पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे थे। फिर उसे याद आया, आज तो छुट्टी का दिन है। उसने पैर फैला लिए। पलकें आँखों पर ढलक आने दीं। वह रेशमी चादर का नरम चिकना स्पर्श गालों पर महसूस करती हुई पड़ी रही। नींद की मीठी ख़ुमारी अब भी उस पर छायी थी। खुली हुई खिड़की से सवेरे की ठण्डी हवा आ रही थी, पूरी तरह से जगी होने पर भी नींद को बहलाकर फिर बुलाना चाह रही थी। पर वह बच्चा था कि रोए ही जा रहा था। छोटा-सा कोमल गोरा-गोरा बच्चा! गोल मुँह पर भवों की जगह पतली-सी लकीर, लम्बे-लम्बे रेशमी पलक। जब क्रोधित होकर रोता था तो गोल-गोल आँसू गालों पर आ फिसलते थे और सारा काजल अपने साथ बहा ले जाते थे।

छुट्टी का दिन माया के लिए पहाड़-सा होता था; सप्ताह-भर जो काम टालती आती थी कि उन्हें ख़तम करके भी इतना समय बच जाता था कि खीझ उठती थी। झुँझला उठती थी। और जब भाई-बहनों के साथ घर पर रहती थी तो समझ भी न पाती थी कि इतवार कब आया और कैसे पंख लगाकर उड़ गया।

रोज़ की तरह आज भी चैती दरवाज़े पर धक्के देने लगी। तकिए में मुँह गड़ाकर माया ने अनसुनी करने की चेष्टा की पर लगातार धक्कों के साथ चैती ने ‘बीबी जी’ की पुकार लगानी शुरू कर दी तो माया ने ठण्डी साँस ली, चादर हटाकर आँखें मूँदे ही मूँदे, उसने टटोलकर पैर स्लीपरों में डाले और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, अभ्यस्त उँगलियों ने चटखनी गिरा दी। और सवेरे-सवेरे चैती का मुँह न दीख जाए, इसलिए वापस मुड़कर अपने बिस्तर पर आ गिरी। उसका मन चैती को भरपूर डाँट लगाने का हो रहा था, पर पलकों पर अभी कुछ भारीपन था। इसलिए वह चुप ही रही। चैती ने पहले नल खोलकर बर्तन उसके नीचे डाल दिए और खुरखुर करती हुई झाड़ू लगाने लगी। तब माया उठकर बैठी। हाथ फैलाकर अँगड़ाई ली, फिर ज़ोर से कहा, “सोने नहीं दिया न? क्यों चैती?”

धोती का पल्ला कमर में खोंसे झाड़ू हाथ में लिए पर्दा हटाकर चैती ने दर्शन दिए। कहा, “सोती काहे नहीं?” और परदे के पीछे ग़ायब हो गई।

माया उठकर खिड़की के पास आयी। इधर-उधर के फ़्लैट्स में हलचल हो रही थी। एक तरफ़ दूधवाला अपनी बाल्टी में मैला-गन्दा हाथ बार-बार डालकर दूध नाप रहा था। हर बार नाप का बर्तन बाल्टी से टकराता और फिर लोटे में दूध गिरने की आवाज़ के साथ दूधवाले का मोटा खरखराता कण्ठ कहता, ‘चार-पाँच-छह’।

माया ने ग़ुसलख़ाने में जाकर बेसिन में नल खोल अपने हाथ उसके नीचे कर दिए। पानी की तेज़ और ठण्डी धार हाथों पर पड़ती रही। चौके से चैती की खटपट सुनायी देती रही। माया ने गीत की एक कड़ी गुनगुनाने का प्रयत्न किया, पर आवाज़ बेसुरी हो गई। उसकी आँखें बेसिन के ऊपर लगे शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देख रही थीं, सूना मुँह, सूनी आँखें, एक क्षण को उसे लगा कि यह प्रतिबिम्ब किसी और का है। वह स्वयं कैसे इतनी थकी, इतनी टूटी-सी हो सकती है। शीशे के अन्दर से वह अनजान-सी युवती, माया को, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो, ऐसे देखती रही, जब तक कि माया ने भीगे, असहाय, विवश हाथों से अपने बाल छूते हुए दृष्टि हटा न ली। उजले, सफ़ेद बेसिन के किनारे पानी की बूँदें फिसल रही थीं। माया की आँखें उस एक बूँद पर टिक गईं, जिसे सूरज की पहली किरन ने इन्द्रधनुषी रंगों से सजा दिया था। बूँद हिली फिर चिकने बेसिन पर फिसलती हुई पानी की धारा में मिल गई।

