जब मैंने जाति छुपाई

अनुवाद: प्रकाश भातम्ब्रेकर

मुझ पर जात छुपाने के कारण आफ़त आई थी। उस घटना की याद आते ही पूरे तन-बदन में आग-सी लग जाती है। सिर भन्नाने लग जाता है और लगने लगता है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण देश में दलित बिरादरी में ग़लती से भी जन्म नहीं लेना चाहिए। इस बिरादरी में जन्म लेने पर तो इस कदर यन्त्रणा और अवमानना सहनी पड़ती है कि उससे तो मर जाने का दिल करता है। ज़हर खाकर ज़िन्दगी के खोल पर पर्दा डालने की इच्छा बलवती हो जाती है। भीतर की सभी अच्छाइयाँ और इन्सानियत काफ़ूर हो जाती हैं और बची रह जाती है पाशवी क्रूर खीझ और घृणा।

इसी मानसिक और बौद्धिक यन्त्रणा के दौर से मुझे गुजरना पड़ा था। यदि मैं कुछ दिन और अपनी जाति छिपाए रखता तो जैसे बिल्कुल ही पागल हो जाता या फिर हलाहल पीकर साँप के रूप में मुम्बई आ गया होता। यह तो अच्छा हुआ कि जिस दिन मुझे वेतन मिला, उसी रात रामचरण तिवारी के घर मेरे सामान की चोरी हुई और एक चोर ने वर्ण-चोर की चोरी का रहस्य खोल दिया। यानी रामचरण तिवारी ने मेरी यानी अपने उस्ताद की ख़ूब अच्छी तरह से मरम्मत की, लात-घूसे जमाए। ऐसी स्थिति में काशीनाथ सकपाल ने मुझे सामूहिक छीछालेदर की दोज़ख़ से बचा लिया।

वाक़या कुछ इस प्रकार हुआ ..।

पौ फटने के साथ ही मैं उधना स्टेशन पर उतरा और सीधे इंजन शेड की ओर चल दिया। नौकरी मिलने के उल्लास से मेरा तन आषाढ़-सा आक्रामक और संजीवक वर्षा-सा विक्रमी बन गया था। अपनी इन आन्तरिक सामर्थ्य की वजह से मुझे किसी से भय न था। वहाँ मुझे कोई भी पराया या अजनबी नहीं लग रहा था। कुल मिलाकर स्थिति मेरे लिए तनिक भी यातनादायी नहीं थीं। मेरा तन-बदन जैसे नई चेतना से सराबोर था। न कोई चिन्ता, न कोई समस्या। मुझे यक़ीन था कि जहाँ जाऊँगा, हर तरह से पैर जमा लूँगा, क्योंकि ट्रेन में बैठे बैठे रात भर मैं तरह-तरह के सपने संजोता रहा था।

सुबह के शीतल पवन के हिंडोले पर सवार होकर मैंने कामगारों के झुंड को आवाज़ दी। समूह के सभी कामगार ठिठक गए। उनमें से बॉलर फ़िटर रणछोड़ ने मुझसे पूछा, “केम भाई, सुं छे?”

मैंने विशुद्ध गुजराती में मन की बात कही। रणछोड़ तुरन्त कमरा देने के लिए तैयार हो गया और उसका साथी कामगार भौंचक्का-सा मुझे देखता ही रह गया। मेरा कोट, टोपी, कोल्हापुरी चप्पलें, हाथ में विराजमान मायकोवस्की का काव्य-संकलन और दूसरे हाथ में पकड़ा हुआ ट्रंक और बिछौना आदि। समूह के सभी लोगों की आँखों में अपने लिए स्नेह और ममता का भाव देखकर और अधिक उत्फुल्ल होकर मेरा मन प्रणयिनी की-सी अदा में महकने-बहकने लगा था। मैं खुशियों के महासागर में हिलोरें लेने ही लगा था कि रणछोड़ ने दबे स्वर में पूछ ही लिया, “लेकिन आपकी जाति कौन-सी है?”

यह सवाल सुनकर मैं बरस पड़ा, “आपने मुझसे यह पूछने की जुर्रत कैसे की? मेरे हुलिए से आप अन्दाजा नहीं लगा सकते? मैं.. मुम्बईकसा, यानी कि मुम्बईवासी, सत्यवादी, सत्यप्रेमी, सत्यान्वेषी, भारत को मुक्ति शक्ति दिलानेवाला प्रभार-पुंज समझे? या फिर एक बार सुनाऊँ? अपनी महिमा का बखान करूं?”

अपने ही नशे में इतना बकने के बाद मैं आगे बढ़ गया। रात भर स्वप्न के झूले पर हिचकोले लेता मेरा मन तीव्र गति से आगे बढ़ता जा रहा था। फिर भी उन लोगों की खुसुर-पुसुर तो मुझे पूरी-पूरी सुनाई पड़ रही थी। देवजी कह रहा था, “अरे रणछोड़, ब्राह्मण होगा या फिर क्षत्रिय। रोक लो उसे, पक्का करो सौदा, जल्दी..।”

लेकिन मेरे पहले ही वार से मर्माहत रणछोड़ पस्त हो गया था। इस काम में देवजी को ही पहल करने के लिए कह रहा था। अपनी इस कायरवृत्ति के कारण वे सभी लोग मुझे इतने बौने लग रहे थे, जैसे मेरी एक ही जेब में सिमट जाएँगे।

अन्त में दिल थामकर रणछोड़ मेरे क़रीब आया और अत्यन्त विनम्रतापूर्वक कहने लगा, “देखिए बुरा मत मानिए। नए आदमी से तो उसकी जाति पूछने का रिवाज ही है। आपको मैंने कमरा दे दिया। बात पक्की समझ लीजिए। किराया पाँच रुपये चलेगा?”

