‘समय’ – बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

काव्यशासस्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥

यह विख्यात है कि त्रिभुवन में विजय की पताका फहराने वाला, अपने कुटिल कुत्सित परिवार से ब्राह्मणों को दुःख देने वाला बली, प्रतापशाली, मायावी रावण जब भगवान रामचंद्र के रुधिरपाई बाणों से छिन्न-भिन्न हो पृथ्वी पर अपना पर्वत सरीखा अपार शरीर लिए गिरा और आकाश त्रिभुवन के हर्षनाद से पूरित हो गया, और अंतिम झटके उसे श्वास के आने लगे, अब अपने जेता के पूछने पर उसने कहा – “आवश्यक कृत्यों के संपादन में विलंब करना उचित नहीं। मैंने दो-तीन कृत्य करना आवश्यक समझा था और उन्हीं भूलों का फल मुझे तत्काल ही मिलेगा!” रावण यह नहीं जानता था कि त्रिभुवन त्राणदाता के सामने वह क्या कह रहा है। जब उसे स्वयं उन्हीं ने अपने हाथों से निधन किया तो अब इसके आगे उसे क्लेश मिल ही क्या सकता था। निश्चय जब अवसर चला जाता है, हाथ मलना ही भर रह जाता है। आलस्य से भरे भद्दे स्वभाव में बेकार बैठे रहने की इच्छा प्रबल होती है और जो यही कहता है आज नहीं कल, कल नहीं परसो यह करेंगे, जिसको तत्काल ही कर डालना उचित है, यह बात बुरी है। जब तक किसी कृत्य को अपना कर्त्तव्य समझा मनुष्य दृढ़ उद्देश्य से उसे न करेगा, कर्त्तव्य शून्य स्वभाव-अलहदी बन जाएगा। आलस्य लोहे की मुर्चा सी लिपट जौहर खा जाएगी फिर किसी कार्य के करने का उत्साह जाता रहेगा। क्या आश्चर्य कि ‘छाती पर की गूलर’ मूँ में डालने को दूसरे से कहना हो।

संसार में मनुष्य को जो कुछ सीखना, करना और निपटाना है उसके अर्थ समय बहुत ही कम मिला है; उसके जीवन के दिन गिने भये हैं, इससे इसको व्यर्थ न जाने देना चाहिए।

यदि अपने समय के प्रत्येक पल की चिंता मनुष्य रखे तो थोड़ी आयु को भी बहुत बढ़ा सकता है, जिसे वह एक मास में कर सकेगा उसी को बहुतेरे जीवन पर्यन्त में भी नहीं करेंगे। यदि उसका ध्यान उचित और उत्तम कृत्यों में निमग्न है तो समय सुख से व्यतीत करता है, नहीं तो बहुतेरों का जीवन भारभूत-सा हुआ रहता है। दिन-रात जम्हाते बीतना है इनकी दीर्घ-सूत्रता और रात-दिन के बर्ताव को देखने से यही जान पड़ेगा कि मानो ये अपने को अमर समझे हुए हैं। बहुतेरे खूब खाकर पेट पर हाथ फेरते पान कूचते तकिया आश्रय ले पलंग पर जा सो जाते हैं और बारह चौदह घंटा अपना समय नींद में खोते हैं। वैद्यों और डॉक्टरों का मत है कि छह घंटा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नियमित सोना उपयुक्त है। यदि इतना ही सोने का अभ्यास किया जाए तो कितना समय बच सकता है। अधिक सोने से केवल समय हानि ही नहीं होती, शरीर के जितने अवयव हैं, शिथिल और अयोग्य हो जाते हैं और 12 घंटे सोने के बाद उतनी ही व्याकुलता और अशक्तता कार्य करने में होती है। शरीर और मन दोनों को इससे हानि पहुँचती है। फिर खाने के पश्चात तुरंत सो जाने से आलस्य हाड़फूटन, अपच, म्लानता, शिरोव्यथा होती है, यद्यपि नींद झटपट आ जाती है।

