‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ – नरेन्द्र कोहली

नरेन्द्र कोहली की किताब ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ पर आदित्य भूषण मिश्रा की टिप्पणी!

मैंने जब किताब के ऊपर यह नाम देखा तो कुछ ठीक-ठीक समझ नहीं पाया. किताब उलटते-पुलटते पांच अलग-अलग शीर्षक देखे तो लगा कि शायद ये किताब इनके चार-पांच उपन्यासों का संकलन हो जैसे कई बार अमृता के या कई और लेखकों के भी एक से अधिक उपन्यासों का देख चुका था. लेकिन फिर एक उलझन यह थी कि किताब की मोटाई एक या हद से हद दो छोटे उपन्यासों से अधिक नहीं थी, ऊपर से “एबसर्ड” लफ्ज़ का इस्तेमाल भी कुछ समझ नहीं आ रहा था. अब इन सवालों के जवाब के लिए यही एक मात्र उपाय शेष था कि इसे पढ़ा जाए.

“आत्मकथ्य” पढ़ते हुए ये मालूम हुआ कि किताब की शक्ल ही ऐसी है. ऐसा नहीं है कि किसी संकलनकर्ता या किसी पब्लिकेशन हाउस ने इनके छपे हुए उपन्यासों को एक जगह इकट्ठा किया है बल्कि पांच विचित्र (एब्सर्ड) कहानियाँ जिसे लेखक उपन्यास कहते हैं लेकिन जिसमें नाटक की तरह दृश्य बदलते हैं लेकिन जिसका कथ्य किसी कार्टून सा उलझा हुआ लेकिन सटीक है, इनका संकलन है और इस नाम से ही किताब प्रचलित है. लेखक कहते हैं-

“विचार में ये रचनाएं कहानी से अधिक लम्बी नहीं है लेकिन गठन में, चित्रण की समग्रता के कारण वे उपन्यास हैं. मैं इन्हें उपन्यास ही मानता हूँ और यही माने जाने का आग्रह करता हूँ. किन्तु, ये परम्परागत उपन्यास नहीं हैं. अपने अध्यायों के आकार तथा शिल्प एवं शैली के कारण वे परम्परागत उपन्यास नहीं बन पाए. अतः मैंने उन्हें एब्सर्ड उपन्यास नाम दिया है.”

जैसे मेरे मन में उत्सुकता जागी, आपके भी जागी होगी वैसे ही कई लोगों ने नरेंद्र कोहली से यह सवाल उस वक़्त भी किया था कि एब्सर्ड उपन्यास क्या होते हैं. उनका कहना है कि उनके एक मित्र, जिन्होंने पाश्चात्य साहित्य काफी पढ़ रखा था, ने उन्हें पश्चिमी साहित्य में जो “एब्सर्ड साहित्य“ का विचार और दर्शन है उसके बारे में बाताया और साथ ही ये तंज भी कसा कि “हिंदी वाले” कुछ जानते समझते नहीं है और उठाकर नाम रख देते हैं. बकौल कोहली साहब-

“मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पश्चिम के एब्सर्ड दर्शन से मेरी इन रचनाओं का कुछ लेना देना नहीं है. इन एब्सर्ड उपन्यासों में जो जीवन चित्रित है, वह हमारा, आपका, हमारे आसपास का जीवन है. वह हमारा जाना-पहचाना अवश्य है, किन्तु अपनी तर्कहीनता के कारण अपनी किसी चर्चित विधा में उसका चित्रण मेरे लिए संभव नहीं हो पाया.”

इस उपन्यास का पहला संस्करण 1971 ई में आया. दरअसल पहले उपन्यास (जैसा कि लेखक मानते हैं) ‘अस्तपाल’ की रचना उनके अपने दुखद जीवन संस्मरण से प्रेरित है. उन्होंने एक जगह लिखा है कि मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने अस्पताल के उस पूरे प्रोसेस को एक कार्टून की नज़र से देखना शुरू कर दिया था और उसी तरह बाक़ी चार उपन्यास भी उसी मानसिकता में लिखे गए लेकिन फिर कभी छठा न लिखा जा सका. कहते हैं-

“रचना तो अपना शिल्प स्वयं ढूंढती है, जैसे आत्मा अपनी इच्छानुसार शरीर वरण करती है. पुनरावृत्ति की पुनरावृत्ति, मौलिकता को नष्ट करती है.”

बहरहाल, यह किताब इसलिए पढ़ी जानी चाहिए कि नरेंद्र कोहली ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की भी एक अलग छवि सामने आती है. छोटे-छोटे वाक्य, छोटे-छोटे से दृश्य, एक विचित्र किस्म की दृश्य संरचना लेकिन समाज की बेहद क़रीबी सच्चाइयाँ. मैंने कथानक पर बात नहीं की क्यूंकि ऐसा कुछ अलग नहीं है कि जिसे बता सकूँ और अगर बता दूँ तो खुद से पढ़ने लायक कुछ रहेगा नहीं। हाँ लेकिन शिल्प ऐसा कि मानो आपने किसी रोबोट को अस्पताल या मोहल्ले या किसी ऐसे पब्लिक प्लेस पर छोड़ रखा हो और वो आकर मंज़र दर मंज़र एक पिच-एक टोन में सुना दे. यह विचित्र शिल्प ही इसे अद्वितीय और रोचक बनाती है।

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इस किताब को खरीदने के लिए ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ पर या नीचे दी गयी इमेज पर क्लिक करें!

Paanch Absurd Upanyas


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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