रणछोड़ को ही टोकते हुए देवजी ने कहा, “अरे भाई, जात-बिरादरीवालों के साथ तो हरी दूब बनकर रहना चाहिए, न कि लम्बा ताड़? और फिर आप जैसा आदमी धेड़-चमार के घर में थोड़े ही रह सकेगा? खुद ही चोर के घर में घुसकर आफ़त क्यों मोल लेगा?”

“कम-से-कम मेरे सामने तो ऐसी बातें मत किया कीजिए। मैं नए देश का नया सिपाही हूँ। हम अब एक-से हैं। ऊँच-नीच, धेड़-चमार, ब्राह्मण आदि सब झूठ है।”

“ग़लती हुई हमसे।”

“बेशक। इसीलिए तो सोने के अंडे देनेवाला हमारा देश फटीचर बन गया। क्या समझे?”

“लेकिन कमरे की बात तो पक्की हुई न? आप वहाँ रहेंगे तो?” रणछोड़ लाचार प्रार्थना करने लगा।

“सोचकर बताऊँगा।”

“इसमें सोचने की भला क्या बात है? मेरा कमरा छोटा तो है, पर बढ़िया है, पास ही कुआँ भी है। अमराई है। रंग-बिरंगे पंछी रोज़ाना वहाँ चहचहाते हैं, नाचते-फुदकते हैं। मेरी ओर से तो बात पक्की है।” रणछोड़ की ज़िद और मनुहार से मजबूर होकर मैंने अपनी स्वीकृति दे दी। फिर तो खुशी के मारे वह मुझे चाय के लिए चलने का आग्रह करने लगा।

“आप चलिए मैं अभी आता हूँ।” कहकर अपने सभी सहयोगियों को पीछे छोड़ वह फुर्ती से आगे निकल गया और कभी वैगनों को फलांगकर तो कभी उनके नीचे से होते हुए, शंटिंग से बचते हुए वह एक मटमैले वैगन में आ धमका। वहाँ चाय-नाश्ते की दुकान थी। उसे कैंटीन भी कहते थे। केंटीन में ठसाठस भीड़ थी, फिर भी वह तो भीतर घुस ही गया और हाथ नचाकर मुझसे कुछ कह रहा था कि मैंने सुना ‘महार’! मेरे कान में जैसे किसी ने बन्दूक दाग़ दी हो।

“महार?” रणछोड़ ने मुँह फेरकर चिल्लाने के से अन्दाज में कहा, तो गरूड़ पक्षी की भाँति कुलाँचे भरता मेरा मन जैसे धम्म से नीचे आ गिरा। मेरा हर्षोत्फुल्ल शरीर मानों विकलांग हो गया। मेरे खून की गर्मी जैसे बर्फ़ बन गई। यह शब्द विकट हास्य करते हुए मुझे डरा रहा था। मैं दीवार बना खड़ा था।

जोश में आकर मैंने जो भाषण पिलाया था, उसे मनु का धर्म मानकर उन लोगों ने मेरी जाति भी निर्धारित कर डाली थी और उसके बाद कैंटीन में किसी ने मुझे चावल में आए कंकर-सा अलग निकाल फेंका था। इतने बड़े सवाल का हल खोजने में मैं खोया हुआ था, तभी रणछोड़ का यह सवाल सुनाई पड़ा।

“तिवारी जी, महार किसे कहते हैं?”

और तिवारी ने नीम-हकीम की टेक में जवाब दिया, “महार, यानी महाराष्ट्रीय श्री शिवाजी के वंशज लड़ाकू।”

“जी नहीं पंडितजी। मैं डॉ. आंबेडकर की जाति का हूँ। उन्हीं की बिरादरी का। मुझे काशीनाथ सपकाल कहते हैं। मुम्बई में रहता हूँ। काला चौकी इलाक़े में।”

काशीनाथ का नहले पे दहला देखकर मेरी जान में जान आ गई। मेरी कँपकँपी थम गईं। तिवारी ने तुरन्त टिप्पणी की, “अस्पृश्य, यानी अछूत..?”

“आपने सही अर्थ बताया पंडित भैया जी।” काशीनाथ ने तिवारी को नीचा दिखाते हुए कहा।

लेकिन तिवारी भला कहाँ बर्दाश्त करने वाला आदमी था। उसने भी तपाक से कहा, “मारो साले धेड़ को!”

“मारो!” भीतर बैठे सभी लोगों ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई।

काशीनाथ ने तुरन्त चाय की प्याली नीचे पटक दी और दोनों हाथ जेब में डाल सीना तानकर कड़कते हुए कहा, “आओ, कोई भी आओ! तिवारी, तू आ, रणछोड़ तू आ, बुड्ढे तू आ, जाड़िए तू आ, कोई भी कित्ते भी लोग आओ।”

लेकिन किसी की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। सब लोग अकबकाए से टुकुर-टुकुर उसकी ओर देख रहे थे। इससे काशीनाथ और अधिक ताव में आता जा रहा था। वह ललकार रहा था, उद्दंडतापूर्वक कह रहा था, “अभी जाकर तुम्हारे फ़ोरमैन को इंडियन कॉन्स्टिटूशन पढ़कर सुनाता हूँ। तुम सब लोगों को जेल की हवा खिलाऊँगा, दूध में से मक्खी की तरह नौकरी से निकलवा दूँगा। कोई मज़ाक थोड़े ही है?” काशीनाथ ने बड़े ही रोब के साथ कहा और शान से क़दम-ब-क़दम बाहर चला गया।

