‘कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त’ – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

“मग्न बने रहते हैं मोद में विनोद में
क्रीड़ा करते हैं कल कल्पना की गोद में,
सारदा के मन्दिर में सुमन चढ़ाते हैं
प्रेम का ही पुण्यपाठ सबको पढ़ाते हैं।”

– मैथिलीशरण

आकाश की शोभा चन्द्र से, पृथ्वी की शोभा तरु-लताओं से और साहित्य की शोभा कवि से होती है। जिस तरह वसन्त की कुसुम-सुरभि से मुग्ध होकर वर्ष हँस पड़ता है, शारदीय ज्योत्स्ना की गोद में निशादेवी मुस्कराती है, उसी तरह सुकवि को प्राप्त कर साहित्य भी श्रीसम्पन्न हो जाता है। जो शोभा प्रकृति के हाथों से सजाए उपवन की होती है, वह किसी कृत्रिम फुलवाड़ी या बगीचे की नहीं होती, साहित्य भी स्वभावसिद्ध कवि के आविभाव से जिस तरह विकसित हो जाता है, उस तरह ठोंके-पीटे कवियों की गढ़ी हुई कविताओं से नहीं होता। सुगन्ध पुष्प की तरह कवि भी प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है। कमल की तरह वह भी अपने समय पर आता और न जाने कैसे मादकतामय शब्दों में भरकर अपने समय के सुहावने गीत एक अनूठी रागिनी में गाकर चला जाता है। वह संसार को देखकर भी नहीं देखता, निंदा-स्तुति से न रुष्ट होता है न तुष्ट, पार्थिव बैर और मैत्री से उसका कोई सम्बन्ध नहीं; वह चिरपरिचित होते हुए भी एक सुदूर और अजाने लक्ष्य पर अपनी दृष्टि जमाए हुए केवल जाता है और चला जाता है।

हिन्दी में जबसे खड़ी बोली की कविता का प्रचार हुआ तब से आज तक उसमें स्वाभाविक कवि का अभाव ही था। जो पौधा लगाया गया था उसे कुसुमित करने के लिए अब तक के कवियों को सींचने का श्रेय ज़रूर दिया जा सकता है, परन्तु वे उस पौधे के माली ही हैं, कुसुम नहीं। किसी पौधे में फूल एकाएक नहीं लग जाते, वे समय होने पर ही आते हैं। खड़ी बोली की जिस कविता का प्रचार किया गया था, जिसके प्रचारकों और कवियों की कितनी ही गालियाँ कहानी पड़ी थीं, उसका स्वाभाविक कवि अब इतने दिनों बाद आया है, और हिन्दी का वह गौरव-कुसुम श्री सुमित्रानन्दन पन्त है।

यह कुसुम अभी पूर्ण विकसित नहीं हुआ, हाँ पंखडियाँ खोलने लगा है। इसके परागों में सुरभि की अभी इतनी मादकता नहीं कि रास्ते का हर एक पथिक सुगन्ध से खिंचकर बाग में आ जाए। अभी दो ही चार भौरे उसके अर्द्ध विकास की रागिनी गाने लगे हैं।

पन्त जी की प्रथम कविता ‘उच्छ्वास‘ में कवि हृदय का यथेष्ट परिचय और कवि-प्रतिभा का यथेष्ट चमत्कार है। यह कविता देवी के मन्दिर में खड़ी बोली की उत्कृष्ट कविता का प्रथम संगीत है- भावमय और चित्तोन्मादकर। कवि कहता है-

“सरलपन ही था उसका मन,
निरालापन था आभूषन,
कान से मिले अज्ञान नयन,
सहज था सजा सजीला तन।”

मन के साथ सरलपन की कैसी सुन्दर उपमा है। निरालापन को आभूषण बताने में कितना कमाल है। कितनी दूर की सूझ है!

“सुरीले ढीले अधरों बीच
अधूरा उसका लचका-गान
विकच-बचपन को, मन को खींच,
उचित बन जाता था उपमान।”

बालिका के गान को ‘अधूरा’ और ‘लचका’ विशेषणों से शोभित करके कवि गान के मर्म तक पहुँच गया है। और उस गान को रखता भी है कैसी सुन्दर जगह- सुरीले ढीले अधरों बीच- कैसी अनुपम कल्पना है!