माया ने रुकी हुई लम्बी साँस बाहर आ जाने दी फिर अपने पर जैसे क़ाबू पा, दोनों हाथों से अँजुलियाँ भर-भर अपने मुँह पर ज़ोर से छींटे देने लगी। उसी तरह, पानी भरती और मुँह पर उछाल देती, बिना कुछ सोचे, बिना कुछ सोचने का यत्न किए।

फिर उसने नल बन्द कर दिया। तौलिया उठायी और उसके नरम-नरम रोयों में अपना मुँह छिपा लिया। कुछ देर बाद उसने हाथ बढ़ाकर तौलिया स्टैण्ड पर फेंक दी। तौलिया ज़मीन की ओर तेज़ी से गिरी, पर तभी खूँटी में उसका कोना फँस गया और वह झूलती रही, धीरे-धीरे, बेबस-सी, पर माया ने उधर नहीं देखा, वह फिर पंजों पर ज़ोर दे शीशे में झाँकने लगी थी, एक अदम्य आशा लिए कि शायद इस बार वह झाँकनेवाली युवती पहले से भिन्न हो और वह कुछ भिन्न थी भी, आँखें कुछ ज़रा-सी फैली थीं बरौनियों में, भौंहों में चिकना गीलापन था, उजले कोयों में बड़ी-सी तरल पुतलियाँ, होंठों में कोमलता, माया के देखते-देखते वह खिंचे और खुल गए। उस छोटी-सी मुस्कान ने सारे चेहरे पर एक कमनीय स्निग्धता ला दी। माथे को घेरे हुए जो बालों की लटें थीं, उनमें कुछ बूँदें उलझी थीं, माया ने गरदन मोड़ी तो कनपटी के पास… एक बूँद में उसे रंग दिखायी दिए, ढेर सारे रंग, चमकते हुए, झिलमिलाते हुए, तड़पते हुए, कहीं वह गिर न जाएँ इस डर से माया शीशे के आगे से हट आयी। दरवाज़ा खोला और कमरे में आकर कुर्सी पर पैर उठाकर बैठ गई। हाथ गाल पर टिकाकर सोचा, और अब?

चैती पास की मेज़ पर चाय पहले ही रख गई थी। रोज़ की तरह मोटे, पतले, बेढंगे, कहीं गीले, कहीं कड़े, टोस्ट थे, रोज़-रोज़ का सुनहरी धारीवाला नाज़ुक प्याला था, वही कढ़ी हुई कोज़ी थी, जिस पर एक चिड़िया पंख खोलकर उड़ने को तैयार थी। पर उड़ेगी नहीं, उड़ सकती भी कैसे थी? उसे देखकर माया का मन एक निरर्थक आक्रोश से भर उठा था। उसका मन हुआ कि पैर से ठोकर मारकर मेज़ उलट दे और सारे बर्तन खनखनाकर ज़मीन पर जा गिरें। चीनी के बर्तनों के टूटने की आवाज़ कितनी प्रिय होती है? पर मन में उसके मूल्य का अन्दाज़ा लगा और यह सोच कि बेकार में नए ख़रीदने पड़ेगे उसने अपने को रोक लिया और प्याले में चाय उँड़ेलने लगी।