भीतर बैठे प्रत्येक आदमी को काटो तो खून नहीं। लेकिन सबसे अधिक बेचैन था इबरीता, टुटपुंजिया नानाजी पाँचाला। वह बार-बार फ़ोरमैन ऑफ़िसर की ओर ताक रहा था। फिर यकायक उठ खड़ा होकर चिल्लाया, “भागो रे भागो – वो मुम्बई का धेड़ यदि फ़ोरमैन को यहाँ ले आया तो नौकरी चली जाएगी हमारी, सत्यानाश हो जाएगा। चलो, भागो।”

दूसरे ही क्षण लोगों ने ठेला-पेली शुरू कर दी। हर किसी को वहाँ से खिसकने की जल्दी थी। इस हड़बड़ाहट को देखकर तिवारी ने कड़कते हुए कहा, “अरे बैठो यारो, मैं यहाँ किसलिए बैठा हूँ? भाई से कहकर अभी उसका ट्रांसफर कराए देता हूँ, बैठो…”

उसका भाई फ़ोरमैन क्लर्क था, सो सब लोगों को उसकी बातों में कुछ दम अवश्य लगा। लेकिन कुछ लोगों की ज़बान तेज़ी से चलने लगी। गालियाँ बकते हुए वे इंजिन शेड की दिशा में आगे बढ़ने लगे। जमकर उसकी धुनाई करने की बात भी कहने लगे। उनका आवेग देखकर मुझे इतना दुःख हुआ कि उसी क्षण मुम्बई लौटने को दिल कर रहा था। उन लोगों के प्रति अपार घृणा हो रही थी। लेकिन घर की निर्धनता और फटेहाल स्थिति का स्मरण हो आया और मेरे क़दम जैसे-तैसे फ़ोरमैन ऑफ़िस की ओर बढ़ने लगे थे।

मेरी झुकी गर्दन और लड़खड़ाती चाल देखकर देवजी ने सहानुभूति जतलाई, “ठाकुर यकायक क्या हो गया आपको? बुख़ार-वुख़ार तो नहीं आया? लाइए पेटी मुझे दे दीजिए। फुर्ती कीजिए और मुम्बई के धेड़ से पहले अपनी हाज़िरी लगाइए, वर्ना वह कमबख़्त आपसे सीनियर हो जाएगा। साला भूत है भूत। आप ज़ल्दी कीजिए। मैं आपकी पेटी सुरक्षित रखूँगा। यहाँ चोरों का बहुत बोलबाला है। ये धेड़-चमार ही चोरी करते हैं साले।”

“जी नहीं।” अपनी वर्ण-चोरी के भय और उसकी जातीय कट्टरता के समक्ष उसकी सहानुभूति की बिलकुल भी क़द्र किए बिना मैं आगे बढ़ने लगा।

क़दम-क़दम पर मुझे अपने आप से ही भय लग रहा था। मेरा अन्तर्मन मुझे फ़ोरमैन ऑफिस में जाने से बराबर रोक रहा था। मेरी स्थिति फाँसी के फन्दे की ओर बढ़ते क़ैदी-जैसी ही हो गई थी। इसी उधेड़बुन में मैं फ़ोरमैन ऑफ़िस की सीढ़ियों तक पहुँच गया। अत्याधिक चिन्ताओं से घिरा होने से मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। तभी काशीनाथ विद्युत गति से धड़धड़ाता हुआ ऊपर से नीचे आ गया। उसका आवेग देखकर तो मेरी हालत और भी बिगड़ गई, उसकी बाँह थामकर मैंने कहा, “रुकिए, कुछ बताएँगे भी।”

काशीनाथ आपा खो बैठा था। उसने झटके से अपनी बाँह छुड़ा ली और जेब से चाकू निकालते हुए कहा, “हट जाओ, खलास कर डालूंगा।”

“मैं सुनना चाहता था कि आप पर क्या गुज़री। मैं भी मुम्बई से ही आ रहा हूँ। आप ही की…” रणछोड़ को क़रीब आते देखकर ‘जाति का हूँ’ शब्द मेरे मुँह से बाहर आने ही न पाए।

काशीनाथ सहम गया और उसने सम्पूर्ण वाक़या सुनाया तो सही, लेकिन वह पलभर को भी वहाँ नहीं रुका। वह सरपट चला गया। उसके बयान और अपमानजनक स्थिति से मेरा भी खून खौलने लगा। नौकरी न करने के इरादे से ही मैं सीढ़िया चढ़ने लगा। अन्त में फ़ोरमैन माता प्रसाद तिवारी की टेबिल के पास जाकर मैं इस अन्दाज़ में खड़ा हो गया, मानों फाँसी का फन्दा गले में डाले कोई शहीद। दोनों भाइयों की आँखों में खून उतर आया था और चेहरा तमतमाया हुआ था। उनके रूप को देखकर मैं भी मरने-मारने पर आमादा हो गया था।

“क्यों रे, उस आवारा अछूत के संग बातें कर रहा था तू?”

