उत्तराफाल्गुनी के आसपास

वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है उत्तराफाल्गुनी। हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन-मनभावन है, बड़ी मौज रहती है, परंतु सत्ताइसवें के आते-आते घनघोर भाद्रपद के...

तीसरे दर्जे के श्रद्धेय

"लड़कियाँ बैठी थीं, जिनकी शादी बिना दहेज के नहीं होने वाली थी। और लड़के बैठे थे, जिन्हें डिग्री लेने के बाद सिर्फ सिनेमा-घर पर पत्थर फेंकने का काम मिलने वाला है।"

संस्कृति और जातीयता

"यदि जातियाँ असंतुष्ट होकर लड़ती रहेंगी तो देश कमजोर होगा।"

विदाई सम्भाषण

"क्या आँख बन्द करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है? क्या प्रजा की बात पर कभी कान न देना और उसको दबाकर उसकी मर्जी के विरुद्ध जिद्द से सब काम किये चले जाना ही शासन कहलाता है? एक काम हो ऐसा बताइये, जिसमें आपने जिद्द छोड़कर प्रजा की बात पर ध्यान दिया हो।"

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है

"सीता जंगल की सूखी लकड़ी बीनती हैं, जलाकर अँजोर करती हैं और जुड़वाँ बच्चों का मुँह निहारती हैं। दूध की तरह अपमान की ज्वाला में चित्त कूद पड़ने के लिए उफनता है और बच्चों की प्यारी और मासूम सूरत देखते ही उस पर पानी के छीटे पड़ जाते हैं.. उफान दब जाता है।"

नाखून क्यों बढ़ते हैं?

"मनुष्‍य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती।"

एक दुराशा

नारंगी के रस में जाफरानी वसन्ती बूटी छानकर शिवशम्भु शर्मा खटिया पर पड़े मौजों का आनन्द ले रहे थे। खयाली घोड़े की बागें ढीली...

लोभ और प्रीति

किसी प्रकार सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही...

मज़दूरी और प्रेम

हल चलाने वाले का जीवन गड़रिये का जीवन मज़दूर की मज़दूरी प्रेम-मज़दूरी मज़दूरी और कला मज़दूरी और फकीरी समाज का पालन करने वाली दूध की धारा पश्चिमी सभ्यता का एक नया...

मेरी दैनिकी का एक पृष्ठ

"बहुत से लोग तो जीवन से छुट्टी पाने के लिए कला का अनुसरण करते हैं किन्तु मैं कला से छुट्टी पाने के लिए जीवन में प्रवेश करता हूँ।" "भुस खरीदकर मुझे भी गधे के पीछे ऐसे ही चलना पड़ता है, जैसे बहुत से लोग अकल के पीछे लाठी लेकर चलते हैं। कभी-कभी गधे के साथ कदम मिलाये रखना कठिन हो जाता है, (प्रगतिशीलता में वह मुझसे चार कदम आगे रहता है) लेकिन मुझे गधे के पीछे चलने में उतना ही आनन्द आता है जितना कि पलायनवादी को जीवन से भागने में।" पढ़िए निबंधकार व आलोचक बाबू गुलाबराय के जीवन के एक दिन का विवरण!

आशा का अन्त

"माई लार्ड! अबके आपके भाषण ने नशा किरकिरा कर दिया। संसार के सब दुःखों और समस्त चिन्ताओं को जो शिवशम्भु शर्मा दो चुल्लू बूटी पीकर भुला देता था, आज उसका उस प्यारी विजया पर भी मन नहीं है।"

प्रश्नोत्तर

"निरा - यह तो ठीक कहते हो, पर यह विषय व्यवहार का है और हम धर्म की चर्चा किया चाहते थे। मूर्ति - व्यव्हार और धर्म में आप भेद क्या समझते हैं? हमारी समझ में तो बुद्धि और बुद्धिमानों के द्वारा अनुमोदित व्यव्हार ही का नाम धर्म है।"

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