गरम चाय को गले से उतार वह फिर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। नीचे सड़क थी, कहीं-कहीं तारकोल हट जाने के बड़े-बड़े धब्बे थे। कहीं गहरे गड्ढे थे। अगर किसी ताँगे का पहिया उसमें फँस जाता तो चाबुक फटकारकर ताँगेवाला एक गाली दे उठता, अगर रिक्शे का पहिया होता तो रिक्शेवाला ज़ोर लगाकर निकलने की कोशिश करता और अगर तब भी न निकलता तो सवारियों को उतरना पड़ता। इस बाधा से उसके चेहरे रोष से लाल हो-हो जाते और बाद में मैले अँगोछे से माथा पोंछता रिक्शावाला और सवारियाँ सड़क की ऐसी हालत पर दुःख से सिर हिलाते नज़रों से दूर हो जातीं। सड़क के उस पार एक इमारत थी, बड़ी-सी, पुरानी-सी, मरम्मत की सख़्त ज़रूरत थी, सड़क की तरफ़ मुण्डेर थी, जिस पर एंटिगोनम की लता छायी हुई थी और पोर्टिको की धूमिल पीली दीवारों पर गहरे बैगनी रंग में फूलती हुई घनी बेगमबेलिया थी, अपने वैभव में लचकती-झूमती बल खाती। जब हवा आती तो माया अपनी खिड़की से उनके बैगनी रंग के फूल टूट-टूटकर उड़ते हुए देख सकती थी। उन तीन पंखुड़ियों के फूलों में कितना रंग था, कितनी मृदुता, पर माया के दिल में वह एक घनी पीड़ा भर जाते थे। इस वक़्त सूरज की किरणें बेगमबेलिया पर पड़कर उसके रंग को और चटकीला बना रही थीं। सुबह की हवा से कभी-कभी कोई फूल नीचे भटककर आ गिरता था।

माया उसमें डूबी थी, रमी हुई थी, हाथ खिड़की पर टिके थे, आँखें सामने, उसने नहीं जाना कि कब चैती आयी। जब पायदान के पास बैठकर उसने दो बार झाड़ू ज़मीन पर पटकी तो उसने आँखें हटायीं। वह कल्पना और स्वप्न थे, यह कमरा, यह दीवारें, यह बन्धन, जीवन और सत्य।

मालकिन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित हुआ देख चैती ने कहा, “खाएका का बनिहै?”

इतवार का दिन है, छुट्टी का दिन, आज तो कुछ विशेष खाना बनाना चाहिए। चैती को स्वामिनी का खोयापन अच्छा नहीं लगा।

“न खाबे का शौक़ न पहिरे का!” सिर हिलाते हुए उसने जो झाड़ू पटकी तो लाख की एक चूड़ी चट से टूट गई। उसके टुकड़े बीनते हुए चैती ने कहा, “का बनाई?”

“कुछ भी बना लो।” माया ने उदासीनता से कहा।

“खिचरी डाल देई?” व्यंग्य से चैती ने पूछा।

“अयँ खिचड़ी… वही बना दो।” माया ने कहा।

तब चैती ने कहा, “ऐ बिटिया। तोहार अस परानी हम नाहीं देखा न कबो कछू खाएँ न बनवाएँ। हमहूँ आदमी हन। हमरो मन है, हम खीर-पूरी खाब, कहै देइत है। दूध हम लै लिया है।”

चैती ढीठ हो गई। पर माया ने कुछ नहीं कहा। हटकर चली आयी और कपड़ों की अलमारी खोली, कुछ रेशमी कपड़े धोने के लिए सप्ताह-भर से रखे थे, उन्हें बाहर किया, और जाकर गर्म पानी में साबुन घोलकर डाल दिए, अनमनी होकर फिर आकर अपनी मेज़ पर बैठ गई। एक ओर कापियाँ रखी थीं। उन पर धूल की गहरी परत थी। माया ने लाल पेंसिल उठा ली, धूल झाड़कर एक कापी खोली, ग़लतियों पर गहरे लाल निशान लगा दिए, पर मन उसमें भी नहीं लगा। हाथ बढ़ाकर पास की छोटी मेज़ पर से अख़बार उठा लिया, खोला।

अचानक ही वह कुर्सी खिसकाकर उठ खड़ी हुई, घड़ी पर नज़र डाली तो पाया कि बड़ी आसानी से दस बजे की फ़िल्म देखी जा सकती है। जाकर फिर अलमारी खोली। कुछ सोचकर एक साड़ी निकालकर पलंग पर रख दी और तैयार होने लगी। अभ्यस्त हाथों से बाल ठीक किए। पाउडर लगाया। कुछ देर अपने को देखती रही और लिपस्टिक उठाकर अपने होंठ, ख़ूब गहरे लाल कर लिए। कपड़े बदले और चैती से कहा, “मैं सिनेमा जा रही हूँ।”

चैती ने पूछा, “कब तक अइहौ?”