उनका गरूर तोड़ने के लहजे में मैंने कहा, “अछूत? कौन है अछूत? अग्नि भी अछूत है और सूर्य भी, मृत्यु भी, और पंचतत्व भी..।”

नौकरी की परवाह किए बिना, बेलाग होकर मैंने कहा, “बेशक, मैं मुम्बई से आ रहा हूँ। क्रान्तिपीठ मुम्बई नगरी से। मनु ने जिस देश का सत्यानाश कर दिया, मुम्बईवासियों ने उसे मुक्ति दिलवाई, मैं उसी महानगरी का एक मेहनती नागरिक हूँ। मुझे अपने कर्तव्य पर पूरा भरोसा है।” मैंने संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में जवाब दिया।

“क्या?” उसने हड़बड़ा कर पूछा। रामचरण दंग रह गया। उसने फिर वही वाक्य दुहराया, “उस धेड़ की बातों में आकर मुझे मुम्बई की पट्टी मत पढ़ाओ। मुझे माताप्रसाद कहते हैं, हाँ।”

मैंने तय कर लिया था कि यह नौकरी करनी ही नहीं। बल्कि उसे लहूलुहान करने के इरादे से मैंने कहा, “मैं? सर्वजनीन सुखों का शिल्पकार.. मानवता प्रेमी.. सत्य के लिए मर-मिटनेवाला एक लड़ाकू योद्धा! मेरी अपनी पहचान है। मुम्बई में मैं रहा हूँ।”

“बको मत!” उसने झल्लाकर कहा।

“मैं बकता नहीं हूँ। नव-भारत का मन्त्र पढ़ा रहा हूँ। नई भाषा में एक नए भारतीय से आपको परिचित करा रहा हूँ।”

“चुप रहो। उल्टी-सीधी बातें मत करो।”

“मैं तो सीधी बातें ही कर रहा हूँ। मैं मेहनती नागरिक हूँ। मनु के पिछड़े देश को दिव्य-भव्य आकार देनेवाला….”

“आप कवि तो नहीं हैं? “रामचरण खिल उठा था।

रामचरण स्नेहपूर्वक मेरी ओर देख रहा था। उसके स्नेह को ठुकराना भला कैसे सम्भव था? मैंने विनम्रता से जवाब दिया, “बेशक! आपने सही पहचाना मुझे।”

“सच।” रामचरण खुशी से झूमते हुए अपनी जगह से उठ गया और मेरा हाथ अपने हाथ में लेने के लिए अधीर हो उठा। लेकिन इसी बीच दम्भी माताप्रसाद चिल्लाया, “रामचरण…!”

रामचरण अकबकाया-सा फिर नीचे बैठ गया और माताप्रसाद ने अत्यन्त हेय दृष्टि से देखते हुए मुझसे पूछा, “क्या नाम?”

उसने क़लम दवात में डुबोई तो मेरे मन में फिर से नौकरी का मोह जग गया। घर के हालात याद आते ही अपने उद्दण्ड बर्ताव के लिए मलाल होने लगा और खालिस नौकरी करने की भावना से प्रेरित होकर मैंने अपना नाम सही-सही बतला दिया।

उसने मेरा नाम दर्ज कर लिया। लेकिन उसके अवमानना करने के कारण मेरा दिल कचोट रहा था। मैंने कहा, “मुझे माफ कर दीजिए…।”

वह खुश हुआ और बुजुर्गाना अन्दाज में उसने कहा, “तुम तो हिन्दी अच्छी बोल लेते हो। बिलकुल ब्राह्मणों की-सी शुद्ध।”

उसकी बुजुर्गियत का लिहाज करते हुए मैंने उसे अधिक प्रभावित करना चाहा, “साहब, हिन्दी तो भाषा है सन्त कबीर और तुलसी की, सूर और रहीम की, निराला और प्रसाद की, पन्त और प्रेमचन्द की।”

मेरे जवाब से रामचरण को बड़ा ही आनन्द हुआ और वह मन-ही-मन फूला नहीं समा रहा था। इसी बीच माताप्रसाद ने अक्खड़पन से कहा, “सर्टिफ़िकेट कहाँ है?”

मैं पल भर सोचता रहा। फिर निश्चिन्त भाव से, किन्तु विनम्रतापूर्वक मैंने कहा, “ग़लती से वहीं रह गए हैं।”

कहकर मैं उसके चेहरे के भाव देखने लगा।

“अच्छा, कहाँ तक पढ़े हो?”

“नान मैट्रिक। कला-साहित्य में अत्यधिक रुचि होने से आगे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई।”

“यहीं तो मार खा जाते हैं हम लोग और धेड़-चमारों को मौक़ा मिल जाता है। वे फटाफट अफ़सर, मिनिस्टर बन जाते हैं। रेलवे में उन्हें तो इतनी सुविधाएँ हैं कि मैट्रिक ही। इसलिए तुम दोनों क्लीनर ही रहोगे, जबकि वह फ़ायरमैन, ड्राइवर, कंट्रोलर बन जाएगा। इसीलिए तुम सर्टिफ़िकेट जल्दी से मंगवा लो। क्या समझे?”

“जी साहब।” दिखावटी विनम्रता से झुककर मैंने अभिवादन किया और मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इधर की दुनिया उधर हो जाए तो भी सर्टिफ़िकेट नहीं दिखाने हैं।

“जाओ! तुम देर से आए हो, लेकिन मैंने तुम्हें ही सीनियर बना दिया है। तुम्हारे आने से पहले ही रणछोड़ ने मुझे बता दिया था। और हाँ, इस कमबख्त से ज़रा दूर ही रहना। नालायक को शायरी ने कहीं का नहीं रखा, जाओ।”

मैं नीचे आकर ट्रंक उठने को हुआ तो रामचरण झट आगे आया और मुझसे पहले ट्रंक उठाते हुए बोला, “छोड़ो भी। आज से आप मेरे गुरु। मुझे आप काव्य सिखलाइए।”

रामचरण की श्रद्धायुक्त निकटता से मैं कुछ डर सा गया, लेकिन वह मुझसे अत्यन्त श्रद्धापूर्वक और स्नेहसिक्त भाव से बोल रहा था, इसीलिए मेरा मुँह बन्द हो गया था। उसके इतने आत्मीय बर्ताव से मेरा बीमार और कमज़ोर होता जा रहा मन भी खिलने लगा। मैं अपने अपराधों को विस्मृत करने लगा। उसके साथ गप्पें हाँकते हुए कुछ आगे निकल आया तो काशीनाथ की सन्तप्त आवाज़ से मेरा कलेजा हिलने लगा और मैं वहीं रुक गया। वह गला फाड़कर चिल्ला रहा था, “महार होने से क्या हुआ? दीवार के सामने पड़ी टट्टी-पेशाब की गन्दगी साफ़ नहीं करूँगा।”

