संसार के कवियों ने अनेक रूपों में नारियों को प्रत्यक्ष किया है। साहित्य के इस दर्शन के पतन का परिणाम नायिकाभेद [के] वीभत्स चित्रों में दिखलायी पड़ता है। बड़े-बड़े कवियों की दृष्टि में सब सृष्टियों का सार जैसे प्रकृति ने नारी के रूप में भर दिया हो, जैसे प्रकृति स्वयं अपनी अमर शक्ति तथा अनन्त चमत्कार को लेकर नारी के रूप में खड़ी हुई हो—

“I saw her upon nearer view,
A Spirit, yet a woman too!”

– Wordsworth

(मैंने उसे नज़दीक से देखा, वह केवल ज्योति थी, साथ ही एक नारी भी।)

नारियों में इस प्रकार ज्योति की मूर्ति प्रत्यक्ष करने का परिचय प्रायः सब जगह के चित्रण में मिलता है। शकुन्तला के ‘या सृष्टिः स्रष्टुराद्या’ से लेकर आजकल की कविताओं तक—

“अकेली सुन्दरता कल्याणि!
सकल ऐश्वर्यों की सन्धान।”

– सुमित्रानन्दन पन्त

यहाँ केवल सुन्दरता ही मूर्ति के साँचे में ढाल दी गयी है। रवीन्द्रनाथ की ‘जीवन-देवता’ तथा ‘अन्तर्यामी’ आदि कविताओं में नारियों के अनेक उच्चतम सुन्दर विकसित चित्र मिलते हैं, बल्कि कवि को नारी-मूर्ति ही कविता के क्षेत्र पर गतिशील करती है—

“अचल आलोके रयेछ दाँड़ाये,
किरण-वसन अंगे जड़ाये,
चरणेर तले परिछे गड़ाये
छद्यये विविध भंगे।
गन्ध तोमार घिरि चारि धार,
उड़िछे आकुल-कुन्तल-भार,
निखिल गगन कॉपिछे तोमार
परस-रस-तरंगे।”

(अचल आलोक में तुम खड़ी हो, किरणों का वस्त्र अंग में लपेटे हुए, चरणों के नीचे विविध तरंग-भंगों से किरणों की धारा गलती-फैलती-बहती है। सुगन्ध तुम्हारे चारों पार्श्वों को घेर रही है, व्याकुल बाल बिखर-बिखर उड़ रहे हैं। तुम्हारे स्पर्श के रस की तरगों से निखिल संसार काँप रहा है।)

रवीन्द्रनाथ की खींची हुई यह नारी-मूर्ति नारीत्व के चरम विकास पर पहुँची हुई है। अंगों के गठन में केवल ज्योति ही घनीभूत हो गयी है, और कोई जड़ता नही; अंगराग, गति, चंचलता, पलकों का गिरना, सौन्दर्य, स्नेह, विलास, सब कुछ है।

भक्त तथा शृंगारी कवियों ने ब्रज की गोपिकाओं में बड़ी कुशलता से पावन भावना भर दी है। प्रगाढ़ प्रेम के चित्रों में वहाँ नारी-मूर्ति खींची गयी है। राधिका को इस तरह चित्रित किया है कि वह शृंगारमयी जीवनदात्री नारियों की अधिष्ठात्री बन गयी है। प्रेम का परिपाक हो जाने के कारण ब्रजेश्वरी की गति, भंगिमाएँ, कटाक्ष तथा आलाप आदि नारी-प्रकृति को शृंगार के चरम विकास तक पहुँचा देते हैं। प्रेम के उपासक, कृष्ण के भक्त कवियों ने गोपियों के प्रेम को व्यक्त करने में भाषा छन्द तथा भावों को भी नारी-मूर्ति के साथ चिरकाल के लिए शृंगार सिद्ध कर दिया है। ‘त्वमसि मम भव-जलधि रत्नम्’ के द्वारा उन कवियों ने भी नारी ही को संसार की उत्तम सृष्टि माना है। नारियों के भीतर ही इन लोगों ने अपनी साधना प्रत्यक्ष की, और किसी अंश में भी इस शृंगार के साहित्य को वेदान्त-साहित्य के उपलब्ध ज्ञान के मुक़ाबले में न्यून नहीं रक्खा। इसके सर्वप्रथम आचार्य शुकदेव हैं, जिनके चरित्र का मुक़ाबला भारत का महर्षि-इतिहास नहीं कर सकता। जैसे शुकदेव की सच्चरित्रता का फल ही शृंगार का उत्कर्ष बन गया हो, और उनकी तमाम साधना रासलीला की वर्णना में बदल रही हो।

“Like a high-born maiden
In a palace-tower,
Soothing her love-laden
Soul in secret hour
With music sweet as love, which
Overflows her bower.”

– Shelley

शेली की नारी प्रेमोज्ज्वल शृंगार की कला के कुल अलंकारों से युक्त है। नारियों के इस उत्कर्ष के चित्रण का कितना बड़ा प्रभाव समाज पर पड़ा है, साहित्य के भीतर से प्रत्येक देश के समाज के उत्कर्ष का विचार करने पर यह पता लग जाता है। साहित्य में नारियों के उच्चतम विकास की जितनी ही अधिक सृष्टि होती है, समाज की स्त्रियों में सुधार, आचरण आदि में शुद्धता, मार्जन, गुण, सूक्ष्मदर्शिता तथा चारुता आती है।

कवियों के मानस-पट पर एक और प्रकार की नारी-मूर्ति का चित्रण देख पड़ता है। यह चित्रण शराब, कबाब, साज़ तथा संगीत के आधार पर हुआ है, और बाहरी चक्र सामाजिक दृष्टि से इस चित्रण का परिणाम बहुत बुरा कहलाने पर भी भाषा और भावों के भीतर से साहित्यिक उत्कर्ष का विचार करने पर उतना ही ऊँचा पहुँचा हुआ जान पड़ता है। “मय तो पीता हूँ, अब ईमान रहे या न रहे” सुनकर इस पंक्ति की प्रबल मादक ध्वनि में सहृदय श्रोता अनायास आत्मविसर्जन कर देते हैं। उमर ख़य्याम की रुबाइयों में, एक ही आधार में, त्याग और प्रेम, दृढ़ता तथा भय, उज्ज्वलता तथा लघुता, मार्जन तथा सौन्दर्य की शृंगारमयी नारी-मूर्ति अंकित देख पड़ती है।

समाज के लिए महाकवि वर्ड्सवर्थ की नारी ही यथार्थतः तमाम कामनाओं की सिद्धि कल्याणी-मूर्ति से आँखों के सामने आती है—

“A lovely apparition, sent
To be a moment’s ornament;
Her eyes as stars of twilight fair
Like twilight’s, too, her dusky hair;

A countenance in which did meet
Sweet records, promises as sweet.”

(वह एक स्वर्गीय ज्योति-चित्र-सी एक क्षण की अलंकार-सी रचकर भेजी गयी थी। उसकी आँखें ऐसी सुन्दर जैसे नक्षत्रों की चमक, वैसे ही उसके धूसर बाल, मुख में मधुर लक्षण मिले हुए, प्रतिज्ञाओं ही की तरह मधुर।)

[‘सुधा’, मासिक, लखनऊ, नवम्बर, 1929 (सम्पादकीय) । असंकलित]