मुझसे पहले

मुझसे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा, उसने शायद अब भी तेरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बेनाम-सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के...

प्यार का जश्न

प्यार का जश्न नयी तरह मनाना होगा ग़म किसी दिल में सही, ग़म को मिटाना होगा। काँपते होंठों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना तुझको लायी है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहना मेरे घर...

तुम जो सियाने हो, गुन वाले हो

हीरे, मोती, लाल जवाहर, रोले भर-भर थाली अपना कीसा, अपना दामन, अपनी झोली ख़ाली अपना कासा पारा-पारा, अपना गरेबाँ चाक चाक गरेबाँ वाले लोगो तुम कैसे गुन...

ख़ाली मकान

जाले तने हुए हैं घर में कोई नहीं 'कोई नहीं' इक-इक कोना चिल्लाता है दीवारें उठकर कहती हैं 'कोई नहीं' 'कोई नहीं' दरवाज़ा शोर मचाता है कोई नहीं...

फ़क़त चन्द लम्हे

बहुत देर है बस के आने में आओ कहीं पास की लॉन पर बैठ जाएँ चटखता है मेरी भी रग-रग में सूरज बहुत देर से तुम भी चुप-चुप खड़ी...

मेरे पुरखों की पहली दुआ

रात की कोख से सुब्ह की एक नन्ही किरन ने जनम यूँ लिया शब ने नन्ही शफ़क़ की गुलाबी हसीं मुट्ठियाँ खोलकर कुछ लकीरें पढ़ीं और सबा से...

अपनी जंग रहेगी

जब तक चंद लुटेरे इस धरती को घेरे हैं अपनी जंग रहेगी अहल-ए-हवस ने जब तक अपने दाम बिखेरे हैं अपनी जंग रहेगी मग़रिब के चेहरे पर यारो...

सब दिन एक जैसे नहीं होते

सब दिन एक जैसे नहीं होते कल का दिन तो ऐसा नहीं था जैसा आज का है हर दिन अपनी-अपनी गुफा में छुपा जब सवेरे-सवेरे हम से सामना करता है तो...

तेरे ख़तों की ख़ुशबू

तेरे ख़तों की ख़ुशबू हाथों में बस गई है. साँसों में रच रही है ख़्वाबों की वुसअतों में इक धूम मच रही है जज़्बात के गुलिस्ताँ महका...

चकले (जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं)

ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के ये लुटते हुए कारवाँ ज़िन्दगी के कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं ये पुर-पेच गलियाँ, ये बे-ख़्वाब बाज़ार ये...

इस गली के मोड़ पर

इस गली के मोड़ पर इक अज़ीज़ दोस्त ने मेरे अश्क पोंछकर आज मुझसे ये कहा— यूँ न दिल जलाओ तुम लूट-मार का है राज जल रहा है कुल...

निवाला

माँ है रेशम के कारख़ाने में बाप मसरूफ़ सूती मिल में है कोख से माँ की जब से निकला है बच्चा खोली के काले दिल में है जब...

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Silent, Quiet, Silence, Woman, Shut, Do not speak, Taboo

अंधेरे के नाख़ून

एक छोर से चढ़ता आता है रोशनी को लीलता हुआ एक ब्लैक होल, अंधेरे का नश्तर चीर देता है आसमान का सीना, और बरस पड़ता है बेनूर...
Adarsh Bhushan

लाठी भी कोई खाने की चीज़ होती है क्या?

हमारे देश में लाठियाँ कब आयीं यह उचित प्रश्न नहीं कहाँ से आयीं यह भी बेहूदगी भरा सवाल होगा लाठियाँ कैसे चलीं कहाँ चलीं कहाँ से कहाँ तक चलीं क्या पाया...
Raghuvir Sahay

चेहरा

चेहरा कितनी विकट चीज़ है जैसे-जैसे उम्र गुज़रती है वह या तो एक दोस्त होता जाता है या तो दुश्मन देखो, सब चेहरों को देखो पहली बार जिन्हें...
Kumar Ambuj

कुछ समुच्चय

स्मृति की नदी वह दूर से बहती आती है, गिरती है वेग से उसी से चलती हैं जीवन की पनचक्कियाँ वसंत-1 दिन और रात में नुकीलापन नहीं है मगर...
Gaurav Bharti

हम मारे गए

हमें डूबना ही था और हम डूब गए हमें मरना ही था और हम मारे गए हम लड़ रहे थे कई स्तरों पर लड़ रहे थे हमने निर्वासन का दंश...
Rahul Sankrityayan

तुम्हारे धर्म की क्षय

वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक...
Melancholy, Sadness, Night

लाखन सिंह की कविताएँ

1 जीना किसी सड़ी लाश को खाने जैसा हो गया है, हर एक साँस के साथ निगलता हूँ उलझी हुई अंतड़ियाँ, इंद्रियों से चिपटा हुआ अपराधबोध घिसटता है माँस के लोथड़े...
Abstract, Head, Human

शिवम तोमर की कविताएँ

रोटी की गुणवत्ता जिस गाय को अम्मा खिलाती रहीं रोटियाँ और उसका माथा छूकर माँगती रहीं स्वर्ग में जगह अब घर के सामने आकर रम्भियाती रहती है अम्मा ने तो खटिया...
Agyeya

युद्ध-विराम

नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है। अब भी ये रौंदे हुए खेत हमारी अवरुद्ध जिजिविषा के सहमे हुए साक्षी हैं; अब भी ये दलदल में फँसी हुई मौत की मशीनें उनके...
Rahul Boyal

जब तुम समझने लगो ज़िन्दगी

वो जहाँ पर मेरी नज़र ठहरी हुई है वहाँ ग़ौर से देखो तुम तुम भी वहाँ हो मेरे साथ मेरे दाएँ हाथ की उँगलियों में उलझी हुई हैं...
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