“तुम्हें करनी होगी और बराबर साफ़ करनी होगी।” माताप्रसाद के हुक्म पर अमल करनेवाला एक निम्न जाति का मुकादम बोल रहा था।

यह देखकर रामचरण का खफ़ा होना स्वाभाविक था, लेकिन मेरी अवस्था बड़ी विचित्र ही रही थी। मुकादम काशीनाथ पर जैसे ज़ोर जता रहा था, वैसे ही उनकी इस कहासुनी का मज़ा लूटने के लिए काफ़ी संख्या में कामगार इकट्ठा हो गए थे और मुकादम का हौसला बढ़ा रहे थे।

नौकरी के पहले ही दिन काशीनाथ की नौकरी पर आँच न आने देने के इरादे से मुकादम के क़रीब जाकर मैंने कहा, “मुकादम साहब, इस तरह के ओछे काम कोई पढ़ा-लिखा युवक कर सकता है? ऐसे युवकों से कहना भी नहीं चाहिए। ये तो अधकचरे, अपंगों का काम है… इसलिए…।”

मुझे बीच में ही टोकते हुए तिवारी ने कहा, “तुम्हारा मतलब है कि अपंग, वृद्ध अधकचरे ब्राह्मण ये काम करेंगे? बहुत खूब!”

तिवारी के दो टूक जवाब से सभी को सन्तोष हुआ था। उन्हें मुझसे नाराज़गी भी हो रही थी, बल्कि मुझे वे हिकारत भरी निगाहों से देख रहे थे। तिवारी की बहुत खूब टिप्पणी ने मुझे बोध दिया था। फिर भी मैंने कोई जवाब नहीं दिया था। इसीलिए मैंने कहा, “युवा-वर्ग ही देश की असली सम्पत्ति है, तिवारी जी। पंचतत्वों के ही समान वह छठी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात भी और कोई हो सकती है? इसीलिए हमें चारों ओर दुःख-दर्द और विलाप के सिवा और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता।”

ज़ाहिर है, कि मेरी बातें किसी को रास नहीं आई थीं, बल्कि मैंने अनुमान लगाया तो कुछ लोग तो मुझसे जाति पूछना चाहते थे। यह देखकर मेरा कलेजा तार-तार हुआ जा रहा था। मैं काशीनाथ को बचाने की कोशिश कर रहा था और काशीनाथ लोगों से अधिकाधिक उलझता जा रहा था। मुकादम के कान पर जूं नहीं रेंगती थी, सभी कामगार काशीनाथ के खिलाफ थे। मैं कड़ुआ घूँट पीकर आगे बढ़ता गया, बढ़ता गया..।

इस ‘शुभारम्भ’ के बाद आए दिन नई समस्या सामने आ खड़ी होती और मेरे व्यक्तित्व, जिसे कितनी मुश्किल से मैंने गढ़ा था, को चूर-चूर कर डालती। काशीनाथ तो प्रतिदिन जैसे तपती रेत में झुलस रहा था। छोटी-मोटी बातों को लेकर हर किसी से वह उलझ जाता था, इसलिए अधिकतर कामगारों में वह अप्रिय ही हो रहा था। वे लोग उसकी मामूली-सी भूल को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं थे। शायद इसी वजह से वह प्रत्येक व्यक्ति को शक की नज़र से देखता था। बात-बात में आपा खो बैठता था। उसकी जेब में सदा चाकू मौजूद रहता था। उसकी उग्रता और व्यग्रता को मैं समझ सकता था। इसीलिए तो मैं जान की बाजी लगा रहा था, अपने मन को क़ाबू में रख रहा था। अत्यन्त सतर्कता से पूरी सावधानी बरत रहा था कि तैश में आकर कोई उसे छूरा न घोंप दे और ऊपर से इस बात का भी बराबर ख़याल रख रहा था कि लोगों को मेरी असलियत का पता न चलने पाए। इस अतिरिक्त सावधानी के कारण ही स्वयं को अपनी कायरता, मूर्खता और कमज़ोरी के लिए मैं कोस भी रहा था।

यानी, किसी खूनी या अपराधी के समान मैं गुमसुम रहने लगा था। मेरा बड़बोलापन कभी का ख़त्म हो चुका था, जैसे सहमे हुए ख़रगोश की भाँति मैं भीड़ में कहीं खो जाना चाहता था। मुम्बई की भीड़ में रहकर सदा ही अभ्यागतों से घिरा रहने वाला मैं, अपनी वर्ण-चोरी की पोल खुल जाने के भय से एकान्त के अंधेरे में धंसता जा रहा था और वहाँ जाकर अपने आपको ही कोसते हुए विलाप कर रहा था। मुझे जी जान से चाहने वाला रामचरण! लेकिन उससे मैं कटा-कटा सा रह रहा था।

बन्द मुँह से, लात-घूसों के प्रहार सहते हुए मैं गुज़र-बसर करने लगा था कि वेतन दिवस क़रीब आ गया। नौकरी छोड़ देने के नेक इरादे से मैंने छुट्टी की अर्जी लिखी। सर्टिफ़िकेट लाने के लिए छुट्टी मंजूर की। यह बात जैसे-तैसे रामचरण को पता चल गई और वह मेरे पीछे पड़ गया, “चाहे जो कीजिए, लेकिन जिस दिन तनख्वाह होगी उस दिन मेरे घर खाना खाइए।” उसके आग्रह का अनादर मैं नहीं कर पाया। मैंने हामी भर दी।

