Tag: poetry

Kumar Vikal

दुःखी दिनों में

दुःखी दिनों में आदमी कविता नहीं लिखता दुःखी दिनों में आदमी बहुत कुछ करता है लतीफ़े सुनाने से ज़हर खाने तक लेकिन वह कविता नहीं लिखता दुःखी दिनों...
Venu Gopal

कौन बचता है

जहाँ इस वक़्त कवि है कविता है, वहाँ जंगल है और अँधेरा है और हैं धोखेबाज़ दिशाएँ। दुश्मन सेनाओं से बचने की कोशिश में भटकते-भटकते वे यहाँ आ फँसे हैं, जहाँ से इस वक़्त न...
Amar Dalpura

काम, गंगाराम कुम्हार

काम मेरे पास दो हाथ हैं— दोनों काम के अभाव में तन से चिपके निठल्ले लटके रहते हैं! इस देश की स्त्रियों के पास इतने काम हैं— भोर से...
Bhagwat Rawat

चिड़ियों को पता नहीं

चिड़ियों को पता नहीं कि वे कितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैं कविताओं में। इन अपने दिनों में खासकर उन्हें चहचहाना था उड़ानें भरनी थीं और घंटों गरदन में...
Sleep, Death

सिद्धार्थ बाजपेयी की कविताएँ

सुना तुम मर गए, गई रात कोई सुबह है किसी भी सुबह की तरह वासंती सन्नाटा गहरा है और अचानक कोयल बोली प्राणों को बेधती हुई कलेजे में उठी हूक की...
Kumar Vikal

यह सब कैसे होता है

मैंने चाहा था कि मेरी कविताएँ नन्हें बच्चों की लोरियाँ बन जाएँ जिन्हें युवा माएँ शैतान बच्चों को सुलाने के लिए गुनगुनाएँ मैंने चाहा था कि मेरी कविताएँ लोकगीतों की...
Bridge, Leaf

नया कवि: कविता से सम्वाद

ऐसा समय जहाँ मनुष्य की आकांक्षाओं के पाँव बढ़ते ही जा रहे हैं स्वर्ग की ओर और धँसता जा रहा है उसका शीश पाताल में, कई ईसामसीह...
Abdul Bismillah

ख़रगोश और चीते की तलाश

संग्रह 'निषेध के बाद' से जी हाँ, आप बता नहीं सकते कि आदमी के नाम पर जिन वैध-अवैध शरीरों को आप देख रहे हैं उनमें से किसके भीतर ख़रगोश...
Rohit Thakur

कविताएँ – मई 2020

गौरैया गौरैया को देखकर कौन चिड़िया मात्र को याद करता है? गौरैया की चंचलता देखकर बेटी की चंचल आँखें याद आती हैं, पत्नी को देखता हूँ रसोई में हलकान गौरैया...
Adarsh Bhushan

कविताओं पर रिश्वत का आरोप है

कुछ मेरी कविताओं पर कुछ तुम्हारी पर जिन कविताओं में शेष समर की विजय पताका फहरा दी गई दारुण साम्राज्यों ने कवियों से लिखवाए अपने ध्वजवंदन के छन्द जिन कविताओं ने टेक दिए...
jasvir tyagi

जसवीर त्यागी की कविताएँ

प्रकृति सबक सिखाती है घर के बाहर वक़्त-बेवक़्त घूम रहा था विनाश का वायरस आदमी की तलाश में आदमी अपने ही पिंजरे में क़ैद था प्रकृति, पशु-पक्षी उन्मुक्त होकर हँस रहे थे परिवर्तन का पहिया घूमता...
Vijay Rahi

शहर से गुज़रते हुए प्रेम, कविता पढ़ना, बेबसी

शहर से गुज़रते हुए प्रेम मैं जब-जब शहर से गुज़रता हूँ सोचता हूँ किसने बसाए होंगे शहर? शायद गाँवों से भागे प्रेमियों ने शहर बसाए होंगे ये वो अभागे थे, जो फिर लौटना...
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