यदि मनुष्य अपने अमूल्य समय को न खोना चाहे तो उसे क्षुद्र कामों में प्रवृत्त होना न चाहिए। ऐसे कृत्यों का करना अनुचित है जिसे पीछे समझदार मनुष्य लज्जित होता है और पछताता है। मनुष्य को अपने पद और योग्यता के अनुसार काम करना उचित है। यदि राज्य का भार आप पर है और आपने नाचने गाने में कथक कलावंतों को मात किया, कपड़े सीने में दरजी को हटाया, वा बहुत उत्तम पाक बना लिया तो क्या इससे आपकी ख्याति होगी वा आपके राज्य का काम सरेगा। गत हजरत नवाब वाजिदअली शाह को यदि किसी ने कैसर बाग की बारहदरी के भरे महफिल में पेशवाज पहिने नाचते देखा होगा, कभी भी भला बतला सकता था कि ये धुरीण हैं जो इस तरह गाने में कठिन से कठिन मोड़े ले रहे हैं और अपने नाचने, बनने, बतलाने और भाव से गुणग्राही रसिक मंडली का चित्र-सा खींच दिए हैं वा ‘इंदरसभा’ में गुल्फान बने, अपनी माधुरी मूर्ति और सुरीले स्वर से चमचमाती जवाहिर से जड़ी एकता अनूठी सब्जपरी को भुलाए हुए हैं और उसके यह कहने पर कि ‘अरे मैं वहाँ तुझसे कहती थी, क्यों न नाना हाय तूने मेरा कहा’ मुँह लटकाए हुए है वा बसंती पट पहिने सैकड़ों केसर रंगी सुमुखियों के खोजने पर भी नहीं मिलते। भूलभुलैया खेय रहे हैं और लंका की सीढ़ियाँ कामिनियों के सहारे उतर चढ़ रहे हैं। क्या ही उत्तम कृत्य ये राजा के हैं जिस पर करोड़ों की रक्षा का भार है! कैसी अवस्था की बरबादी है।

बहुतेरे शारीरिक सजावट ही में अपना समय बहुत खोते हैं, घंटों कपड़ा पहिनने, बाल बनाने में लग जाते हैं, पर इससे क्या सिद्धि होगी? ठोढ़ी चिकनी, बाल छल्लेदार बनेंगे? शरीर का स्वच्छ रखना स्पृहणीय है, परंतु क्या कभी अस्तबल में बँधा, जलेबी और महेला खाता चिकना सुंदर घोड़दौड़ में जीता बचेगा, वा सांसारिक सग्गड़ को डीलदार भूसे में पेट भरने वाले बैलों के समान खींच सकेगा। कोई बटेर को पंजे में दाब घंटों उसकी टँगड़ी खींचा करते, बुलबुल उँगली पर बिठा अड्डे पर उछाला करते, तीतिर को दीमक के वास्ते घुमाया करते, बाज के संग आखेट में जंगलों में गहेलियों से भरमा करते, शतरंज चौपड़ा खड़खड़ाया करते, ताश गंजीफा फेरते, साल भर टैय्यों की सो रही चिकनी करते हजारों का हेर-फेर किया करते हैं। यही काम यहाँ के बड़े आदमियों को करना उचित है! क्या ही अंधेर है, एक दो कौन कहे जीवन भर इसी में बीत जाता है।

प्रातःकाल उठ मनुष्य को विचार कर निर्णय कर लेना उचित है कि उसे उस दिन क्या-क्या और कितना करना है, तब उसके करने में तुरंत प्रवृत्त हो जाना उचित है। किसी किसी उत्तम दशा के आने पर या वर्तमान दशा के परिवर्तन पर किसी नूतन और लाभदायक कृत्य को करेंगे विचारना व्यर्थ है। केवल उन क्षणों को जो व्यर्थ बीते जा रहे हैं। यदि संभाल लो तो सब कुछ हो सकता है और समय का उचित बर्ताव तभी होगा जब नियम वा क्रम से मनुष्य अपने समय को बाँट देगा। जिसने ऐसा अभ्यास नहीं डाला है उसे वह आनंद नहीं मिल सकता है जो उनको मिलता है जिनकी नैमित्तिक क्रियाएँ चाहे वे कैसी ही कठिन क्यों न हों नियमित समय पर की जातीं और आवश्यक अवकाश जी बहलाने को छोड़ जाती है।

संसार में बहुत से ऐसे मनुष्य हैं जो अपने समय का उत्तम विभाग न कर जब जो चाहा करते हैं, जिसका फल यह होता है कि जितनी कार्यवाहियाँ उनकी होतीं अधूरी रह जातीं। इससे यदि दृढ़ संकल्प से किसी कार्य पर सन्नद्ध हो मनुष्य उसका यथोचित विभाग कर करना विचारेगा तभी वह उसे कर सकेगा,अव्यवस्थित चित्त कभी कुछ भी नहीं कर सका है। समय के खोने वालों को समय का यथार्थ रूप नहीं जान पड़ता, हाँ एक दिन अवश्य इसका आदर उन्हें होगा, और वह तब कि जब क्षण के शतांश के भी पाने की प्रार्थना उनकी व्यर्थ होगी, तभी अपने अमूल्य जीवन की फेंकी घड़ियों का मूल्य उन्हें यथार्थ में समझ पड़ेगा। परंतु निर्दय काले कठिन कुटिल कराल ने संयोग पहुँचने पर कब किसे छुटकारा दिया है।

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चित्र श्रेय: Ben White


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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