वेतन मिला तो ‘नौकरी छोड़नी चाहिए’ यह मृतप्राय सवाल एक बार फिर घर की विपन्नता से मेरा साक्षात्कार कराने लगा, ताकि मुझे नौकरी में डटे रहने की आवश्यकता का एहसास हो। मेरी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। अपनी गलतियों के लिए मैं अपने आपको कोसने लगा। और इस मामले में ‘हाँ’ या ‘ना’ निर्णय लेने के लिए अँधेरे में बैठकर सोचने लगा। एक के बाद एक सिगरेट का दौर चल रहा था, लेकिन जाति की असलियत का पता चल जाने के बाद की अपमानजनक स्थिति में नौकरी करने के लिए भीतर से मन तैयार नहीं हो रहा था। नौकरी छोड़ने की भी हिम्मत नहीं होती थी। मैं उसी उधेड़बुन में था कि काशीनाथ ने दस्तक दी।

“मास्टर….”

“आओ, काशीनाथ भाई, आओ!” वर्णभेद की पाशवी रूढ़ि की क्रूरता से लहूलुहान काशीनाथ मेरी खुशी या नाराज़गी की परवाह किए बिना मेरे आग्रह के बावजूद भीतर आने से कतरा रहा था। वह बाहर ही खड़ा रहा।

“आओ भी, मुझे अपने से अलग क्यों समझते हो?” एक हिम्मती और जाँबाज़ युवक की संकोचवृत्ति से मेरा दिल पसीज रहा था। एक सजातीय साथी के घर में इतना संकोच! असलियत बता देने के लिए होंठ फड़कने लगे थे, लेकिन रणछोड़ की धमकी का स्मरण हो जाते ही मेरे दाँत खट्टे हो गए थे। आँखों की नमी को मैं अपनी धोती से पोछता जा रहा था।

“मास्टर जी, हर बार आपने मुझे रोकने की कोशिश की, वर्ना रणछोड़ या रामचरण इन दो मक्कारों में से एक तो निश्चय ही मेरे चक्कू का शिकार बन जाता और मेरे माँ-बाप-बीवी को भूखों मरना पड़ता… मास्टर जी, मुझे गुस्सा ही बड़ी जल्दी आ जाता है। मेरा बड़ा जीजा, कमबख्त बहुत ही काँइयाँ हैं। मेरी बहन को हर रोज इतना परेशान होना पड़ता है, जिसकी कोई हद नहीं। उसे वह पीटता है, गाली-गलौज करता हैं। यह देखकर बचपन से ही मैं इतना उखड़ जाता था कि घर में एक कौर भी खाने को दिल नहीं करता था और जब मैं मैट्रिक में था तो मामला और संजीदा हो गया। उसे सबक़ सिखाने के लिए मैंने गुंडो से दोस्ती की और खूब पिटवाया। जैसे-तैसे वह बच गया, वर्ना उसका तो खून ही हो जाता। बस, तभी से मेरा पढ़ना-लिखना बन्द हुआ।”

“मास्टर जी, मैं यह नौकरी छोड़ रहा हूँ। मुम्बई जाकर जो भी काम मिले, करूंगा। मैट्रिक की परीक्षा दूँगा। कॉलेज में जाऊँगा। वकील बनूंगा। मुझे कामगार नहीं बनना है। ये जीना भी कोई जीना है? पल-पल मरना..।” यह सब कहते हुए उसकी आँखे जैसे अंगार उगल रही थीं। तलवार की धार-सा और संवेदनशील मन था उसका। उसके मानसिक दुःख-दर्द का अनुमान मैं भली-भाँति लगा सकता था। मेरा गला जैसे रुंध गया।

“सपकाल.. मैं भी नौकरी छोड़ने की सोच रहा हूँ। यहाँ अधिक रहना मुश्किल है। हम दोनों साथ-साथ ही चले चलेंगे। मैं भी तो तुम्हें अपना क़िस्सा सुनाना चाहता हूँ। काशीनाथ मेरी भी…” उससे क्षमा याचना करते हुए मैं उसे असलियत बता देना चाहता था कि इतने में रणछोड़ वहाँ आ गया।

काशीनाथ को मेरे घर में देखकर उसके तन-बदन में जैसे आग लग रही थी। काशीनाथ के प्रति घृणा और तिरस्कार से वह काँप रहा था। उसने कड़क कर कहा, “क्या तमाशा चल रहा है। कल मुम्बई जा रहे हो तो आज मेरा कमरा अपवित्र कर डालना चाहते हो?”

“कमीने, तुझे ढेर कर दूंगा यहीं…” काशीनाथ अत्यधिक उत्तेजित होकर रणछोड़ की ओर लपक पड़ा, लेकिन रणछोड़ झट अपने कमरे में चला गया और किवाड़ बन्द कर लिये। वर्णभेद के भूत को काशीनाथ ने किस क़दर झिंझोड़कर रख दिया था, यह देखकर मैं सकपका गया था। मैंने अपनी समूची शक्ति से काशीनाथ को रोक लिया। वह यकायक शिथिल पड़ गया। उसने मेरे कन्धे पर गर्दन धर दी और छोटे बच्चे-सा शान्त पड़ा रहा। कुछ क्षण उसी अवस्था में रहने के बाद उसने जेब में से चाकू निकाला और रात के अंधेरे में अदृश्य हो गया।

मैं चिन्ता, कातर भाव से अंधेरे को ताकता रहा, बस। बत्ती जलाने या खाना खाने की चेतना भी मुझमें नहीं बची थी। वर्णभेद का यह उग्र और भयंकर रूप देखकर मैं भीतर से टूट चुका था।

