आज पंजाबी शायरी के विख्यात कवि शिव कुमार बटालवी का जन्मदिन है। प्रेम, विरह और करुणा के सागर में गोते लगाती उनकी कविताएँ, इस ‘बिरह के सुलतान’ को बड़ी कम उम्र में ही पंजाबी शायरी के शीर्ष स्थानों पर पहुँचा गयी हैं, जहाँ कविता प्रेमी पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनको पढ़ते और गुनगुनाते जा रहे हैं। ‘इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत’ किसने नहीं गुनगुनाया! जनता के लाडले इस शायर की कविताओं को नुसरत फतेह अली खान, जगजीत सिंह, हंस राज हंस से लेकर प्रीतम और अमित त्रिवेदी तक ने अपने गीतों में पिरोया है..

आज उनके जन्मदिन पर प्रस्तुत है शिव की दो कविताएँ, जिनका बेहद सुन्दर अनुवाद हिन्दी-उर्दू शायरी के जाने-माने नाम तरकश प्रदीप ने किया है.. पढ़िए और लुत्फ़ उठाईये.. तांगा चलता जा रहा है..!

‘एक सफ़र’

(कविता संग्रह ‘बिरहा तू सुलतान’ से)

वो भी शहर से आ रही थी
मैं भी शहर से आ रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

दूर मग़रिब की किसी टहनी पे दूर
फूल सूरज का अभी मुरझा रहा था
दरम्याँ थी दूरी हम दोनों के लेकिन
उस बदन का सेक मुझ तक आ रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

साँवली सी उस सड़क के दो किनारे
उस के होंटों की तरह लरज़ा रहे थे
बुर्जीयाँ और मील के पत्थर तो जैसे
उस सड़क के दाँत हों, भरमा रहे थे
बज रहा था एक चिमटा सा हवा का
शीशमों के पत्ते नग़मे गा रहे थे
देख कर कर हम दोनों को वो नामुराद
गुल पहाड़ी आक के मुस्का रहे थे
सुर्ख़ उसकी आँख के डोरे थे जो कि
मेरे दिल में शाम बोए जा रहे थे
दूर इक फीका सा तारा साँझ का था
जो गगन की गाल पर उभरा हुआ था
एक छोटे से गुलाबी मुखड़े पर हो
एक काला तिल, वो ऐसा दिख रहा था
दरम्याँ दोनों के जो भी फ़ासला था
और घटता और घटता जा रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

आस्माँ के नयनों में नीला धुँआ था
जैसे इक नवजात कौए का रुआँ हो
मुझको बख़्शे जाता था कितना सुकूँ वो
दूर उस धुएँ के पार के जँगल के पार
इक परिंदों की उड़ी जाती थी डार
मेरे जी में आया कि उस डार को मैं
ये कहूँ ऊँची सी इक आवाज़ मार,
“ले चलो हमको भी अपने साथ यार
दूर इस दुनिया से उस परलोक पार
देना हमको उस जज़ीरे पर उतार
हम जहाँ पाएँ सुकूँ से शब गुज़ार।”
था अँधेरा जो किसी नागिन की मानिंद
ओर मेरी ही सरकता आ रहा था
जबकि मेरा हाथ उसके हाथों से अब
जाने कितनी देर से टकरा रहा था
फ़ाख्ता का जोड़ा इक दीवार पे ज्यों
चोंच में दे चोंच को शरमा रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

लब सरीखे जो किनारे थे सड़क के
उन किनारों पर कतारें आम की थीं
और उन आमों पे जो था बूर उसने
अपनी सारी ही महक नीलाम की थी
चुन रही थीं वाँ पे तिनके कुछ बयाएँ
फ़िक्र उनको ढलती जाती शाम की थी
और मिरे हाथों में थे अब हाथ उसके
सर्द थे जो बर्फ़ से भी कुछ ज़ियादा
नर्म नाज़ुक हाथ उसके प्यारे प्यारे
प्यार कितना जा रहे थे मुझपे वारे
तब अचानक राह हमारा काटने को
काली बिल्ली जैसी काली कार आई
एक मुट्ठी फेंकी हम पे रौशनी की
और हमें उस खेल से बाहर को लाई
कार के पीछे थी चस्पा लाल बत्ती
जो चमकती दूर हमसे जा रही थी
हो सड़क के माथे की ज्यों लाल बिंदी
या मणि वो इक गले के हार की थी
और हवा के पाँव में पायल महक की
चार हाथों का मिलन पहना रहा था
यूँ लगा आषाढ़ का सूरज हथेली
पर उगा है, हाथों को पिघला रहा था
आँच बढ़ती जा रही थी
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

