लद गए दिन सभ्यता और शिष्टता के
बीत चुका वह काल जहाँ
द्रोण आते थे नज़र आदरणीय
कि ठुकराए जाने पर भी
मूर्ति गढ़ एकलव्य उनको पूजता था

आज गर मिल जाएँ कहीं
शिष्य ऐसे
जो भाग्य अपना भूलकर
और रंग अपना धूल कर
बैठे हों नतमस्तक कहीं
सम्मुख गुरू के
तो पहले गुरू मुस्काएगा
देखकर के मीडिया को आसपास
और फिर अश्लील सी मुस्कान भर
कह जाएगा-
‘हे एकलव्य, बेटा तुम सुनो!
मैं नहीं मानता ऊँच-नीच को
वर्ण को, धर्म को, जात को
क्या हुआ जो तुम नहीं हो पुत्र, राजा के किसी
क्या हुआ जो शीश पर
नहीं धारण किये हो तुम किसी
कुल के वैभव और प्रतिष्ठा, शान को
क्या हुआ? कुछ भी नहीं!!

आओ बेटा, तुम सुनो
तुमको है अधिकार उतना
जितना कि अर्जुन को है
या शायद उससे भी अधिक
क्योंकि तुममें देखी है लगन
मैंने अद्भुत और अपार
आओ तुमको ले चलूँ उस पार
इस संग्राम के
जो द्वंद्व करवाता है मध्य
दो गुणी शिष्यों में मेरे
आओ बेटा, हाथ मेरा थाम लो..”

और थाम करके हाथ तब एकलव्य का
द्रोण फिर कहते हैं यूँ-
“हे धनुर्धर, तुम करो विश्वास मेरा
है वचन मेरा तुम्हें
कि इस जगत में बात होगी
जब कभी लक्ष्य की
या धनुष और बाण की
तो मात्र गूँजेगा तुम्हारा नाम इस संसार में
तुम रहोगे अग्रिम सदा ही
अर्जुन से भी इतिहास में..”

लेकिन तभी कैमरे की बत्तियाँ थीं बुझ गयीं
और टप-टप लाल-सा कुछ बहने लगा…

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पुनीत कुसुम
कविताओं में स्वयं को ढूँढती एक इकाई..!

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