“उस्ताद..।” रामचरण ने बुलाया तो मुझे संजीवक सावनधारा का एहसास हुआ। उसकी आवाज़ सुनकर धेड़ों के लिए एक अश्लील गाली देते हुए रणछोड़ फिर बाहर आया। रामचरण ने उसे समझाने-बुझाने की कोशिश की तो वह मुझ पर भी बिगड़ गया, मेरी जाति पर शक करने लगा। इस पर रामचरण को क्रोध आ गया।

अपने ब्राह्मण के अहंकार से उत्तेजित होकर वह रणछोड़ पर धावा बोलने लगा। रणछोड़ भी अपने क्षात्र-तेज की महत्ता सिद्ध करते हुए रामचरण को नीचा दिखाने की कोशिश करने लगा। उन दोनों में कहा-सुनी हो रही थी तो मैंने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया और वहाँ से चल देने के इरादे से बाहर आ गया। रणछोड़ के घर में, उसकी पत्नी के हाथ में किराये के पैसे थमाकर चल दिया।

रामचरण झगड़ा-वगड़ा छोड़कर दौड़ा-दौड़ा मेरे पीछे आया और गुस्से में ही कहने लगा, “तुम्हें मैंने खाने का न्यौता दिया था और यहाँ तुम चल भी दिए?”

मैंने एक बार सिर्फ़ उसे देखा और गर्दन लटकाकर चलने लगा।

“उस्ताद! कुछ बोलो भी? रणछोड़ ने कुछ तुम्हें? हाथापाई की? बताओ तो साले की टाँग तोड़ दूँगा!”

“कुछ नहीं हुआ।” मैंने गर्दन हिलाकर इशारे से ही जवाब दिया तो उसका गला रुँध गया। वह वहीं का वहीं ठिठक गया और हवा में हाथ नचाते हुए भर्राए स्वर में कहने लगा, “मैंने तुम्हें कितनी बार कहा कि उस अछूत के संग उलझना बेकार है…”

“क्यों? वह और मैं एक माँ की सन्तानें है, एक ही भाषा-भाषी हैं। इसी धरती पर पलते हैं। और आसमान को ओढ़ लेते हैं…”

“तुम बहुत दूर की कौड़ी बिठाते हो। ज़रा आसमान से धरती पर उतर आओ, हम मामूली कामगार हैं।”

“इसीलिए तो हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। ज़िन्दगी को नया रंग-रूप देने का दायित्व हमारे सिर पर आ पड़ता है।”

“उस्ताद! चलो, अब घर चलो।”

“रामचरण, मुझे माफ़ करना। अब तक मैंने काफ़ी हलाहल पी लिया। अब और अधिक पचाने की हिम्मत नहीं रही। अब मेहरबानी करके तुम मेरे साथ चलो। एक ज़रूरी बात करनी है तुमसे।” मैं वर्ण-चोरी का क़िस्सा सुनाना चाहता था।

“नहीं उस्ताद, सरस्वती बहुत दुःखी हो जाएगी। वह पानी का घूँट भी नहीं पी पाएगी। वह सबेरे से खटती रही है।”

‘मुझे माफ़ करना’ कहते ही वह मेरे चरण छूने लगा। उसकी अडिग श्रद्धा से मैं वाकई गद्गद् हो उठा और मैंने कहा, “यार मेरे चलो, तुम्हारे स्नेह के लिए मृत्यु का भी स्वागत करूंगा मैं। चलो।”

हम दोनो मुँह सिलकर चलते रहे और उसका घर आ गया। उसने बाहर से ही आवाज़ दी, “सरस्वती, देखो तो कौन आया है, इन्हें प्रणाम करो।”

सरस्वती जैसे हमारी राह में आँखें बिछाए बैठे थी। हमारी आहट पाते ही पाजेब खनकाते हुए वह बाहर आई और वह मोहक छरहरे बदन की तन्वंगी मेरे चरण छूकर चली गई, लम्बे काले बाल, माँग में भरा सिन्दूर, माथे पर टीका और शालीन अदा, उसके पति की तुलना में उम्र अनुकूल और रंग-रूप में कनिष्ठ होते हुए भी वह मेरे पैर छू गई। भारतीय नारी की पतिनिष्ठा और पतिभक्ति की मिसाल देखकर मैं हैरत में पड़ गया था। पत्नी के साथ-साथ रामचरण भी भीतर गया। पानी की बाल्टी, तेल की शीशी, साबुन की नई टिकिया आदि लेकर बाहर आ गया। फिर अत्यन्त उत्साह के साथ उसने कहा, “वहाँ बैठकर नहा लो। आओ मैं तेल मलता हूँ।”

मैं पानी-पानी हो गया, “भाभी को मेरे पैर छूने का कहा यह तो ग़लत था ही, लेकिन और कोई ग़लत काम मैं नहीं होने दूँगा।”

“लेकिन उसमें ग़लत क्या है? अतिथि तो भगवान के अवतार होते हैं।” किवाड़ की आड़ से सरस्वती ने कहा।

“जी नहीं। मैं पहले ही अधमरा हो गया हूँ। अब तो पूरी तरह से मर जाऊँगा।”

वह मुस्कुराई, मैं मुंह-हाथ धोकर भीतर गया। काशीनाथ को बड़ी मुश्किल से तो मैंने बस में कर रखा था। लेकिन रणछोड़ ने नमक-मिर्च लगाकर यह वाक़या सुनाया था। वह घटना मुझे याद हो आई और लगा कि शायद इसीलिए रामचरण मुझे नहाने का आग्रह कर रहा था। अतएव मैंने कहा, “हम खाने के लिए बाहर ही बैठे तो कैसा रहेगा..?”