आ रही थी तेज़ टापों की इक आवाज़
था छनकता ताल में ताँगे का वो साज़
साज़ से आवाज़ उभरी इक अजब सी
जो कभी बचपन में भी हमने सुनी थी
बिजली के खम्बे से कानों को सटा कर
राज़ पर जिसका न खुलता था कभी भी
हम को लगता था कि भूतों की है बोली
जंगी-जहाज़ों का हो उड़ना जंग में ज्यों
दुनिया के पापों से चिढ़ कर हो गए हों
देवता दुनिया के सारे ही या नाराज़
आग के उस खेल से वो हाथ चारों
अब तलक भी तो नहीं आ पाए थे बाज़
आ रही थी तेज़ टापों की इक आवाज़
था छनकता ताल में ताँगे का वो साज़
गाँव उसका जिसमें थी ऊँची सी मस्जिद
और उस मस्जिद का जो मीनार था वो
उस अँधेरे में भी देखा जा रहा था
यानी उसके गाँव की हद आ गई थी
एक वो और एक उसका हाथ, दोनों
मेरे हाथों से निकल कर जा रहे थे
एक उसका गाँव इक मज़बूरी मेरी
दोनों मिलके मुझको खाने आ रहे थे
ताँगे वाला जाने क्यूँ गुर्रा रहा था
बेरहम जल्लाद था वो ताँगे वाला
जिसके हाथों घोड़ा पिटता जा रहा था
दूर इक पँछी कोई चिचला रहा था
सारा रस्ता उसकी चिचलाहट के सुर में
नींद में भी सुर मिलाता जा रहा था
सारा ताँगा अब किसी ताज़ा मरे इक
जानवर जैसा दिखाई दे रहा था
दूर मग़रिब की किसी टहनी को कोई
तारों का इक घुन सा खाता जा रहा था
और दियों की लौ में अपना गाँव मेरा
दूर से शमशान सा नज़र आ रहा था
दिल मेरा उड़ते फ़रारे की तरह बस
हर घड़ी माज़ी को उड़ता जा रहा था

ताँगे वाला जाने क्यूँ गुर्रा रहा था
बेरहम जल्लाद था वो ताँगे वाला
जिसके हाथों घोड़ा पिटता जा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था..

‘इश्तिहार’

(कविता संग्रह ‘आरती’ से)

इक लड़की
जिसका नाम मुहब्बत
गुम है गुम है गुम है
सीधी सादी सुन्दर मूरत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसकी परियों जैसी
सीरत की मरियम लगती है
हँसती है तो फूल झरे हैं
चलती है तो ग़ज़ल लगे है
ऊँचा लंबा कद है उसका
उम्र है आतिश जितनी उसकी
और नैनों की बोली समझे

वो जन्मों-जन्मों से गुमी है
पर लगता है बात हो कल की
बात लगे है आज की हो ज्यों
बात अभी ही की लगती है

अभी तो मेरे पास खड़ी थी
अभी तो मेरे पास नहीं है
ये क्या छल है कैसी भटकन
सोच मेरी हैरान बड़ी है

नज़र मेरी हर आते-जाते
चेहरे का रंग देख रही है
उस लड़की को ढूंढ रही है

साँझ ढ़ले बाज़ारों में जब
मोड़ों पर ख़ुशबू उगती है
फ़ुरसत, थकन और बेचैनी जब
चौराहों पर आ मिलती है
शोरनुमा तन्हाई में फिर
उस लड़की की कमी खाती है
उस लड़की की कमी दिखती है

हर छिन मुझको यूँ लगता है
हर दिन मुझको यूँ लगता है
मनते जश्नों की भीड़ों से
इक ख़ुशबू के झुरमट में से
वो मुझको आवाज़ा देगी
मैं उसको पहचान ही लूँगा
वो मुझको पहचान ही लेगी
लेकिन शोर की बाढ़ से मुझको
कोई भी आवाज़ न दे है
कोई भी मेरी ओर न देखे

पर जाने क्यों वहम पड़े है
पर जाने क्यों झलक दिखे है
हर दिन हर इक भीड़ में जैसे
उसका बुत गुज़रा करता है
पर मुझ को ही नज़र न आए
और मैं उस गुम सी लड़की के
चेहरे में गुम हो जाता हूँ
उसके ग़म में घुलता रहूँ मैं
उसके ग़म में खुर जाता हूँ

उस लड़की को मेरी क़सम है
उस लड़की को ख़ुद उस की क़सम है
उस लड़की को सब की क़सम है
उस लड़की को जग की क़सम है
उस लड़की को रब की क़सम है

वो जो कहीं पढ़ सुन ले अगर ये
ज़िंदा हो या मर बैठी हो
इक बारी आ के मिल जाए
मेरी वफ़ा को न दाग़ लगाए
वर्ना न मुझसे जिया जाएगा
गीत न कोई लिखा जाएगा

इक लड़की
जिसका नाम मुहब्बत
गुम है गुम है गुम है
सीधी सादी सुन्दर मूरत
गुम है गुम है गुम है

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