“यही बारह साढ़े-बारह तक”, और पर्स उठाकर बाहर आ गई। खुली खिड़की से हवा आयी और अख़बार के पृष्ठ उड़कर फ़र्श पर जा गिरे, खुली कॉपी के पेज सरसराते रहे, मेज़पोश का कोना हिलता गया।

और हॉल में बैठी माया को लगा कि जिस अकेलेपन से बचना चाहकर वह सिनेमा चली आयी थी, उससे निष्कृति कहाँ हुई? अभी उसकी नितान्त अकेले बैठकर सिनेमा देखने की आदत नहीं हुई थी, कुछ विचित्र अटपटा-सा लग रहा था। इण्टरवल में उसने एक उड़ती-सी नज़र से इधर-उधर देखा, तो पाया कि कॉलेज की संस्कृत टीचर मिसेज़ भारद्वाज भी कुछ दूर बैठी हैं, उन्होंने भी माया को देखा और हाथ हिलाकर पास बुलाया। माया को उनका साहचर्य विशेष प्रिय न था पर यह सोचकर कि एक से दो भले, उठकर उनके पास चली गई।

“अकेली ही हो?” प्रश्न हुआ। मिसेज़ भारद्वाज की तीव्र दृष्टि माया पर थी।

“जी।”

“आज तो तुम पहचानी नहीं जा रही हो”, कुछ व्यंग्य से मिसेज़ भारद्वाज ने कहा।

उत्तर में माया ने मुस्करा दिया।

तभी एक वयस्क-से सज्जन उसकी ओर देखते हुए पास आ गए। मिसेज़ भारद्वाज ने कहा, “यह मेरे पति हैं, मि. भारद्वाज। आप मिस सहगल… हमारे कॉलेज में हिन्दी पढ़ाती हैं।”

मि. भारद्वाज ने नमस्कार किया और पासवाली सीट पर बैठ गए। कुछ वार्तालाप करने का प्रयास करते हुए पूछ दिया, “अभी ही आयी हैं आप?”

कुण्ठित हो माया ने कहा, “जी।”

पत्नी की ओर उन्मुख होकर पूछा, “चाय वग़ैरा कुछ मँगवाऊँ?”

“मँगवा लें। यह साड़ी बड़ी प्यारी है! यहीं से ली है?” मिसेज़ भारद्वाज ने पूछा।

“मदर ने भेजी है।”

“आपका घर यहाँ नहीं है?” मि. भारद्वाज को जैसे कुछ बात करने का विषय मिला।

“जी नहीं”, और फिर कहा, “लखनऊ में है।”

“वहाँ से आप यहाँ आयीं? इस छोटे शहर में?”

माया की मुस्कान अनजाने में ही विषादपूर्ण हो गई। कहा, “यहाँ आसानी से नौकरी मिल गई।”

“आपको कभी पहले नहीं देखा।”

पति को धीरे-धीरे खुलते देख मिसेज़ भारद्वाज ने कुछ चेतावनी के-से स्वर में कहा, “यह नयी आयी हैं इसी साल।”

बेयरा के चाय ले आने से व्यवधान पड़ा। माया ने अभी एक घूँट ही चाय पी थी कि हॉल की रोशनी बुझ गई। उसके उठने का उपक्रम करने पर मिसेज़ भारद्वाज ने बाँह पर हाथ रखकर रोकते हुए कहा, “यहीं बैठी रहो न!”

