‘क्या करूँ’ – यासमीन हमीद

क्या करूँ मैं
आसमां को अपनी मुट्ठी में पकड़ लूँ
या समुन्दर पर चलूँ
पेड़ के पत्ते गिनूँ
या टहनियों में जज़्ब होते
ओस के क़तरे चुनूं
डूबते सूरज को
उंगली के इशारे से बुलाऊँ
रात में साया बनूँ
ख़ाली आँखों में सजीले रंग ढूंढूं
साफ़ चेहरे पर सियाही से कोई क़िस्सा लिखूं
क्या करूँ मैं
अपने ही पैरों से उलझूं और गिरूं
फिर अपनी आँखों से छुपूँ
और अपनी ख़्वाहिश पर हंसूं
क्या करूँ
ला-हासिलि की सर्द चादर ओढ़ लूँ
और चुप रहूं
या वसवसों के बर्फ़-ज़ारों से
तुम्हें आवाज़ दूँ?

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)