashah’, a poem by Nirmal Gupt
1
तानाशाह की नाक के ठीक नीचे
अदृश्य तितली फड़फड़ाती है
वह जाने कैसे छुपाए रहा
शाश्वत प्यार और
अंतस में खिलने को आतुर
मकरंद भरा गुलाब।
2
तानाशाह
विध्वंस के मंसूबे बनाता हमेशा
लिखता रहा हाशिये पर ख़ूबसूरत कविता
कविता हमारे अहद की
ख़ौफ़नाक साजिश है।
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