माया फिर बैठ गई, पर उसका मन हो रहा था मिस्टर और मिसेज़ भारद्वाज के बीच की सीट से उठ इधर मिसेज़ भारद्वाज के पास बैठ जाए, पर यों उठ जाना अभद्रता होती। मि. भारद्वाज शालीनता से बैठे रहे। कभी भूल से भी उनकी कोहनी या कन्धा माया से नहीं छुआ, पर कुछ हँसी की बात पर उनका ज़ोर से, खुलकर हँसना माया को खटक जाता था, आख़िर ऐसा ठहाका कि हॉल गूँज जाए, लगाने की क्या ज़रूरत? बीच में माया ने अपने को झिड़का भी, फिर इस ज़रा-सी बात पर वह बेकार ही मन-ही-मन क्यों कुढ़ रही है।

फ़िल्म अधिक लम्बी न थी। जब समाप्त हुई तो माया ने मानसिक यातना से छुटकारा पाया। शिष्टता के साथ, जितनी जल्दी उनसे छुट्टी ले सकती थी, लेकर माया अलग हुई, पर अभी उसका मन घर जाने को न हुआ। सड़क के एक किनारे खड़े होकर कुछ देर सोचा कि और क्या किया जाए? ध्यान आया कि दूर के रिश्ते के एक भाई यहीं कहीं आसपास रहते हैं और माया के न आने का कई बार उलाहना दे चुके हैं। उनके घर आधा घण्टा बिता आया जाए। पर्स में एक स्लिप पर उनका पता लिखा था, उसे ढूँढकर निकाला।

घर उनका आसानी से मिल गया। बाँसों को बाँधकर एक घेरा-सा बना दिया गया था। कुछ सूखे-सूखे टमाटर के पेड़ और कुछ गेंदे फूल रहे थे। माया ने दरवाज़े पर थपकी दी। कुछ देर में एक महिला अन्दर से झाँकी, अन्दाज़ से सोचकर कि यही भाभी होंगी, माया ने नमस्कार कर कहा, “चन्दन भाई साहब हैं? मैं माया हूँ।”

भाभी उत्तर में मुस्करायीं और दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “आइए।”

कमरे में एक गन्दी-सी निवाड़ का पलंग पड़ा था, पास ही चारपाई थी, जिस पर बिस्तर बिछा था। एक गीली-सी गद्दी भी थी और सिरहाने छोटे बच्चे के कुछ कपड़े।

“बैठिए।”

माया पलंग की पट्टी पर बैठ गई, भाभी की धोती मैली थी और उसमें से घी की तेज़ महक आ रही थी।

“आपने मुझे पहचाना न होगा। चन्दन भाई साहब की चाची हैं न! वह मेरी बुआ लगती हैं।”

सम्बन्ध जानकर भाभी ने कहा, “ओ बाँदेवाली सासजी की आप भतीजी हैं। इन्होंने ज़िक्र तो किया था।”

“कहाँ हैं भाई साहब?” माया ने पूछा।

“आज इतवार है, घूमने चले गए हैं।” उत्तर मिला।

“कब तक लौटेंगे?” फिर यह देख कि वह अभी खड़ी ही हैं माया ने कहा, “आप भी तो बैठिए।”

“चूल्हे पर तरकारी चढ़ी है।” और उसका ध्यान आते ही भाभी बोलीं, “अभी दो मिनट में आयी।”

कहकर कमरे से चली गई। माया उसी तरह पट्टी पर बैठी निरुद्देश्य इधर-उधर देखती रही। कमरे के बाद बरामदा था और उसी के निकट शायद चौका, क्योंकि कढ़ाई में कलछी चलने की आवाज़ साफ़ सुनायी दे रही थी। फिर एक छनाका हुआ, शायद पानी डाला गया और फिर हाथ में दरी लिए भाभी आयी और कहा, “उठिए इसे बिछा दूँ तो आराम से बैठिए।”

दरी बिछाते हुए कहा, “आज तो आपकी छुट्टी होगी, इतवार है।”

“जी।”

“आपको तो ख़ूब अच्छा लगता होगा।”

प्रश्न सुन माया कुछ देर चुप रही, फिर कहा, “जी हाँ, लगता तो है। वैसे तो कॉलेज का ही काम रहता है। कभी-कभी इधर-उधर चले गए, सिनेमा वग़ैरह। अभी सिनेमा से ही आ रही थी, सोचा कि मिलते चलें।”

बड़ी हसरत से भाभी ने कहा, “अकेले रहने में तो यह है ही, जो मन आया, कर लिया। शादी से पहले मुझे सिनेमा देखने का बड़ा चाव था, मेरे एक चाचा गेट-कीपर थे, सब मुफ़्त में देखते थे, पर अब तो साल-डेढ़ साल से कोई सिनेमा ही नहीं देखा। मुन्ना छोटा है, घर में कोई है नहीं। छोड़े भी किस पर? कौन-सी फ़िल्म देखी आपने?”