“जी नहीं। तुम एक ब्राह्मण के गुरु हो। कहकर वह मुझे भीतर ले गया।”

“लेकिन मैं ब्राह्मण हूँ नहीं..।”

उसने मुझे पीढ़े पर बिठाया। सरस्वती हमारे सामने बैठी, दोनों को पंखा झल रही थी। पंखा क्या झल रही थी, सज़ा भुगत रही थी, मुझे लगा। रामचरण के आग्रह की वजह से मेरी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। साँप छुछुन्दर की-सी हालत हो रही थी। सरस्वती का भोजन होने तक रामचरण ने बाहर के कमरे में बिछौना आदि लगा दिया था।

सरस्वती के आते ही शेरो-शायरी का दौर शुरू हुआ। मैं अपनी बेचैनी से राहत पाने के लिए उसकी प्रेम कविताओं की तारीफ़ के पुल बाँधे जा रहा था। सरस्वती को खुश करने के उद्देश्य से बीच-बीच में कविताओं का अर्थ भी बतला रहा था। मैं उसके एहसानों का एतबार करना चाहता था। लेकिन मन-ही-मन उससे डर भी रहा था।

देर रात तक महफ़िल जमी रही। बाद में वह भीतर चला गया और मन की व्यथा को पूर्णतया भुलाकर मैं चैन की नींद सोता रहा।

मेरी आँख तब खुली, जब लात-घूसों से मैं कराह रहा था। रामचरण का कमरा आदमियों से खचाखच भर गया था। उनमें से कुछ तो मुझे तरह-तरह की गालियाँ दे रहे थे क्योंकि मैंने असली जाति छुपा रखी थी। कुछ और ‘संजीदा’ क़िस्म के लोग भी उनमें थे, जो मेरी अच्छी तरह से मरम्मत कर रहे थे। जितना कट्टर भक्त था, उतना ही खूँखार दुश्मन बना रामचरण भी मुझ पर पिल पड़ा था। उसकी पत्नी ने मेरी सेवा की, उसी कारण उसका सिर और चकराने लगा था। अत्यधिक भावुक होने के कारण उसका गुस्सा ठंडा पड़ता ही नहीं था, बल्कि पल-पल वह बढ़ता ही जा रहा था।

लेकिन पराए मर्दो के सामने घूँघट काढ़नेवाली सरस्वती भीतर से ही चिल्लाकर कह रही थी, “इसमें उनका कोई क़सूर नहीं। वे तो यहाँ आने से ही कतरा रहे थे। वे तो लुट गए हैं बेचारे! चारों तरफ़ से लुट गए हैं। छोड़ दीजिए उन्हें, शान्त हो जाइए। वर्ना मैं उन्हें बचा लूंगी..।”

अभी उसका वाक्य पूरा हुआ भी नहीं था कि भगदड़ मची। पलक झपकते ही पूरा कमरा ख़ाली हो गया। लोग एक-दूसरे से कहने लगे, “वो, मुम्बई का धेड़ मवाली हाथ में छुरा लेकर खून की होली खेल रहा है। भागो।”

यह सुनते ही सरस्वती बाहर आई और अपने पति को भीतर ले गई, फिर किवाड़ बन्द कर मेरे पास आ बैठी और खुद अपने आँचल से मेरे साथ, बदन पर पड़े खून के निशान पोंछने लगी। उसकी निगाहें जितनी पैनी थीं, उतनी ही उष्ण हथेलियाँ। कोमल हाथों के सुखद स्पर्श से ही मेरे घाव नरम पड़ते जा रहे थे।

इतने में काशीनाथ विद्युत गति से भीतर घुस आया और चक्कू नचाते हुए चिल्लाया, “मास्टर जी, कमाल किया तुमने..।”

उसकी शाबाशी से भी मुझे पिटाई जितना ही गहरा घाव लगा। काशीनाथ को देखते ही सरस्वती अपनी माँग का सिन्दूर बचाने के लिए बन्द दरवाज़े से सटकर खड़ी हो गई।

“हट जाओ!” चक्कू नचाते हुए काशीनाथ फिर एक बार चिल्लाया, तो सरस्वती डटकर उसका मुक़ाबला करने के लहजे में वहीं जमी रही। काशीनाथ कहीं उसे अपमानित न करे, कहीं उसे घायल न कर दे, इस भय से असहनीय वेदनाओं के दौर से गुज़रते हुए भी जैसे-तैसे खड़ा होकर मैंने कहा, “चलो काशीनाथ!”

काशीनाथ ने मुझे सहारा दिया और चलने को हुआ। इसी बीच सरस्वती की आँखों का बाँध टूट गया और अत्यन्त चपलता से उसने अपने आँसुओं से मेरे पैर सींचे। फिर उसी फुर्ती से भीतर का किवाड़ खोलकर वह रामचरण के पास चली गई।

अब वह पूरी तरह से भयमुक्त थी। हम अपने रास्ते चल दिए।

मेरा सब कुछ चोरी हो गया था। सर्टिफ़िकेट रामचरण ने पहले ही फाड़कर फेंक दिए थे। मेरी गर्दन में चोट आई थी। चाल तो लड़खड़ा रही थी, लेकिन मेरे भीतर भारी उथल-पुथल भी चल रही थी और नंगा चाकू नचाते हुए काशीनाथ का दहाड़ना बराबर जारी था।

अब बस्ती पीछे छूट गई थी। काशीनाथ ने कहा, “चलो, पुलिस-स्टेशन चलते हैं।”

“नहीं।”

“वो लोग तुमको पीट रहे थे और तुमने कुछ नहीं किया?”

“उन्होंने मुझे थोड़े ही मारा? वे तो मनु को पीट रहे थे! चलो भी…”