जली हुई रस्सी

अपने बर्फ़ जैसे हाथों से वाहिद ने गर्दन से उलझा हुआ मफ़लर निकाला और सफ़िया की ओर फेंक दिया। पलक-भर वाहिद की ओर देखकर...

अपनी केवल धार

"जब तक इंसान खाना खाएगा, तब तक उसको तीन चीज़ों की ज़रूरत रहेगी ही। खाने की, आग की और चाक़ू की। खाना किसान उगाता...

धूप का एक टुकड़ा

क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूँ? नहीं, आप उठिए नहीं! मेरे लिए यह कोना ही काफ़ी है। आप शायद हैरान होंगे कि...

एक प्लेट सैलाब

मई की साँझ! साढ़े छह बजे हैं। कुछ देर पहले जो धूप चारों ओर फैली पड़ी थी, अब फीकी पड़कर इमारतों की छतों पर सिमट...

अनारकली

नाम उसका सलीम था मगर उसके यार-दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इसलिए कि उसके ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे, ख़ूबसूरत था। चाल ढाल से रऊनत...

अबाबील

उसका नाम तो रहीम ख़ाँ था मगर उस जैसा ज़ालिम भी शायद ही कोई हो। गाँव-भर उसके नाम से काँपता था- न आदमी पर...

अब और कहने की ज़रूरत नहीं

ये दुनिया भी अजीब-ओ-ग़रीब है... ख़ासकर आज का ज़माना। क़ानून को जिस तरह फ़रेब दिया जाता है, इसके मुतअल्लिक़ शायद आपको ज़्यादा इल्म न...

ग़रीबों की बस्ती

यह है कलकत्ता का बहूबाज़ार, जिसके एक ओर सरकारी अफ़सरों तथा महाजनों के विशाल भवन हैं और दूसरी ओर पीछे उसी अटपट सड़क के...

आँखें

उसके सारे जिस्म में मुझे उसकी आँखें बहुत पसन्द थीं। ये आँखें बिल्कुल ऐसी ही थीं जैसे अन्धेरी रात में मोटर कार की हेडलाइट्स जिनको आदमी...

छोटे-छोटे ताजमहल

वह बात न मीरा ने उठायी, न ख़ुद उसने। मिलने से पहले ज़रूर लगा था कि कोई बहुत ही ज़रूरी बात है जिस पर...

खुचड़

बाबू कुन्दनलाल कचहरी से लौटे तो देखा कि उनकी पत्नीजी एक कुँजड़िन से कुछ साग-भाजी ले रही हैं। कुँजड़िन पालक टके सेर कहती है,...

बुलबुल

"और फिर मुझे दिन-भर करना ही क्या होता है। वो ठीक ही कहते हैं, काम वाली कपड़े धोती है, सफ़ाई करती है। अब ऐसा कौन-सा काम रह जाता है। ज़रा सा बच्चों को ही तो देखना होता है।"

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