माया ने फ़िल्म का नाम बताया।

“अँगरेज़ी की थी।”

भाभी बड़ी सच्चाई से बोलीं, “भई हमें तो कुछ समझ में नहीं आती। दो-एक बार गए भी, पल्ले कुछ नहीं पड़ा”, फिर रुककर भाभी ने पूछा, “आप तो शायद बी.ए. होंगी?”

“जी नहीं, एम.ए.”, आहिस्ता से माया ने कहा।

भाभी ने एक लम्बी साँस ली, कुछ कहने को मुँह खोला, फिर रुक गईं। बात बदलकर कहा, “खाना परस लाऊँ, आपके लिए?”

“जी नहीं, नौकरानी ने बनाकर रखा होगा। अब मुझे चलना चाहिए।”

“कुछ देर तो रुकिए।” भाभी के स्वर में कुछ विशेष आग्रह नहीं था।

माया जैसे एकदम उकता गई। उठती हुई बोली, “अब चलूँ, भाभीजी, कभी हमारी तरफ़ भी आइए।”

“कहूँगी उनसे, लाना-न-लाना उनके हाथ है।”

भाभी ने जल्दी से हाथ जोड़ दिए।

बाहर निकलते हुए माया को लगा कि वह बेकार ही आयी, भाभी को शायद काफ़ी काम हो, पहुँचकर बाधा दी। घड़ी पर नज़र डाली, सवा बारह बजे थे। कुछ-कुछ भूख भी लग आयी थी। बाँस का फाटक खोलकर बढ़ी ही थी कि चन्दन से भेंट हो गई।

“अरे, वाह, माया! किधर जा रही हो?”

पकड़े जाने पर माया ने रुककर कहा, “घर जा रही हूँ। आयी थी, आप मिले ही नहीं।”

“अब तो मिल गया। चलो, चलो, अन्दर चलो। अपनी भाभी से मिलीं?”

“जी, भाई साहब, अभी माफ़ी चाहती हूँ फिर आऊँगी।”

पर वह नहीं माने और बेतकल्लुफ़ी से उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, “नहीं बिना खाना खाए नहीं जा सकोगी।”

माया ने हाथ छुड़ाने का प्रयत्न किया, पर चन्दन हाथ पकड़े-पकड़े ही अन्दर तक ले गए और ज़ोर से पुकारकर कहा, “सुनो, एक मेहमान आए हैं।”

भाभी चौके से बाहर आयीं और देखा, फिर कहा, “मैंने तो पहले ही रुकने को कहा था”, फिर माया के मुख की ओर देखकर बोलीं, “हाथ तो छोड़ दो बेचारी का।”

उनके कहने का ढंग ऐसा था कि चन्दन ने तुरन्त उसका हाथ छोड़ दिया, फिर कुछ अपराधियों की तरह कहा, “खाने का इन्तज़ाम करो।”

“हो रहा है।” रुखाई से कहकर वह वापस चली गई।

चन्दन और माया ने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि उन्हें प्रसन्नता नहीं हुई है। माया ने फिर कहा, “भाई साहब, बेकार झंझट होगा, मेरी नौकरानी इन्तज़ार कर रही होगी।”

“झंझट क्या? खाना अभी बना जा रहा है।” स्वर ऊँचा कर उन्होंने पत्नी को पुकारा, “सुनो, ज़रा जल्दी कर दो।”

अन्दर से उत्तर आया, “कर रही हूँ। पहले ज़रा मुन्ने को नहला दूँ।”

तब माया जाकर उधर खड़ी हो गई। कहा, “भाभीजी, आप को परेशानी हो रही है, मैंने तो कहा था…”