“सरल-शैशव की सुखद-सुधि सी बही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी”

बालिका की उपमा ‘सरल-शैशव की सुखद-सुधि’ से बढ़कर और क्या होगी? यहाँ कविजनोचित स्वाभाविक क्रान्ति भी है। व्याकरण ‘मेरी मनोरम मित्र’ लिखने में बाधा देता है, पर कविहृदय ‘बालिका’ के बाद ‘मेरा मनोरम मित्र’ लिखना अस्वीकार करता है। ‘मेरी’ में कितनी मधुरता आ गयी है, यह सहृदय कवि ही समझ सकते हैं।

“कौन जान सका किसी के हृदय को?
सच नहीं होता सदा अनुमान है!
कौन भेद सका अगम आकाश को?
कौन समझ सका उदधि का गान है?
है सभी तो ओर दुर्बलता यही,
समभता कोई नहीं- क्या सार है!
निरपराधों के लिए भी तो अहा!
हो गया संसार कारागार है!!”

यह कविहृदय की स्वाभाविक उक्ति है। परन्तु इसमें कितनी सहानुभूति और कितनी संवेदना है। अन्तिम दो चरणों में संसार की सम्पूर्ण मनुष्यजाति के करुणा क्रन्दन पर 14 वर्ष के बालक कवि के हृदय में सहानुभूति का अथाह सागर उमड़ रहा है।

पन्तजी की उम्र इस समय बाईस साल की है। आपका जन्म अल्मोड़ा प्रान्त में, 1902 ई. में हुआ था। आपके पिता का नाम पण्डित गंगादत्त पन्त है। हमारे नवीन कवि कॉलेज में पढ़ते थे, परन्तु कॉलेज के पाठाभ्यास से शान्ति नहीं मिलती थी, अतएव 1920 में कॉलेज छोड़ दिया। तब से, अलग, कविता की उपासना में ही आप लीन रहते हैं। आपकी ‘आँसू’, ‘वीणा’, ‘नीरव तारे’ आदि कितनी ही कविताएँ अभी अप्रकाशित हैं। एक बार आप मोमबत्ती जलाकर अपनी कविता की कापी में कुछ लिख रहे थे, एकाएक किसी मित्र के बुलाने पर आप उनसे मिलने चले गए। आपके आने में कुछ देर हो गयी। इधर मोमबत्ती जल गयी, उससे चारपाई जली, बिस्तरा जला और जल गयी हिन्दी की वह असाधारण सम्पत्ति आपकी कविताओं की कापी।

पन्तजी में कविजनोचित सभी गुण हैं। आप हारमोनियम, क्लैरिओनेट आदि बाजे भी बजाते हैं और गाते भी हैं बड़ा ही सुन्दर। जिस समय आप सस्वर कविता पढ़ने लगते हैं, उस समय आपकी सरस शब्दावली और कमनीय कण्ठ श्रोताओं के चित्त पर कविता की मूर्ति अंकित कर देते हैं।

आपकी कवित्व-कला दिन-पर-दिन उन्नति कर रही है। गत फाल्गुन की सरस्वती में प्रकाशित आपकी ‘मौन निमन्त्रण’ कविता पढ़ लेने पर किसी को आपकी पूर्ण कवित्व-शक्ति पर ज़रा भी सन्देह नहीं रह जाता। हम उसके दो पद्य उद्धृत करते हैं-

“देख वसुधा का यौवन भार
गूँज उठता है जब मधुमास,
विधुर उर के से मृदु उद्गार
कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास;

न जाने सौरभ के मिस मौन
सँदेसा मुझे भेजता कौन?

तुमुल तम में जब एकाकार
ऊँघता एक साथ संसार,
भीरु झींगुर कुल की झंकार
कँपा देती तन्द्रा के तार;

न जाने खद्योतों से कौन
मुझे तब पथ दिखलाता मौन!”

खड़ी बोली में प्रथम सफल कविता आप ही कर सके हैं। आपसे हिन्दी को बहुत कुछ आशा है। प्रार्थना है, हमारे इस अधखिले फूल पर परमात्मा की शुभ दृष्टि रहे। इसका परागमय जीवन उनके विराटरूप की ही सेवा के लिए है।

[‘मतवाला’, साप्ताहिक, कलकत्ता, 3 मई, 1924। असंकलित]

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