‘सैक्स फंड’ – सुषमा गुप्ता

“आंटी जी चंदा इकठ्ठा कर रहें हैं। आप भी कुछ अपनी इच्छा से दे दीजिए।”

“अरे लड़कियों, ये काॅलेज छोड़ कर किस बात का चंदा इकठ्ठा करती फिर रही हो?”

“सैक्स फंड।”

“हैं! ये क्या होता है?” मिसेज खन्ना के चेहरे पर घोर आश्चर्य के भाव थे।

“आंटी जी हम में कुछ लड़कियाँ कल शहर के बाहर की तरफ बनी वेश्याओं की बस्ती में बात करने गए थे कि वो हर मोहल्ले में अपनी एक ब्रांच खोल लें । पर उन्होंने कहा कि उनके पास इतना पैसा नही है, तो हमने कहा फंड हम इकठ्ठा कर देंगी।”

“हे राम! सत्यानाश जाए लड़कियों तुम्हारा। सब के घर परिवार उजाड़ने हैं क्या, जो बाहर की गंदगी लाकर यहाँ बसा रही हो?”

“आंटी जी गंदगी नहीं ला रहे बल्कि हर गली मोहल्ले के बंद दरवाज़ों के पीछे बसी कुंठित गंदगी को खपाने की कोशिश कर रहे हैं वो भी उन देवियों की मदद से जिनकी वजह से आप जैसे घरों की छोटी बच्चियाँ सुरक्षित रह सकेंगी। हम वहाँ ऐसी बहुत औरतों से मिले जो स्वेच्छा से मोहल्लों में आकर बसने को तैयार हैं। बस सारी मुश्किल पैसे की है तो हमने कहा हम फंड से तुम्हारी महीने की सैलेरी बांध देंगे। और कोई अपनी इच्छा से ज्यादा देना चाहे तो और अच्छा।”

“हाँ ,आंटीजी अब आदमजात की भूख का क्या भरोसा, कब, कैसे, कहाँ मुँह फाड़ ले। सब पास में और हर जगह उपलब्ध होगा तो शायद कुछ बच्चियों को इन घृणित बलात्कारियों से बचाया जा सके।” दूसरी लड़की ने अपना तर्क दिया।

“तो क्या हर जगह ये कंजरखाने खुलवा दोगी?”, मिसेज खन्ना ने बेहद चिढ़ कर कहा।

“ठीक कहा आंटीजी आपने। कंजर ही तो खपाने हैं यहाँ। शरीफ तो वैसे भी जाने से रहे। आज इन कंजरो से न भूख संभल रही है, न सरकार से कानून व्यवस्था। तो हमें तो अपनी इन बहनों से मदद मांगने के अलावा और कोई उपाय नज़र नहीं आ रहा। आप के पास कोई हल हो तो आप बता दो?”

मिसेज खन्ना कुछ घड़ी अवाक् देखती रहीं, उनके पास कोई जवाब न था। अंदर से दो हज़ार का नोट लाकर दे दिया और कहा- “जब ज़रूरत हो, और ले जाना।”

“जी”

“बहनें …”, बुदबुदाती हुई मिसेज़ खन्ना अंदर चली गई और रिमोट उठा टीवी बंद कर दिया जिस पर सुबह से हर चैनल पर बच्ची के साथ हुए गैंग रेप का ब्यौरा और तथाकथित समाजसेवी लोगों के बयान से सजा सर्कस आ रहा था।

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चित्र श्रेय: Kristina Flour


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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