दो जिस्म

दो जिस्म रूबरू
कभी-कभी हैं दो लहरें
और रात समन्दर है एक

दो जिस्म रूबरू
कभी-कभी हैं दो पत्थर
और रात रेगिस्तान है

दो जिस्म रूबरू
कभी-कभी हैं दो जड़ें
बंधी हुई सी रात में

दो जिस्म रूबरू
कभी-कभी हैं दो चाकू
और पैदा करे रात चिंगारी

दो जिस्म रूबरू
टूटते हुए हैं दो तारे
इक खाली आसमान में!

 

(अनुवाद: पुनीत कुसुम)