स्त्री की व्यक्तिगत भाषा

स्त्री ने जब अपनी भाषा चुनी
तब कुछ आपत्तियाँ दर्ज़ हुईं…

पहली आपत्ति दहलीज़ को थी
अब उसे एक नियत समय के बाद भी जागना था।

दूसरी आपत्ति मुख्य-द्वार को थी
उसे अब गाहे-बगाहे खटकाये जाने पर लोकलाज का भय था।

तीसरी पुरज़ोर आपत्ति माँ हव्वा को थी
अब उसकी नज़रें पहले सी स्वस्थ न रही थीं।

चौथी आपत्ति आस-पड़ोस को थी
वे अपनी बेटियों के पर निकलने के अंदेशें से शर्मिंदा थे।

पाँचवी आपत्ति उन कविताओं को थी
जिनके भीतर स्त्री
मात्र मांसल-वस्तु बनाकर धर दी गयी थी।

स्वयं भाषावली भी उधेड़बुन में थी;
कि कहीं इतिहासकार उसे स्त्री को बरगलाने का दोषी न ठहरा दें….

तब से गली-मुहल्ला, आँगन व पंचायतों के निजी एकांत
अनवरत विरोध में है कि
स्त्री को अथाह प्रेम व चल-अचल सम्पति दे देनी थी
लेकिन उसकी व्यक्तिगत-भाषा नहीं….!!


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मंजुला बिष्ट
मंजुला बिष्ट

बीए. बीएड.
गृहणी, स्वतंत्र-लेखन
कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि
उदयपुर (राजस्थान) में निवास

इनकी रचनाएँ
हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका,
दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र
व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

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