भाभी धूप में बैठकर बच्चे को नहलाने की तैयारी कर रही थीं। माया को भूख लगने लगी थी। जहाँ वह खड़ी थी, वहीं से झाँककर देखा, चूल्हा ख़ाली था। बच्चा चीख़-चीख़कर रोता रहा, भाभी उसे साबुन लगाती रहीं, उनके ढंग से लग रहा था कि जैसे आज ही रगड़-रगड़कर बच्चे को गोरा कर देंगी। माया बैठी-बैठी अपने को कोसती रही कि किस क्षण में उसने यहाँ आने को सोचा। आख़िरकार भाभी ने बच्चे को पोंछकर कपड़े पहनाए और कपड़े पहनाकर पालने में लिटा दिया और कहा, “ज़रा दही ला दीजिए, रायता बन जाएगा।”

“नहीं-नहीं”, माया ने जल्दी से कहा, “रायते की कोई ज़रूरत नहीं।”

पर भाभी ने नहीं सुना। चन्दन भाई साहब दही लाने को भेज दिए गए, भाभी चौके में जाकर खटर-पटर करने लगीं। बच्चा रोता गया, माया ने उठकर उसे गोद में ले लिया। हिलाया-डुलाया, तो वह चुप हो गया। उसे कन्धे से लगाकर माया ने बरामदे में कई चक्कर लगाए, फिर देखा, वह सो गया था, धीरे से लिटाया तो फिर वह जग गया। उसके चीख़ने से पहले ही माया ने उसे फिर कन्धे से लगा लिया और टहलने लगी। घूमते-घूमते उसके पैर थक गए, कन्धा दुखने लगा पर भाई साहब दही लेकर नहीं लौटे। भाभीजी रोटी बनाने का सारा आयोजन कर चूल्हे के पास चुपचाप बैठी थीं। माया से कहा, “देखा, जहाँ जाते हैं वहीं के हो रहते हैं। दो क़दम पर बाज़ार है।” फिर एकाएक उठती हुई बोलीं, “जाने कब तक आएँगे, मैं नहा लूँ। आप कहें तो आपको खाना परस दूँ।”

“भाई साहब को आ जाने दीजिए।” माया ने कहा। भाभी उठकर अन्दर गईं। ग़ुसलख़ाना बन्द किया ही था कि भाई साहब आ गए। प्रश्न-भरी दृष्टि से इधर-उधर देखा। माया ने अपने-आप ही कह दिया, “नहाने गई हैं।”

“नहाने गई हैं? यह नहाने का टाइम है, इनके सब काम उलटे होते हैं।” कहकर दही उन्होंने रख दिया और बाहर से कुण्डी खड़कायी।

भाभी चुप रहीं।

माया ने बच्चे को पालने पर लिटा दिया। इस बार वह सोता ही रहा। वह थकी थी और भाई साहब झुँझलाए, दो-एक बात कर दोनों चुप हो गए, और प्रतीक्षा करते कि कब भाभी निकलें। भाभी साफ़-सुथरी धोती पहनकर बाहर आयीं, माथे पर बिन्दी लगायी। माँग से सिन्दूर छुआया। बिना किसी जल्दी के धीरे-धीरे चौके में आकर बैठ गईं। रायता बनाया। चूल्हा फूँका। फिर उन्होंने पूछा, “कहाँ खाएँगे? चटाई बिछा लें। वह रखी है कोने में।”

माया ने चटाई बिछा ली, सैण्डिल उतार डाले, हाथ धोकर चौके में गई, और थालियाँ उठाकर बाहर ले आयी। दाल एकदम ठण्डी और पतली थी। रायते में कॉफ़ी ज़्यादा नमक। माया को बरबस चैती की बनायी नरम-नरम पूरियाँ और मेवे की खीर की याद आ गई। खाने के बाद कुछ देर वह और बैठी। जब भाभी स्वयं भी खा चुकीं, तब वह विदा लेकर आयी।

