‘धुआँ’ – विजय गुँजन

कारखानों के धुएँ का रंग,
काला होता है क्योंकि,
उसमें लगा है खून,
किसी मरी हुई तितली का, फूल का, शजर का
धुआँ जो फ़ैला हुआ है जमीन से आसमान तक
उसके हाथों में है एक खंजर,
घोंपा है उसने उसे धरती की पीठ पर,
चीरा है हरियाली के श्वसनतंत्र को,
छ्लनी कर रहा है धूप की आँख को,
ये हत्यारा है, विनाशक है, लुटेरा है,
पर क्या ये धुआँ ही है जिम्मेदार अकेला?
या कोई और,
क्योंकि धुआँ केवल धुआँ नहीं
एक मरण का संसार है,
शमशान है, नरक है,
जिसमें जलती है हर दिन हजारों बाग की चिताएँ
फूलों की चिताएँ, नदियों की चिताएँ,
हवाओं की चिताएँ, पौधों की चिताएँ,
नहीं जलती उसमे तो लालच की चिताएँ,
और भोग की चिताएँ,
क्योंकि लालच के वीर्य और भोग की कोख से ही है जन्मा धुआँ,
धुएँ का रंग होता है काला क्योंकि,
लगा है उसमें प्रकृति के हर बच्चे का खून,
और मरे हुए खून का रंग होता है काला,
धुआँ काला होता है क्योंकि…

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चित्र श्रेय: Mike Wilson

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