चैती शायद इन्तज़ार करते-करते थककर चली गई थी। माया ने अपने पास की दूसरी चाबी से ताला खोला, घड़ी की सुइयाँ तीन पार कर चुकी थीं। कमरे की छाँह में मधुर शीतलता थी। माया ने सैण्डिल उतार दिए। पर्स कुर्सी पर डाल दिया और चौके की तरफ़ गई। खाना सब ढँका रखा था। पूरियाँ, सूखी मटर, दम आलू तथा गाढ़ी मेवे की खीर। लगता था कि चैती ने भी खाया नहीं था, कुपित हो भूखी ही घर चली गई थी। माया वहाँ से ग़ुसलख़ाने में गई। उसकी आँखें जल रही थीं। सोचा कि ठण्डे पानी से धो ले, तब उसकी दृष्टि पड़ी उन कपड़ों पर, जिन्हें गरम पानी और साबुन में डुबाकर वह बिल्कुल भूल गई थी। उसने झटपट कपड़े अलग-अलग उठा लिए। एक ब्लाउज़ का पीला और हरा रंग निकलकर दूसरी ब्लाउज़ों और सफ़ेद सिल्क की साड़ी में लग गया था। दोष अपना ही था, फिर भी न जाने क्यों उसे रोना आ गया। रेशमी ब्लाउज़ के कच्चे निकल जाने पर और कपड़े ख़राब हो जाने पर नहीं, बल्कि अपनी ज़िन्दगी के पैटर्न पर, उसके खोखलेपन और सारहीनता पर। किसलिए वह घर-बार छोड़कर इतनी दूर आकर पड़ी थी, किसलिए वह सुबह से शाम तक कॉलेज में मग़ज़-पच्ची करती थी। इसलिए कि ज़िन्दगी के दिन एक-एक करके गुज़रते जाएँ और हर गुज़रा हुआ दिन उसके जीवन का ख़ालीपन और भी गहरा करता जाए और एक दिन, सोचे कि इस जीवन में उसने क्या पाया, तो पता चले कि वह एक लम्बे अनन्त मरुस्थल की तरह था।

माया ने ब्लाउज़ फिर उन्हीं कपड़ों में डाल दिया और आकर औंधी ही पलंग पर पड़ गई।

जब वह जगी तो कमरे में अंधेरा था। धूप न जाने कब की खिड़की की राह चली गई थी। घड़ी की सुइयाँ अंधेरे में चमक रही थीं। रोते-रोते सो जाने से उसका सिर बुरी तरह दर्द कर रहा था। इतवार की शाम को चैती नहीं आती थी। माया ने उठकर पानी पिया और कमरे में बत्ती जला दी। मेज़ के पास कुर्सी पर बैठ गई। मेज़ पर कॉपी खुली पड़ी थी। लाल पेंसिल के निशान चमक रहे थे। माया बहुत देर तक बैठी-बैठी बाहर देखती रही। आसमान में दो-एक तारे निकल आए थे। पड़ोस में दूधवाला बाल्टी खटका रहा था। दूध नापता हुआ, मोटे से एक रस स्वर में कह रहा था, ‘दो… तीन… चार…’। सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे आते-जाते जूतों की आवाज़ आ रही थी। ग़ुसलख़ाने में कपड़े भींग रहे थे। चौके में ठण्डा खाना रखा हुआ था और कनपटी के पास एक शिरा बुरी तरह दुःख रही थी।

धीरे-धीरे आकाश काला हो गया। तारों की ज्योति में उज्ज्वलता आ गई। आने-जानेवालों का रव थम गया, माया एक साँस लेकर उठी। बिजली बुझाकर फिर पलंग पर लेट गई। उसे पता था कि नींद रात में बहुत देर से आएगी। फिर भी आँखें बन्द कर लीं। कहीं घड़ी ने धीरे-धीरे आठ के घण्टे बजाना आरम्भ किया, माया ने करवट बदली। अगला दिन, काम का दिन…।

उषा प्रियम्वदा की कहानी 'ज़िन्दगी और गुलाब के फूल'

Book by Usha Priyamvada:

Previous articleअकेली औरत का हँसना
Next articleउसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं
उषा प्रियम्वदा
उषा प्रियंवदा (जन्म २४ दिसम्बर १९३०) प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं। कानपुर में जन्मी उषा प्रियंवदा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पी-एच. डी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के शहरी परिवारों का संवेदनापूर्ण चित्रण मिलता है। उस समय शहरी जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन करने में उन्होंने अत्यंत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here